Sazishen [part 73]

 तुषार ने ,कल्पना को शांत किया और उसे समझाया, उसे इस बात का दुख था, कि डिजाइन तो ,कल्पना ने अच्छे बनाये थे, फिर उसके साथ ऐसा कैसे हो गया ?वह कल्पना के दुख को कम तो नहीं कर सकता था किंतु बांट अवश्य सकता था। जब उसे पता चला, कि ''सुनैना ''इस प्रतियोगिता में प्रथम आई है, तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ,एकदम से बड़ा झटका लगा।  न जाने क्या सोचकर, वह कल्पना से कहता है - तुम यहीं बैठो ! मैं अभी आता हूं। वह वहां से चला गया और सीधे, जो उस प्रतियोगिता में उस कॉलेज के जज थे और कॉलिज के प्रधानाध्यापक  के सामने पहुंच गया। सर ! मैं यह क्या सुन रहा हूं ?सुनैना जो एक औसत दर्जे की विद्यार्थी है, वह इस प्रतियोगिता में प्रथम आई है। ऐसा कैसे हो सकता है ? वह तो डिजाइन भी कॉपी कर लेती है। 


हमें भी ,इस बात का आश्चर्य है ,मिस्टर तुषार ! पर हम क्या कर सकते हैं ? उन्हें बुलाया ही  इसीलिए गया था कि हमारे मेधावी  छात्रों को आगे बढ़ने का एक अवसर मिले और अन्य बच्चों को प्रोत्साहन मिले कि अच्छा करेंगे। तो इसी तरह आगे, जाकर हमारे कॉलेज का नाम बढ़ाएंगे।प्रधानाध्यापक ने जबाब दिया। 

 'सुनैना 'भी तो इसी कॉलेज की छात्रा है, अब यह उसका भाग्य कह सकते हैं, कि वह प्रतियोगिता जीत गई। वरना हमें तो उम्मीद ही नहीं थी ,मेहनत तो उसने भी की है। अब उन डिजाइनों को पसंद करना,  तो चीफ गेस्ट के हाथ था क्योंकि उनको जो पसंद आएगा वही तो, वे  अपनी कंपनी में आगे लेकर जाएंगें। अब इस चीज में हम उनसे मना भी नहीं कर सकते थे , हमारे लिए तो सभी छात्र बराबर है ,श्रीमती अवस्थी बोलीं। 

उस कॉलेज के प्रधानाध्यापक ने तुषार को समझाने का प्रयास भी किया। 

किंतु आप यह तो देखिए -एक लड़की है ,कल्पना ! उसने रात दिन मेहनत की है और बड़े परिश्रम से डिजाइन तैयार किए हुए हैं और उसके डिजाइन बहुत अच्छे हैं ,मैंने देखे भी हैं। हां ,हम सभी की नजर उस पर थी ,किंतु क्या कर सकते हैं ? कल्पना के डिजाइन उन्हें पसंद नहीं आए ,'सुनैना 'भी हमारे कॉलेज की ही छात्रा है। ,सभी का अपना-अपना टेस्ट है। वह लोग इतनी बड़ी कंपनी चला रहे हैं तो हो सकता है उनके लिए वही बहुत अच्छा होगा। 

कुछ समझ नहीं आ रहा ,क्या सही है, क्या गलत है ? क्रोधित होते हुए ,तुषार बाहर आया। 

तब तक नीलिमा भी, आ चुकी थी ,कल्पना ने उसे देखते ही पूछा -मम्मा  आप कहां चले गए थे ? 

मैं एक बहुत ही महत्वपूर्ण खबर लेकर आई हूं, जिसके लिए मैं परेशान थी ,आज वही कार्य पूर्ण हो गया। तूने अपनी 'चीफ गेस्ट 'को तो देखा है न....... 

