तेरी तस्वीर से जब चाहा ,बातें करती हूं।
अपने सभी दुख -दर्द बांटती बताती हूं।
तुम साथ रहकर भी, साथ नहीं मेरे.....
तस्वीर से तेरी ,जब शिकायतें करती हूं।
तुम कहते कुछ नहीं , पर सुनते तो हो।
बस यही सोच ,तनिक मुस्कुरा लेती हूं।
जब -जब तेरी तस्वीर से बातें करती हूं।
पूजा ने ,अपनी मेज पर रखे ,कागजों में से ,एक कागज़ पर अपने ह्रदय के भाव उतारे ,और एक गहरी स्वांस ली, कुर्सी के पीछे अपना सिर टिकाया और आँखें बंद करके सोचती है -'कम से कम इस तस्वीर के माध्यम से, मुझे आज भी लगता है। तुम मेरे साथ हो ,और मेरी बातें भी सुनते हो। मेरे जीवन के लिए यही बहुत है। तुम्हारा 'सूरज ' अभी पढ़ रहा है। एक -दो बार उसने अपने पापा के विषय में पूछा था ,आज तक उसे समझाती आई हूँ -' कारोबार के सिलसिले में बाहर गए हैं किन्तु कभी तो उसे सच्चाई बतानी ही होगी। कहते हुए ,उसने अपनी आँखें खोलीं और उस कागज को उठाया और हाथों में दबा गोला बनाया और कूड़ेदान में फ़ेंक दिया। ऐसे ही ,वह कितनी बार ,अपने दिल के जज़्बात लिखती है और उन्हें ऐसे ही तोड़ -मरोड़कर कूड़ेदान के हवाले कर देती है। जब मेरी ज़िंदगी का ही कोई मोल नहीं तो इन शब्दों का मूल्य कोई क्या समझेगा ?
इंस्पेक्टर विकास खन्ना और प्रभा अपने घर गृहस्थी में व्यस्त हो गए थे , कुछ दिन तक वह चंपा को ढूंढता रहा किंतु चंपा का कहीं भी ,कोई पता नहीं चला। '' नीलिमा सक्सेना ''आज भी अपने उसी'' अनाथ आश्रम'' में व्यस्त है और उसकी बेटी कल्पना मुंबई में ''फैशन डिजाइनिंग ''का कोर्स कर रही है। छोटी बेटी विदेश में रह पढ़ाई कर रही है। समय अपने गति से व्यतीत हो रहा था।
पांच वर्ष पश्चात !
इन सभी बातों को लगभग 5 वर्ष बीत गए होंगे, एक दिन नीलिमा के दफ्तर में एक व्यक्ति आता है और वह एक लाख का चेक उनकी संस्था के नाम देता है। नीलिमा अत्यंत प्रसन्न होती है और वह सोचती है - दुनिया में ऐसे लोग भी हैं, जो अनाथ और विकलांग बच्चों के लिए सोचते हैं ,उनके लिए कुछ कर करना चाहते हैं। उस चेक पर नाम देखा , तो कुछ अचंभित हो गई, यह कैसा नाम है ? ''जावेरी प्रसाद'' नाम से तो जेवर जैसी खनक आ रही है ,मन ही मन मुस्कुरा दी ,शायद इन पर बहुत पैसा होगा।बड़े लोग तो ऐसे कार्य करते ही रहते हैं। नीलिमा ने उनके विषय में,जानकारी प्राप्त करनी चाही,आपके ''जावेरी प्रसाद ''जी कौन हें ?और क्या कार्य करते हैं ?
तब उस व्यक्ति ने बताया -''जावेरी प्रसाद जी ''बहुत अमीर, और पैसे वाले व्यक्ति हैं। दान -पुण्य में उनका विश्वास है। अधेड़ उम्र हो गई है किंतु स्वभाव से थोड़े से मनचले भी हैं। अभी कुछ वर्ष पहले ही उन्होंने अपना विवाह किया था। उनकी पहली पत्नी से उनका एक बेटा भी है, जो विदेश में पढ़ता है।
यह तो अच्छी बात है, नीलिमा ने कहा -अपनी कमाई में से कुछ हिस्सा व्यक्ति को, ऐसे ही , गरीब लोगों के कार्यों में भी लगाना चाहिए। इस बात को भी 10 दिन ही बीते थे।
एक दिन एक व्यक्ति नीलिमा के घर आता है , उसके हाथ में सूटकेस था। उसे देखकर नीलिमा ने पूछा -जी कहिए !आपको किससे ,क्या काम है ?
