Tadap [part 109 ]

जब मन प्रसन्न होता है, स्थिर होता है तब वह कुछ अच्छा सोचने लगता है ,आगे बढ़ने का प्रयास करता है। सकारात्मक सोच ,उसके अंदर भर जाती है। अनेक परिस्थितियों के प्रतिकूल रहने पर , ऐश्वर्या परेशान थी किंतु अब धीरे-धीरे वह अपनी जिंदगी में आगे बढ़ रही है। ऐसा प्रतीत होता है ,वे एक बड़े हादसे से बचकर निकले हैं और अपने जिंदगी को संवारने का प्रयास कर रही है। ऐसे समय में एक दिन मोहल्ले की एक लड़की आती है, जो ऐश्वर्या से उसके हुनर की बात करती है और उनकी बातों ही बातों में ऐश्वर्या को एक अच्छा विचार आता है कि क्यों न वह ''सिलाई -कढ़ाई केंद्र'' खोले। समय का सदुपयोग भी हो जाएगा, और घर बैठे ,कुछ पैसों की आमदनी भी हो जाएगी। 

अपना यह विचार उसने प्रवीण को बताया , तो वह मुस्कुरा दिया -उसे ऐश्वर्या पर विश्वास नहीं था, क्योंकि ऐश्वर्या ने, यह सब घर में ही सीखा था बाहर जाकर, कोई ''ट्रेनिंग ''नहीं की थी। हाँ व्यंग्य अवश्य किया ,तो क्या मैं अब अपना कारोबार बंद कर दूँ ? अब तो तुम कमाने लगोगी ,घर का खर्चा तो तुम्हारी कमाई से हो ही जायेगा। तब वह ऐश्वर्या से कहता है-कि अपना यह विचार त्याग दो ! घरेलू कपड़े सीना और बाहर के लड़कियों को सिखाना दोनों में ही बात अंतर है। 


अपनी जगह प्रवीण की बात भी सही थी, नाप  से सीखना अलग चीज थी। तब ऐश्वर्या ने अपना यह विचार, कुछ दिनों के लिए त्याग दिया और वह किसी ऐसे केंद्र की खोज में जुट गई ,जो उसके नजदीक हो और अपने खाली समय में, वह कुछ सीख सके। शीघ्र ही उसे ऐसा ''ट्रेनिंग सेंटर ''मिल भी गया। जहां पर बाकायदा नाप करके सिलाई सिखाई गई। ऐश्वर्या को सिलाई तो पहले से ही आती थी, किंतु नाप लेना नहीं आता था वह भी ,वह शीघ्र ही सीख गई जिसका उसे सर्टिफिकेट भी मिला। तब उसने, अपना ''सिलाई  केंद्र ''खोलने की पूरी तरह से तैयारी कर ली। उस केंद्र में जाकर, उसने अकेले सिलाई ही नहीं , अन्य छोटे-छोटे कार्य भी सीखें। अब वह अपने 'सिलाई केंद्र में,' व्यस्त हो गई। आरंभ में एक दो लड़कियां ही आई थीं किंतु जैसे-जैसे अन्य लोगों को पता चला। लड़कियां बढ़ने लगीं ,अब ऐश्वर्या का ध्यान भटकता नहीं था उसका ध्यान अपने कार्य में व्यस्त रहता था। वह खुश भी रहने लगी थी। प्रसन्न रहने के साथ-साथ, कभी-कभी, उसकी इच्छाएं भी बढ़ने लगीं। अब बच्चे बड़े हो रहे थे। कभी उसकी इच्छा होती ,कहीं बाहर घूमने जाएँ या कोई अच्छी सी फ़िल्म देखने जाएँ किन्तु प्रवीण का व्यापार बहुत अधिक बढ़ गया था। उसे समय ही नहीं मिलता था। कभी समय मिला भी तो...... ऐसी इच्छाओं पर उसका कभी सकारात्मक रवैया नहीं रहा। अब ऐश्वर्या को उसके इस व्यवहार बुरा नहीं लगता ,उसने अपने को ऐसे ही ढाल लिया ,ऐसा नहीं कि बोलना ही छोड़ दिया ,बातचीत करते हैं ,अपने -अपने कार्यों में व्यस्त रहते हैं। 

ऐश्वर्या ,पिछली बातों को भुला आगे बढ़ जाना चाहती थी ,किन्तु कुछ न कुछ बातें परिवार में ऐसी हो ही जातीं ,तब वह अपने उन पिछले कई वर्षों में खो जाती और जब उन भूल -भुलैया वाले ,उन पलों में खोती तो ''तड़प ''उठती। उसके विवाह को सत्रह वर्ष हो गए ,प्रवीण और ऐश्वर्या साथ रहते हैं ,किन्तु जो 'प्रेमभाव ' ऐश्वर्या के  मन में जागा था ,अब वह स्थान रिक्त है ,पुनः वो बात नहीं बन पाई। 

