Tadap [part 106]

 दोनों पति -पत्नी की आपस की बात थी ,आपस के झगड़े थे किन्तु चंदा देवी ने उनके मध्य आकर ,उस झगड़े को एक नया ही रूप दे दिया। जिसके कारण प्रवीण ने चिढ़कर , ऐश्वर्या का हाथ पकड़ा ,लगभग उसको घसीटते हुए ,मुख्य द्वार  तक ले गया और उसे घर से बाहर कर दिया। जा !!!तुझे जहाँ जाना है ,भाग यहाँ से...... तेरे जो जी में आये कर लेना। जो ऐश्वर्या आज तक ,ऐसे ही कभी सब्जी लेने के लिए भी बाहर सड़क पर खड़ी नहीं हुई ,आज सड़क खड़ी थी। उसने अपने आस -पास देखा। अपने को नितांत अकेला देख ,उसके आंसू निकल आये। आज उसे एहसास हुआ। जिस प्रवीण को अपना समझ ,अपनी गृहस्थी समझ रात -दिन उस परिवार को दे दिए। वो भी अपना कहाँ है ? अब तक चंदा देवी को ,ही इन झगड़ों की वजह समझ रही थी ,किन्तु प्रवीण में भी तो उनके दिए संस्कार ही है ,वही खून है ,वो तो अपना असर दिखायेगा ही........  इस तरह उसे सड़क पर खड़ी देख पड़ोसी क्या समझेंगे ? यही सोचकर आगे बढ़ गयी। इस समय उसका अपना कौन है ?इससे पहले भी तो कई बार चंदा देवी ने ऐसे हालात पैदा कर दिए थे ,उसका मन किया कि आत्महत्या कर लूँ ,छत से कूदकर जान दे दूँ किन्तु अपने आपको ही समझाया ,''आत्महत्या करना कायरता है। ''आत्महत्या करके मैं इस तन से तो मुक्त हो जाउंगी किन्तु मेरी छोटी बच्ची छवि जिसने अभी दुनिया देखी भी नहीं , उसे किस बात की सजा मिले ?वो क्यों बिन माँ की बेचारी बच्ची बनकर जिए ?


 जब इन लोगों को मेरे जीने से कोई फर्क नहीं पड़ता ,तो मेरे मरने के पश्चात ही ,क्या फर्क पड़ जायेगा ? प्रवीण कहने को तो मेरा पति है किन्तु आज तक इसने अपने कौन से उत्तरदायित्व पूर्ण किये ? दुःख -दर्द में सिमटी ये ज़िंदगी ,मेरी बच्ची के लिए अपवाद न बन जाये ,किससे उम्मीद कर सकती हूँ ? कि मेरे मरने के पश्चात ,इसे अच्छी परवरिश देंगे। प्रतीक और उसकी पत्नी जो ''चलती गंगा में हाथ धोते हैं। ''ये भी किस्मत की बात है ,जबसे करुणा आई है ,तब से चंदा देवी भी ऐसी हो गयीं ,घर के सम्पूर्ण कार्य करती हैं ,जिसने कभी मेरे सामने ,कोई कार्य नहीं किया ,उनके कपड़े भी मैंने ही धोये ,सुखाये। वो आज झाड़ू -पोछे से लेकर ,कपड़े धोने ,सुखाने ,बर्तन साफ करने तक के सभी कार्य करती हैं। सब किस्मत की बात है ,मुझे कार्य करते -करते भी वो मान नहीं मिला ,जो करुणा को बिना किये मिल रहा है। 

एक दिन प्रतीक को दिखाया था ,ये वही तुम्हारी माँ है ,मेरे कार्य करने पर भी इन्हें संतुष्टि नहीं थी और अब स्वयं कार्य करती हैं ,ये भी नहीं सोचतीं -कि अब बड़ी देखेगी तो ,क्या कहेगी या सोचेगी ?

