Tadap [part 107]

चंदा देवी के अभिनय के कारण ,प्रवीण ने ऐश्वर्या को ,हाथ पकड़ कर घर से बाहर कर दिया। उसे लग रहा था कि ऐश्वर्या के इस तरह बोलने पर ,मेरी मां का अपमान हो रहा है। न ही कोई सच्चाई देखना चाहता है और न ही कोई सुनना चाहता है। प्रवीण को ऐश्वर्या ने शराब पीने से रोका, तो यह भी उसे बर्दाश्त नहीं हुआ और दोनों के मध्य  उनकी मां आ गई और वह गलत का समर्थन कर रही थीं। और जब ऐश्वर्या ने अपनी बात रखी तो उन्हें बुरा लगा। मन ही मन हो प्रसन्न हो रही थीं  कि मैंने आखिर इसको सबक सीखा ही दिया और इस बात पर भी उन्हें विश्वास हो गया, कि मेरा बेटा मेरे हाथों से नहीं निकला है। आज भी मेरे लिए ,वह कुछ भी कर सकता है। सोच रही थीं ,वह इस समय कहां जाएगी ? जब उनका अहंकार संतुष्ट हो गया तब वह ऐश्वर्या को बाहर देखने के लिए आईं , ताकि उसे नसीहत दे सकें ,कि मुझसे उलझने का प्रयास मत करना ,किंतु बाहर  ऐश्वर्या नहीं थी। तुरंत ही घर के अंदर गईं और बोलीं - वह कहां है ? तब तक प्रतीक और करुणा भी अपने घर से बाहर आ चुके थे। 

उन्होंने पूछा -आप किसकी बात कर रही हैं ?

 अरे वही, उन्हें अभी ऐश्वर्या का नाम लेते हुए भी जोर पड़ रहा था , प्रतीक से बोलीं - तेरी भावज !

कहां गई ? उसने उनसे प्रश्न किया। 



पता नहीं ,दोनों पति-पत्नी में झगड़ा चल रहा था, नाराजगी में प्रवीण ने उसे घर से बाहर कर दिया कहते हुए उनके चेहरे पर क्षणिक मुस्कुराहट आई किन्तु शीघ्र ही अपने को संभाला और बोलीं - उसके नखरे तो देखो ! न जाने कहां चली गई ? अभी भी उन्हें ऐश्वर्या से कोई सहानुभूति नहीं थी। अब उन्हें लगा उनकी बाजी पलट गई, तब बोलीं -यह कितनी अहंकारी औरत है ? दोनों पति-पत्नी में न जाने क्या बातचीत हुई और देखो ,अहंकार में पता नहीं कहां चली गई ? उन्होंने ये नहीं बताया कि उन्होंने ही उनके झगड़े में घी डालने का कार्य किया था। 

इतनी रात्रि में, कहां जाएंगीं ?करुणा ने पूछा। 

ऐसे तो पति-पत्नी में झगड़ा होता भी रहता है , यह अजीब ही औरत है , तभी प्रवीण को आवाज़ लगाई -अरे प्रवीण ! जा उसे देखकर तो आ ! वह कहां गई है ?

प्रवीण तो पहले से ही नशे में था , बोला -जाने दो !जहां भी गई है, रोज-रोज की चिक -चिक से तंग आ चुका हूं। 

अरे तू बात को समझ नहीं रहा है, रात में कुछ हो गया तो ,किसी को क्या जवाब देंगे ? किसी पड़ोसी ने पूछ लिया कि तुम्हारी बहू कहां गई है ? कल को उसके माता-पिता पूछेंगे -हमारी बेटी कहां है ? क्या जवाब देंगे ? चंदा देवी ने अपनी जिंदगी में बहुत नाटक किये , कुछ लोगों की तो जिंदगी तहस-नहस करके ही रख दी। उद्देश्य तो ऐश्वर्या की जिंदगी का भी तहस-नहस करने का ही था और उसमें कोई कमी भी नहीं छोड़ी थी। किंतु सब पारिवारिक स्थिति को देखते हुए , चुपचाप सहन कर जाते थे या उनसे बचकर ही रहते थे। शायद ऐसे खेल में उन्हें मजा ही आता है किंतु ऐश्वर्या के इस तरह चले जाने पर, वह बुरी तरह घबरा गई। वह तो यह सोच रही थी, बाहर खड़ी होगी, घर में अंदर आने के लिए गिड़गिड़ाएगी किंतु उसको कहीं ना देखकर , घबरा उठीं  और प्रवीण को जबरदस्ती देखने के लिए बाहर भेजा। ऐश्वर्या की उन्हें कोई चिंता नहीं थी, उन्हें चिंता इस बात की थी यदि इतनी रात्रि में, उसे कुछ हो गया तो कहीं पुलिस केस न हो जाए ? या उसके माता-पिता कुछ पूछेंगे तो ,हम क्या जवाब देंगे ? हालांकि उसके माता-पिता को भी वह झेल सकती थीं किंतु पुलिस को झेलना उनके लिए नामुमकिन लग रहा था। 

