जिंदगी से हताश -निराश ऐश्वर्या को चहूँ ओर परेशानियों के सिवा कुछ भी दिखलाई नहीं पड़ रहा था, जिस तरह से प्रवीण ने ,उसे घर से बाहर किया , उसके लिए तो, मरने के बराबर था ,किंतु जिंदगी इस तरह से मिटाई भी नहीं जाती। संघर्ष भरी यह जिंदगी ! ऐश्वर्या को ,''खून के आंसू रुला ''रही थी। रुलाने वाला कोई बाहर का नहीं था , देखा जाए ,तो उसके सभी अपने थे। उसका भरा -पूरा परिवार है, उसके माता-पिता मायके में सब ठीक है ,भाई बहन ! ससुराल में भी, सास -ससुर देवर, पति -बच्चे, सभी तो हैं। बाहरी दृष्टि से देखा जाए ,तो भरा -पूरा परिवार है, किंतु वहां सोच की कमी है, विचारों का अलगाव है। व्यवहार में क्रूरता है। अब तो शायद लगने लगा है ,''बदले की भावना ''भी है। ऐसा ऐश्वर्या को उस पेड़ के नीचे बैठकर ही लगा। जब वह वहां बैठकर ,अपने जीवन के विषय में सोच रही थी-तब उसने जाना, कहीं ऐसा तो नहीं प्रवीण उससे, उसके इनकार का बदला ले रहा हो या कॉलेज में जो ,उसका अपमान हुआ था उसका बदला ले रहा हो।'' मन है , कुछ भी सोच सकता है। विचार हैं, आ जा सकते हैं। किंतु अब तक की जिंदगी देखते हुए ,तो ऐसा ही लग रहा है।
प्रवीण उसे लेने आता है, इसके लिए चंदा देवी उसे बाध्य करती हैं , समाज और रिश्तों के कारण उसे वापस बुलवाती हैं । ऐश्वर्या आना तो नहीं चाहती थी, किंतु जब पुलिस वाले ने उन दोनों को ,वहां से जाने के लिए कहा ,तो वह चुपचाप प्रवीण के साथ चल दी। घर का ,रिश्तो का ,परिवार का ज्यादा तमाशा बनाना भी, उसे उचित नहीं लगा। वह घर आ तो गई, किंतु शांत रही। अंदर से कुछ टूट सा गया था, क्या यही रिश्ते होते हैं ,क्या यही परिवार होता है ?'' जो एक दूसरे का सम्मान करते हैं ,प्रेम से व्यवहार करते हैं ,वे लोग कैसे होते होंगे ?'' मन ही मन सोच रही थी, उस व्यथित मन को लिए, बिस्तर पर लेट गई। बहुत रात्रि हो चुकी थी, प्रवीण उसके करीब आया, तो अवश्य था ,किंतु शायद उसे किसी ने अपनी गलतियों का एहसास करने का तरीका सिखलाया ही नहीं था। शायद जो मर्द होते हैं , यदि उन्हें गलती का आभास हो भी जाए , तो अपनी बचकानी हरकतों से, उस वातावरण को, उन परिस्थितियों को सुलझाना चाहते हैं, किंतु गलती के लिए स्पष्ट तौर से, क्षमा याचना नहीं करते। ऐसा ही कुछ प्रवीण कर रहा था, किंतु ऐश्वर्या की तरफ से कोई भी, प्रतिक्रिया न देखकर वह चुपचाप सो गया। मन ही मन सोच रहा था -न जाने ,अपने को क्या समझती है ? शायद उन परिस्थितियों को वह समझना ही नहीं चाहता, और न ही ऐश्वर्या के मन को पढ़ना चाहता है या उसे आता ही नहीं।