हां देखा तो है निराशा भरे  स्वर में कल्पना बोली। 

वह ,तुम्हें कुछ पहचानी हुई सी नहीं लग रही थी। 

क्या आपको भी ऐसा लगा ?मम्मा को मेरी कोई फ़िक्र नहीं है ,जिसने मेरी'' मेहनत मिटटी में मिला दी '',उसी के विषय में मुझसे पूछ रही हैं ,प्रत्यक्ष बोली -हां ,100% 

मुझे भी वही लगा था, किंतु मैंने सोचा -वह कहां और यह कहाँ? दोनों की शक्ल तो मिलती है किंतु रहने सहने में बहुत अंतर है ,पहनावे में भी अंतर है। हमशक़्ल भी हो सकती है। 

मैं उसी का पीछा करने गई थी, नीलिमा ने स्पष्ट किया। 

क्या कह रही हैं, आप !आश्चर्य से कल्पना ने पूछा। 

हां तुम सही सुन रही हो, और मैंने पता भी लगा लिया है, कि वह किस बंगलो में रहती है ?

उससे हमें क्या लाभ होगा ? लाभ या हानि तो मैं नहीं जानती किंतु इससे एक और अच्छी बात हो गई है।नीलिमा उत्साहित  बोली।  वह क्या हुआ ? पहले तो वह उसे मन की बात बताने वाली थी किन्तु रुक गयी और बोली -अब तुम घर चलो !बाद में मैं तुम्हें सारी बात बताऊंगी। कहते हुए नीलिमा ने कहा -अपना समान उठाओ और घर चलो !

किंतु मम्मा ! मैं आज आपको...... उसने इधर-उधर देखा। अब तुषार न जाने कहां चला गया ? मन ही मन सोचकर परेशान हो रही थी। 

नीलिमा ,इतना तो समझ गयी ,कि शायद ये उसी लड़के के विषय में , बात करना चाहती होगी। तुम उसे छोड़ो !मैं उससे बाद में मिल लूंगी , किंतु जो मैं बात तुम्हें बताने जा रही हूं ,वह बहुत जरूरी है। 

अपनी सारी  डिजाइनर ड्रेस कल्पना ने एक बैग में भर लिए , जाते हुए ,बार-बार पीछे मुड़कर देख रही थी काश !कि तुषार दिख जाए किंतु तुषार न जाने कहां चला गया ? उधर तुषार इस बात से परेशान था कि यह सब कल्पना के साथ ही क्यों हुआ ?यह मेरी जिंदगी से ही जुड़ा हुआ है ? मैं कल्पना के जुड़ा हुआ हूं और मेरा दुख -दर्द वह भी ,कल्पना के साथ जुड़ गया इस बात को सोचकर ही वह दुखी हो रहा था। 

दोनों मां - बेटी गाड़ी में बैठीं और घर की ओर चल दीं। रास्ते में भी ,कल्पना ने अपनी मम्मा से पूछा था - मम्मा ! आखिर बात क्या है ?मुझे बताओ तो सही, किंतु उसके लिए यह बात इतनी रहस्यमई थी उसे लग रहा था कि कहीं कोई और सुन ना ले। घर जाकर ही संपूर्ण बात उससे कहेगी और घर पहुंचते ही बोली - क्या तुझे मालूम है ? मैंने '' जावेरी प्रसाद '' के बंगले को देखा है। 

क्या कह रही हैं ,आप ! आश्चर्चकित होते हुए ,कल्पना ने अपनी माँ से पूछा -इतने बड़े शहर में ''जावेरी प्रसाद ''आपको कहां मिल गए और आप यह कैसे जानती हैं ,कि'' जावेरी प्रसाद ''मुंबई में ही रहते हैं। 

उसके ड्राइवर ने ही मुझे बताया था। विश्वास के साथ नीलिमा बोली। 

किन्तु मम्मा ! यहाँ तो बहुत बड़े-बड़े लोग रहते हैं ? हो सकता है, आपके ''जावेरी प्रसाद ''कोई और हों और यह'' जावेरी प्रसाद ''कोई और हों , एक ही नाम के दो व्यक्ति भी तो हो सकते हैं। 

इतना सब तो उसने सोचा ही नहीं था ,बेटी की यह बात सुनकर, नीलिमा का उत्साह एकदम ठंडा पड़ गया। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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