Tadap [part 102]

ऐश्वर्या कुछ दिनों के लिए ,अपने घर को संभालने, उसे सजाने में व्यस्त हो गयी। घर की साफ -सफाई ,बच्चों को नहलाना ,बेटी को तैयार कर स्कूल भेजना ,खाना बनाना ,कपड़े धोना इत्यादि कार्यों में व्यस्त हो गयी। वहां तो शारीरिक और मानसिक कष्ट दोनों ही सहे। कम से कम यहाँ सुकून से तो रह सकूंगी। जहाँ रहना है ,दो रोटी खानी हैं तो श्रम करना ही पड़ेगा। बैठे ,बिठाये खाने को कोई नहीं देकर जाता।  किन्तु जिन इंसानों की ज़िंदगी में कष्ट लिखे होते हैं। इतनी शीघ्रता से समाप्त नहीं होते ,न जाने भगवान ने क्या सोचकर उनकी ज़िंदगी में कष्ट लिखे होते हैं। ऐश्वर्या या तो पिछले जन्मों  का हिसाब चुका  रही है ,या फिर ईश्वर उसके धैर्य की परीक्षा ले रहा है। कष्ट उन्हें ही देता है ,जिनमें सहन करने की क्षमता हो। ख़ैर !ईश्वर ने जो भी सोचा हो किन्तु ऐश्वर्या अभी भी निश्चिन्त होकर नहीं रह पा रही थी। जब उसने प्रवीण को घर में पीकर आते देखा। 

आपने फिर से पीना आरम्भ कर दिया ,जब शराब पीनी छोड़ दी थी तो अब ऐसा क्यों ?

कभी खुश भी हो जाया कर...... मैंने ये घर बनवाया ,अब मजे से रहेंगे इसीलिए नहीं कि मैं तेरे भाषण सुनूँ। जा ये अंडे भी उबालकर ले आ ...... !


ये आप क्या कह रहे हैं ?मैंने घर में देवी माँ की मूर्ति स्थापित की है। यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं बनेगा। वह यह कहकर रसोई में खाना बनाने चली गयी। खाना बनाते हुए ,अपने मन को समझाया ,जब पति इतने मन से ये अंडे लाया है ,तो क्यों टोका -टाकी करना ?अब ले आये तो ले आये ,उबालकर दे दूंगी। बाद में समझा दूंगी ,यही सोचकर रसोई से बाहर आई और अंडे वाला थैला ढूंढने लगी। जब कहीं  दिखलाई नहीं दिया ,तब प्रवीण से पूछने कमरे में गयी और प्रवीण से बोली -आपने वे अंडे कहाँ रख दिए ?उबालकर ले आती हूँ। पहले तो प्रवीण कुछ बोला नहीं ,दुबारा पूछने पर ,बिस्तर से उठा और पीछे से चोटी तो नहीं पकड़ी किन्तु उसका सिर पकड़कर ,लगभग खेंचते हुए बाहर ले गया और सड़क पर पड़े अण्डों को दिखाते हुए बोला -वे पड़े !अब उबाल ले !

उसके इस तरह के व्यवहार से ऐश्वर्या सकते में आ गयी। उसे कुछ कहते नहीं बना ,तू इतनी नीच औरत है ,तू किसी को खुश नहीं रहने दे सकती। सोचा था ,अब मम्मी की चिक -चिक न होगी ,आराम से मजे करेंगे किन्तु तू तो ,मेरी माँ बनने का प्रयास कर रही है और गाली -गलौच करते हुए बिस्तर पर लेट गया। अब तक बच्चे ,ऐसा देखकर डरकर अंदर चले गए थे और वहीँ बैठे सो गए। वाह !री  किस्मत !कैसा पलटा खाया ?अब प्रवीण का ये दूसरा रूप देखने को मिला। मन कसैला हो गया ,खाना खाने का मन नहीं किया। न ही प्रवीण ने खाया। इन लोगों से अलग होकर मुझे क्या मिला ? मैंने तो सोचा था ,कि अब आराम से जीवन बसर करेंगे किन्तु बात तो वही रही ,पहले माँ थी ,अब बेटा हो गया। बिस्तर के दूसरे कोने पर करवट बदले देर तक रोती रही। तब अपने को ही समझाया ,प्रवीण के अपने भी तो कुछ अरमान रहे होंगे ,कभी इसने मुझसे तो कुछ नहीं कहा ,माँ के ड़र के साये में ये तो बचपन से ही अपना जीवन बसर कर रहा है। अब सोचा होगा। अपने आप कमाने भी लगा हूँ ,अब अपने मन मुताबिक ज़िंदगी जियेंगे। 

तो क्या ?ये ऐसी ज़िंदगी जीने की तमन्ना करता है ,इस आधार पर तो जो कमाया है ,वो भी चला जायेगा। बच्चों पर भी, इस बात का गलत असर होगा। पीने की लत लग गयी, तो क्या होगा?