घर का वातावरण कई दिनों तक शांत रहा, बच्चे स्कूल चले जाते, और प्रवीण अपने काम पर ,चंदा देवी ने भी कई दिनों तक ,इस घर की ओर रुख नहीं किया। धीरे-धीरे जिंदगी, समय के साथ आगे बढ़ रही थी, यह यूँ कहो ! घिसट रही थी। मन में न ही कोई उमंग थी, न ही कोई इच्छा !बस हर कोई अपनी जिंदगी जिए जा रहा था। धीरे-धीरे ऐश्वर्या के मन की हलचल ,वेदना भी कम होने लगी। उसका मन स्थिर हो गया और अब वह आगे की सोचने लगा। उसने सोचा - जब बच्चे चले जाते हैं ,उस समय मेरे पास थोड़ा समय बच जाता है, तो क्यों न मैं, इस समय का सदुपयोग कर लूं। नौकरी तो मैं अब कर नहीं सकती, क्योंकि स्कूल से जब बच्चे आएंगे ,तब उन्हें कौन संभालेगा ? बच्चों को भी वह स्वयं ही पढ़ाती थी। उसके पास गृह कार्य के अलावा, बस वही समय बचता था , जब बच्चे स्कूल में होते थे।
एक बार उसके मोहल्ले की एक लड़की, उसके पास आई और बोली-भाभी !मुझे , सलवार -सूट सिलना है , आप कटिंग कर दीजिए ! वह जानती थी कि ऐश्वर्या को, सिलाई बहुत अच्छे से आती है। अपने बच्चों के कपड़े भी वह अच्छे से सिलती है और नए-नए डिज़ाइन तैयार करती है।
ऐश्वर्या ने उसके सूट की कटिंग करवा दी। तब वह प्रसन्न होते हुए बोली-भाभी !आपको यदि बुरा न लगे तो मैं आपके पास ही आकर ,इसकी सिलाई भी कर लूं. आपसे पूछती भी रहूंगी। आजकल दर्जियों के भाव तो बहुत बढ़ गए हैं। छोटा सा भी डिजाइन हो ,उसके बहुत पैसे ले लेते हैं। इसमें ऐश्वर्या को क्या आपत्ति हो सकती थी। इससे पहले भी ,वह कई बार इस तरह से उसे कटिंग करवा के ले जा चुकी है। जब वह लड़की, ऐश्वर्या से पूछ -पूछकर सिलाई कर रही थी ,तभी ऐश्वर्या के दिमाग में, एक विचार आया , क्यों न मैं ,अपने इस हुनर को ही खाली समय में उपयोग में ले आऊं। तब उसने उस लड़की से पूछा -क्या यहां लड़कियां सिलाई भी सीखने आती हैं ?
लड़कियां तो यहां बहुत मिल जाएंगीं , क्यों ,आप क्या करने का सोच रही हैं ?
मैं यही सोच रही हूं क्यों ना, मैं एक ''सिलाई -कढ़ाई केंद्र ''खोल दूं।
क्या आपको सिलाई के साथ-साथ कढ़ाई भी आती है ?
हां, जब मैं छोटी थी, तब गर्मी की छुट्टियों में, अपनी बुआ जी से मैंने सिलाई और कढ़ाई दोनों सीखा था , मुझे नए-नए डिजाइन के कपड़े पहनना पसंद था ,इसीलिए यह मेरा शौक बन गया।
यह तो अच्छी बात है , आप अपना 'सिलाई केंद्र 'खोल लीजिए , अच्छा रहेगा ,प्रसन्न होते हुए वह बोली -भाभी !आपने तो मेरे सूट में से इतना कपड़ा बचा दिया कि मैं अपनी भतीजी का, छोटा सा फ्रॉक सिल सकती हूं किंतु टेलर वह कपड़ा वापस नहीं करता।
चलो !तुम्हारे आने से, मन में कुछ नया विचार तो आया। आज मैं प्रवीण से बात करूंगी।
शाम को जब प्रवीण आता है, तब ऐश्वर्या के चेहरे पर एक चमक देखकर, पूछता है -आज क्या बात है ?
मैं सोच रही हूं ,कि मुझे'' सिलाई केंद्र ''खोल लेना चाहिए।
उसकी बात सुनकर प्रवीण मुस्कुराया और हंसते हुए बोला -तुम्हें सिलाई आती भी है, घर में बच्चों के कपड़े सिलना एक अलग बात है , और सही तरीके से बाहर सीखाना , दोनों में बड़ा अंतर है।