जी मुझे ''जावेरी प्रसाद जी ''ने भेजा है।
आपको पता होना चाहिए ,संस्था के सभी कार्य मैं , संस्था में ही देखती हूं। मैं अपने घर पर किसी भी बाहरी व्यक्ति से नहीं मिलती हूं।
जी यह बात मुझे मालूम नहीं थी लेकिन बात ही कुछ ऐसी है, कहकर वह चुपचाप खड़ा हो गया।
क्या बात है ? कुछ बताएंगे !
साहब का यह बीस लाख रुपया है , अभी मुझे किसी कार्य के लिए जाना है।
वो अपनी बात पूरी करता उससे पहले ही नीलिमा बोल उठी -तो अपने साहब ,के घर भिजवा दो !
साहब ने ही तो ,मुझे इसकी देखरेख करने के लिए कहा है।
आपके साहब कहां है ?
वह तो आजकल मुंबई में है , वह यहां रहते ही कहां है?
तब तुम मुझसे क्या उम्मीद करते हो ?
यह उनका पैसा है , कुछ दिन के लिए मैं आपके यहां रखना चाहता हूं, मैं गरीब आदमी हूं , इतना पैसा मैं नहीं रख पाऊंगा। मैं एक कमरे के मकान में रहता हूँ , उसमें कई लोग रहते हैं। यह पैसा वहां सुरक्षित नहीं रहेगा, किसी न किसी की दृष्टि इस पैसे पर पड़ ही जाएगी। आप तो हमारे साहब को अच्छे से जानती हीं हैं , वह आपकी संस्था में दान -पुण्य करते ही रहते हैं। कुछ दिन के लिए ,आप यह पैसा अपने पास रख लीजिए।
यह बहुत बड़ी रकम है, मैं इसे अपने पास कैसे रख सकती हूं ? तुम्हारे साहब को मैं अच्छे से जानती भी नहीं , सिर्फ उन्होंने हमारे यहां एक चेेक भेजा था, बस इतना ही जानती हूं। न ही ,मैंने उन्हें पहले कहीं देखा है ,इसीलिए मैं ,इसे नहीं रख सकती।
ऐसा मत कहिए !किसी की अमानत धरोहर समझ कर ही रख लीजिए , मैं दो-तीन दिन में आकर ले जाऊंगा।आप उन्हें नहीं जानतीं किन्तु वे तो आपको जानते हैं।
अचानक से नीलिमा चौंकी और पूछा -कैसे ?
आपका इतना नाम है ,''समाचार पत्र ''में भी आपके कई लेख छप चुके हैं। उसने स्पष्ट किया , मैं जानता हूं ,रकम बहुत बड़ी है, किंतु आपके पास सुरक्षित रहेगी।
नीलिमा चाहती तो नहीं थी,कि वह उस पैसे को अपने पास रखें कल को चोरी हो गए या कुछ हो गया तो वह कैसे इतनी बड़ी रकम चुकाएगी ? उस कुछ समझ नहीं आ रहा था, इसे किस तरह से मना करें ? फिर सोचा-दो-तीन दिन की ही तो बात है ,आकर ले जाएगा। तुम ''जावेरी जी ''के आदमी हो, और तुम्हारा नाम क्या है ?यह तो मुझे पता ही नहीं है , मेरा नाम 'डैनी 'है और मैं उनका ड्राइवर हूं।
ठीक है, तुम यहां यह पैसा रख कर जा सकते हो , किंतु शीघ्र ही, लेकर चले जाना, दूसरे की इतनी बड़ी अमानत मैं ज्यादा दिन नहीं रख पाऊंगी। नीलिमा ने उससे कहा और वह चला गया। जब वह चला गया तब नीलिमा ने सोचा -एक बार ब्रीफकेस खोल कर देख तो लूं ! 20 लाख कितनी बड़ी रकम होती है ? हैं भी या नहीं ,उसने उस ब्रीफकेस को खोलकर देखा। उसमें नोटों की गड्डियां सजाकर रखी गई थीं किंतु तभी दूसरे की अमानत का स्मरण होते ही ,उसने वापस वह सूटकेस बंद किया और घर के अंदर रख लिया।
वह सोच रही थी -कि यह मैंने अच्छा किया या बुरा ! कुछ समझ नहीं आया और फिर उसने वह सूटकेस अपने, बेड के नीचे रख दिया। जब रात्रि होने को आरंभ हुई तब उसे डर लगने लगा कि मैंने इस सूटकेस को यहां रखकर, शायद बहुत बड़ी गलती कर दी। मन ही मन सोचा -कल जाकर इस रकम को, अपने लॉकर में रखकर आ जाऊंगी और जब इसकी आवश्यकता होगी और तब मैं ,उसे वहीं से वापस कर दूंगी। इससे पैसे भी सुरक्षित रहेंगे ।