प्रवीण ने गाड़ी निकाली और ऐश्वर्या को ढूंढने चल दिया उसे लग रहा था ,वह ज्यादा दूर नहीं गई होगी यही पास में होगी। किंतु उसे ऐश्वर्या कहीं भी दिखाई नहीं दी। अब तो उसकी शराब का नशा भी, उतर गया उसे भी पसीने आने लगे। आखिर इतनी रात्रि में कहां चली गई ? उधर ऐश्वर्या सीधी सड़क पर चले जा रही थी , मन ही मन घबरा भी रही थी किंतु इस समय उसे जंगल के सिवा और कुछ नजर नहीं आ रहा था। शीघ्र वह , एकांत देखकर एक पेड़ के नीचे बैठ गई और अपने हालात देखते हुए रोने लगी। सोच रही थी -मैं क्या थी और क्या से क्या हो गई ? मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था -मेरी जिंदगी ऐसी हो जाएगी। तभी उसे लगा जैसे वहीं करीब में कोई है , वह एकदम से सतर्क हो गई ,यह देखने के लिए कि कौन है ? अंधेरे में ठीक से कुछ दिखाई भी नहीं दे रहा था।

 तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा , और वह चीखी - कौन है ? 

उसने पलट कर देखा, तो प्रवीण खड़ा था , बोला - तुम यहां कैसे आ गई ?

तुम्हें इससे क्या ? तुमने तो घर से बाहर कर दिया न....... कहते हुए उसने मुँह फेर लिया। 

चलो !घर चलो ! मैं तुम्हें लेने आया हूँ। 

नहीं मुझे नहीं जाना ,अब तुम ही अपने उस घर में रहो ! मेरा तो वहां कुछ है ही नहीं ....... 

कैसे नहीं है ?मैं हूँ ,तुम्हारे दो छोटे -छोटे बच्चे हैं। 

बच्चों का स्मरण होते ही ,उसका धैर्य जबाब दे गया ,वह जोर-जोर से रोने लगी। अब उसकी हिड़की बंध गयी थी। तुमने मुझे बाहर करने से पहले तनिक भी नहीं सोचा -यह इतनी रात्रि को कहां जाएगी ? जो तुम्हारे सुख और दुख में साथ खड़ी रही , उसकी तुम्हारी नजरों में इतनी ही कीमत है। मां ने थोड़ा सा ड्रामा क्या कर दिया , मेरे विषय में एक बार भी नहीं सोचा -कि अपना घर छोड़कर तेरे साथ है ,तेरे सभी रिश्तों को अपनाया, उन्होंने जैसा भी व्यवहार किया ,सहन किया। मानती हूं, लोग तुम्हें देखकर , अच्छा बेटा ,राजा बेटा कहेंगे !मां का लाडला भी कहेंगे! किंतु एक बार भी यह सोचा -कि मुझ पर क्या बीत रही होगी ? मेरे बच्चों का क्या होगा ? जाओ ! अपनी मां से, अच्छे बेटे होने का तमगा  ले लो !और मेरी बात याद रखना, जो महिला अपनी पति ही ना हुई, अपने बच्चों की नहीं हुई। वह किसी और की क्या होगी ? यह मेरे संस्कार ही थे , जो मैं उन्हें अपने घर के अंदर आने देती थी। कभी विरोध नहीं किया, सोचा - माँ  है, घर में नोक झोक झगड़ा तो होते ही रहते हैं किंतु इन्हें अपने पुत्र पर अधिकार तो है। मैं उन्हें आने से मना भी तो कर सकती थी। झगड़ा तो तब भी हो सकता था, आज भी मैं पूजकर उन्हें 'बायना 'देती हूं, तुम लोगों ने मेरी सच्चाई और अच्छाई का गलत ही अर्थ निकाला  क्योंकि तुम लोग स्वयं गलत थे। ऐसे में अच्छे इंसान को तो तुम लोग बर्दाश्त ही नहीं कर पाते। 