लोग वही हैं किन्तु अब चंदा देवी ,घर के सभी कार्य करती हैं। ऐसा नहीं ,कि करुणा ,कोई नौकरी करती है ,बस वह चंदा देवी को ,दो समय का भोजन अवश्य देती है। आरम्भ में चंदा देवी ने ,ऐश्वर्या को जलाने के उद्देश्य से ,गृहकार्य में उसकी सहायता करतीं थीं किन्तु अब उसकी आदत बन गयी। अपने -अपने घरों में रहती हैं किन्तु अब चंदा देवी ,झाड़ू -पोछे से लेकर ,बर्तन मांजना ,कपड़े धोना ,सुखाना सभी कार्य करतीं है। तब एक दिन ऐश्वर्या ने उनसे पूछा -मैंने कभी आपसे काम नहीं करवाया ,न ही कभी कहा ,तब आपको मुझसे क्या दुश्मनी थी ?  इसके यहाँ सम्पूर्ण कार्य करतीं हैं ,तब भी आपको बुरा नहीं लगता ,न ही इसे कुछ कहती हैं। तब हमारी ज़िंदगी में क्यों ,इतनी कड़वाहट भर दी ? आप क्या सोचतीं हैं ? आप लोगों के ,इतने धोखे खाकर ,जो मैंने अपने जीवन में सहा और देखा ,कल को यदि मेरी बेटी 'छाया 'का विवाह होता है ,तो मैं कैसे उससे कह पाऊँगी ?अपनी सास को माँ समझना ,उस घर को अपना समझना। अब तो शायद ,यही कह पाऊँगी ,पहले उन लोगों को परखना और यदि मेरी बेटी एक भी नकारात्मक सोच के साथ उस घर में प्रवेश करती भी है। भले ही ,वो लोग अच्छे भी हों ,किन्तु मैं इन्हीं नजरों से देखूंगी। तब क्या वह उनसे ,उस परिवार से जुड़ पायेगी ? एक गहरी श्वांस लेते हुए -किन्तु मैं ऐसा नहीं करूंगी ,उससे बस यही कहूंगी -दुनिया में सभी तरह के लोग होते हैं ,समझदारी से अपने घर को बनाये रखना ,तभी उसे अपने मायके  का स्मरण हो आया ,उसकी आँखें नम हो गयीं और बोली - मम्मी -पापा हमेशा तुम्हारे साथ हैं। 

चंदा देवी के पास कोई जबाब नहीं था ,वो चुपचाप वहां से चली गयीं। 

ऐश्वर्या सोच रही थी -लोग कहते हैं -''कि भगवान !अगले जन्म में ,बुरे कर्मों की सजा देता है किन्तु मुझे तो लगता है ,सारा हिसाब -किताब इसी जन्म में पूरा करता है।'' एक बार को तो ऐश्वर्या के मन में आया कि चंदा देवी को अपने पास बुला ले ,इस उम्र में ,इतना कार्य ठीक नहीं किन्तु दूसरे ही पल ,उसे वो दिन स्मरण हो आये। जिनमें उसकी ज़िंदगी ,मौत से भी खेल गयी। 

आज भी वे पल ,उसे रुला जाते हैं। बड़े -बूढ़ों का ,उसके मन में बहुत भाव था ,उसकी दादी हमेशा कहती थी -''इसकी सास इससे कितना खुश होगी ? जब इसका सेवाभाव ,प्रेम -आदर देखेगी किन्तु उसके इस गुणों का यहाँ कोई महत्व  ही नहीं था। न ही ,दादी जैसी नजर ,किन्तु इस ज़िंदगी ने उसे बहुत कुछ सिखाया।'' ज्यादा अच्छा होना ,सच्चाई के साथ रहना ,भी बहुत कठिन हो जाता है। यदि किसी के सामने झुकना ही है ,तो वह व्यक्ति भी ,इसके लायक होना चाहिए। ज्यादा झुकने से लोग ,स्वयं अपनी ही क़द्र खो देते हैं।'' 

यह एक ऐश्वर्या की ही कहानी नहीं है ,न जाने आज भी ,कितनी ऐश्वर्या हैं जो किसी न किसी बात पर ,कहीं न कहीं समझौता करती दिख जायेगीं। कभी अपने आत्मसम्मान से ,कभी अपने सपनो से ,कभी शब्दों के वार से टूटती हैं ,छलनी भी होती हैं ,किन्तु बनावटी मुस्कान लिए घर संभालती हैं। हर नारी आजादी का झंडा नहीं लहराती ,उसका परिणाम -एक घर टूटता ही है ,न जाने कितनी ज़िंदगियां ,उन दीवारों के पीछे अपने आंसू पीती हैं। तभी वो घर जुड़े दिखलाई देते हैं। ऐसा नहीं ,कि हर जगह सास ही गलत हो !आजकल की पीढ़ी  को देखते हुए तो लगता है ,वह तनिक कुछ ज्यादा ही जागरूक हो गयी है। ''घर आपसी तालमेल ,समझदारी से बनते हैं ,न जाने कितने लोग ऐसे हैं ,जो घरों  के लिए ,अपने लोगों के लिए तरसते हैं। उनसे जाकर उनकी व्यथा पूछो !घर क्या होता है ?रिश्ते क्या होते हैं ?

दोस्तों आज अपनी ये रचना ,मैं यहीं समाप्त करती हूँ ,ये तो जीवन है ,इतना बड़ा जीवन जिसमें अनेक हादसे होते हैं। उन हादसों में , कहीं  न कहीं कोई ऐश्वर्या या प्रवीण होते हैं ,या फिर चंदा देवी जैसा चरित्र ! तब एक नई कहानी बनती है। किन्तु जो ऐश्वर्या ने झेला ,उसके वो खेलने ,खाने के दिन जो उसने पीड़ा में दर्द में बिताये ,वो तो उम्र के साथ बीत गए किन्तु क्या उसके मन के उस भोलेपन को ,उसकी जवानी के वे दिन ,क्या कोई वापस लौटा सकता है ? उसकी वो वेदना !जो आज भी सोचकर ,स्मरण करके बढ़ जाती है ,क्या कोई कम कर सकेगा ,उसकी वो ''तड़प ''

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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