अभी भी वे लोग ![सास और देवर ]पड़ोस में ही तो रहते हैं ,उन्हें हमारे झगड़े का पता चला तो हँसेंगे, कि इनकी तो आपस में ही नहीं बन रही। ये तो वही बात हो जाएगी -

                                                   ''काम बिगाड़ा आपना ,जग में होत हंसाई। '' 

अक्सर पापा ऐसा ही कुछ कहते थे। अपना रोना भूलकर ,कल घर के वातावरण को कैसे सहज बनाना है ? अब उसके दिमाग में ये बात थी ,अभी तो प्रवीण से बात करना व्यर्थ है ,कल बात करूंगी। यही सोचकर एक नजर प्रवीण की तरफ देखा। सोते हुए ,कितना भोला लग रहा है ?अभी कुछ देर पहले, उसके साथ क्या हुआ था ?उसने भुला दिया,अपने घर को बनाये रखने के लिए ,अपने मान -अपमान से ऐश्वर्या ने सौदा किया। यह प्यार या समझदारी की बातें नहीं जानता क्योंकि ये चीजें न ही, इसने देखीं और न ही जानता है। सैक्स को ही प्यार ,मोहब्बत समझता है ,इससे आगे यह सोच ही नहीं सकता यही सोचकर ,ऐश्वर्या ने लाइट बंद की और प्रवीण से लिपटकर लेट गयी ,कुछ देर दोनों इसी तरह पड़े रहे ,कुछ देर पश्चात शायद प्रवीण को ऐश्वर्या का स्पर्श महसूस हुआ और उसने उसके हाथ को छुआ और धीरे -धीरे प्रवीण के हाथ ,ऐश्वर्या के  शरीर पर रेंगने लगे। 

यह कहानी सिर्फ ऐश्वर्या की ही नहीं है ,न जाने कितनी ऐश्वर्या ,आज भी ऐसी ही ज़िंदगी जी रही हैं। हालाँकि आज की नारी जागरूक है ,पढ़ -लिखकर आगे बढ़ रही है किन्तु आज भी न जाने , कितने घर ऐसे हैं ?जो घर दिखलाई देते हैं, किन्तु उन घरों में न जाने कितनी ऐश्वर्या अपने मान -अपमान को भूला चुकी हैं ,तभी वे घर आज बसे हुए दिखलाई दे रहे हैं। आज की नारी जितनी जागरूक हो गयी है ,उतने ही घर आजकल ,अपने मान -अपमान को लिए, अदालत के चक्कर लगा रहे हैं। वे घर बसते ही कहाँ हैं ?अपने -अपने अहं  को लिए गलियों में धक्के खा रहे हैं। 

अगले दिन ,ऐश्वर्या नियत समय पर उठी और अपने घर के कार्य चुपचाप करती रही ,प्रवीण को चुपचाप चाय और अख़बार पकड़ा दिया। प्रवीण उसे देख तो रहा था किन्तु बोल नहीं रहा था ,सोच रहा था ,पहले यही बोलेगी ,मैं क्यों बोलूं ? तब ऐश्वर्या ने छवि को स्कूल जाने के लिए तैयार किया और प्रवीण से बोली -आप इसे इसके स्कूल छोड़ आइये ,तब तक मैं आपके लिए भी नाश्ता बना दूंगी। 

प्रवीण चुपचाप उठा ,और छवि को लेकर चला गया। ऐश्वर्या नाश्ता बनाने में व्यस्त हो गयी। ऐश्वर्या ने ऐसा जाहिर ही नहीं होने दिया ,जैसे उनके मध्य रात्रि में कोई नोकझोंक भी हुई है। प्रवीण छवि को छोड़कर आया और नाश्ता किया प्रसन्न होते हुए ,बोला -बाजार से कुछ सामान तो नहीं मंगाना है। 

नहीं ,अभी कुछ नहीं मांगना है ,किन्तु एक बात कहनी थी। 

कहो !

ऐश्वर्या अभी भी सोच रही थी -कहूं या नहीं ,अभी -अभी तो बात सम्भली है कहीं फिर से न बिगड़ जाये ,अब उसे प्रवीण से बात करते हुए भी पहले सोचना पड़ता। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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