क्या करें ? बड़े -बूढ़ों  को अपना मान बचाये रखने के लिए ,ये सब करना ही पड़ता है। 

क्यों ?मेरे सामने तो बैठी रहती थीं ,अब तो लाड़ले बेटे की लाड़ली बहु है ,अब तो आराम करें। 

तुम क्यों सिरदर्दी लेती हो ?उनकी इच्छा ! वो करें या न करें ,कहकर प्रवीण ने बात को टाल दिया था। 

घर को संवारते -संवारते मेरी क्या हालत हो गयी ?तब भी इन लोगों की नजर में ,कोई मूल्य नहीं। क्या ऐसे ही  घर ,सजते -संवरते हैं ?उनके अंदर का दर्द कोई नहीं देखता ,न ही समझता है। वह सड़क पर ऐसे ही चले जा रही थी और आस -पास के घरों को देख रही थी। इन घरों में न जाने किसकी ,कितनी पीड़ा छुपी होगी ?''ये आवश्यक नहीं कि हर घर की बहु ही परेशान और दुखी रहती है। किसी -किसी घर के बुजुर्ग भी अपनी नम आँखों को झुका लेते हैं ताकि घर की बात घर में ही रहे। ''

मुझे देखो ! मैं पापा की परी ,न ही ,अब वो घर मेरा रहा और इस घर से भी निकाल बाहर किया। इंसान ज्ञान के बोझ से दबा जा रहा है। हर किसी को ज्ञान बांटता फिरता है ,किन्तु जब अपनी बारी आती है ,वही ज्ञान न जाने कहाँ चला जाता है ?सब यही कहते नजर आते हैं -''दुनिया में कुछ नहीं रक्खा ,सब यहीं रह जाना है ,फिर भी न जाने किस बात के लिए लड़ता है ?'' जिसने भी आज तक गलत का विरोध किया वो मेरी तरह सड़क पर आ जाता है। इसी सोच के साथ वर्तमान में आई ,अब कहाँ जाऊँगी ?सीधी चले जा रही थी। रूककर कहीं खड़ी भी तो नहीं रह सकती थी । उसकी आँखों में आंसू थे ,रात्रि का समय था। आगे बढ़ती जा रही थी। माता -पिता के घर भी नहीं जाउंगी जिन्होंने मुझे घर से निकालकर आज तक यह जानने का प्रयास ही नहीं किया। हमारी लड़की कैसी हैं ?कभी सुरक्षा की भावना नहीं भरी ,कि बेटा वो तेरा घर है तो ये भी तेरा ही घर है। तू इस घर की बेटी है ,अपने को कभी अकेला न समझना। उन्हें तो हमारे दुःख -दर्द से ज़्यादा दुनिया की चिंता ज्यादा है। 

उनकी बात भी तो सही है ,उनका सहयोग नहीं है ,तभी मैं ,वहीँ रहकर अपने अधिकार के लिए लड़ती आई हूँ वरना अब तक अपने घर में ही होती किन्तु सहन करने की भी तो सीमा होती है। कब तक सहन करूं ?क्या इसका कोई अंत नहीं है ?एकदम से तेज रुलाई फूट पड़ी ,तभी बराबर में जाते एक व्यक्ति ने उसकी तरफ देखा। इतनी रात्रि को अब कहाँ जाउंगी ? पास में ही ,जंगल हैं ,वहाँ चली जाती हूँ ,इन इंसानों की भीड़ से तो बची रहूंगी ,ऐसे में रात्रि में ,वैसे ही इंसानी रूप में ,भूखे भेड़िये निकलते हैं जो जंगली भेड़ियों से ज्यादा खतरनाक हैं। अच्छा ही है ,बेटी के मोह ने मरने नहीं दिया किन्तु जब कोई जंगली जानवर खा जायेगा तब इस दुःख -दर्द से तो मुक्ति मिलेगी। ऐश्वर्या इस छोटे से रास्ते में ,न जाने कितनी मौतें मरी है ?

चंदा देवी सोच रही थीं  ,इसे मजा चखाना जरूरी था ,इसकी बहुत ज़बान चलने लगी है। जब लगा ,बेटे ने मेरे अभिनय के कारण ,बहु को घर से निकाल दिया तो मन ही मन प्रसन्न हुईं, कि आज भी मेरा बेटा ,मेरे कहे में है। चंदा देवी भी एक औरत हैं ,उन्होंने भी पत्नी ,माँ ,सास देवरानी -जेठानी कई रूप देखे किन्तु औरत होकर भी औरत का मान न रख सकीं। एक माँ का ,घर की लक्ष्मी का ,मान नहीं रख सकीं । बड़ी होने के नाते ,उस रिश्ते को संभालने की बजाय और उलझाकर रख दिया। क्या उनके मन में ऐश्वर्या के प्रति इतना घृणा का भाव था ?अपने बेटे की ज़िंदगी और उसके परिवार से ही खेल गयीं। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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