अच्छा , अब घर चलो ,तुम्हें जो भी कहना है घर चलकर कहना !

नहीं ,अब मैं नहीं जाऊंगी, कह कर ऐश्वर्या ने प्रवीण से अपना हाथ छुड़ा लिया और फिर से पेड़ की तरफ बैठने के लिए चल दी। 

ऐश्वर्या तुम बात को समझा करो ! प्रवीण के स्वर में व्यग्रता  थी , उसे लग रहा था कि उसने गलती तो की है किंतु अभी उसे सुधारा कैसे जाए ? वह वहीं , ऐश्वर्या के करीब आकर बैठ गया और बोला -जब तक तुम नहीं जाओगी तो मैं भी नहीं जाऊंगा। उसके इस अधिकार की भावना से ,फिर से ऐश्वर्या की आंखों में आंसू आ गए और रोते हुए बोली -वहां मेरा क्या है ? कौन है मेरा, किसके लिए जाऊं ? यदि यह प्यार का परिणाम यही होता है , तो मैं भगवान से दुआ करुंगी कि ऐसा प्यार किसी को ना मिले। कम से कम उसे उम्मीद तो रहेगी, कि  कोई हमें प्यार करता था। 

अब जो हो गया सो हो गया ,तुम उसे भूल जाओ !

भूल जाऊँ ? कैसे भूल जाऊं ? मैंने ऐसा क्या कह दिया था ? जिसका परिणाम मुझे ऐसे मिला। तुम्हारे  स्वास्थ्य को सोचकर ही, तो मैं कह रही थी , बच्चों के भविष्य के लिए सोच कर ही तो कह रही थी। कभी तुमसे कुछ मांगा नहीं, अक्सर अपनी सहेलियों से सुनती ,मेरे पति ने मुझे यह दिया ,मेरे पति ने मुझे उपहार में वह दिया ,तुमने आज तक मुझे क्या दिया ? सिर्फ दुख -दर्द के सिवा !!

तुमने कभी कुछ मांगा ही नहीं, हंसते हुए प्रवीण बोला। 

मांगने पर ,कौन उपहार देता है ? उपहार अपनी इच्छा से दिया जाता है। तुममें वह इच्छा ही नहीं है बात उपहार कि नहीं है ,मुझे कोई ऐसी आवश्यकता भी नहीं है, मेरी आवश्यकताएँ बहुत सीमित हैं  यह तुम जानते हो ! कभी किसी भी चीज के लिए जिद नहीं की, किंतु इतना सब करने के बावजूद भी ,मुझे क्या मिला ? वह प्रवीण की आंखों में देखते हुए पूछती  है। तभी एक तेज रोशनी उन दोनों के ऊपर पड़ती है, दोनों की ही ,आंखें बंद हो जाती हैं।

 तभी एक स्वर गूंजा -ए। ...... यहां क्या हो रहा है ? कौन हो ? तुम लोग ! ऐश्वर्या ,प्रवीण ने ऐश्वर्या का हाथ थामा और पेड़ के पास से, उठाकर ले आया। वह एक पुलिस वाला था , उसके करीब जाकर प्रवीण खड़ा हो गया। 

क्या कर रहे हो ? 

कुछ नहीं जी ,घर जा रहे हैं , कुछ देर के लिए यहां बैठ गए थे। 

तो जाओ ! अपने घर जाओ यहां कोई बैठने की जगह नहीं है , उन्होंने चेतावनी दी। प्रवीण ने ऐश्वर्या का हाथ थाम कर उसे गाड़ी में बैठाया, और घर की ओर रवाना हो गया। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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