अब कल्पना को एक उम्मीद है कि वह, कॉलेज के कार्यक्रम में हिस्सा लेगी और उसे जीतेगी भी , तुषार उसको प्रोत्साहित करता है और कहता है -कुछ अच्छा विषय सोचकर, कोई अच्छी सोच के साथ ,तुम अपनी ड्रेस को डिजाइन करना ताकि वहां बैठे ,सभी जज तुमसे प्रभावित हो जाएं। उड़ती -उड़ती खबरों से पता चला है ,कि अबकी बार, ''निर्णायक मंडल '' में कोई जज़ बाहर से भी आ रही है या आ रहे हैं।
तुम्हें ,इसके विषय में कैसे जानकारी मिली ?तुषार ने प्रश्न किया।
यह कोई महत्वपूर्ण जानकारी नहीं है किंतु यह बात अवश्य है कि वह जज बाहर से आ रहे हैं और जिसके भी डिजाइन उन्हें पसंद आएंगे , वे उसे ही ,आर्डर देंगे और उन्हें अपने यहां नौकरी भी दे सकते हैं। तब कल्पना को लगता है ,कि यह उसके लिए ,बड़ा ही अच्छा अवसर है।
चहकते हुए ,कल्पना ,अपनी मम्मी के पास जाती है, उसे देखकर नीलिमा पूछता है -आज बड़ी प्रसन्न है ,क्या हुआ ? कहीं लॉटरी लगी है क्या ?
हां ,मम्मा ! लॉटरी ही समझो ! बस अब आपको मेरा साथ देना होगा।
भला ,मैं क्या साथ दे सकती हूं ? नीलिमा ने कल्पना से पूछा।
बस यही साथ देना है, जो भी डिजाइन और कपड़े में बनाऊंगी उसमें आप मेरे साथ रहेंगीं।
मैंने कभी सिलाई तो नहीं की है, किंतु हां इतनी समझ रखती हूं कि अच्छा -बुरा समझ सकूँ। ठीक है ,मेरी तरफ से तुम्हें जो भी सहायता की आवश्यकता होगी ,मैं अवश्य ही करूंगी अब तो वैसे भी मेरे पास कोई कार्य नहीं रहा है। तुम्हारे भाई की देखभाल के पश्चात, हम दोनों मां -बेटी मिलकर ये कार्य कर लिया करेंगे। इसी बहाने कल्पना अपना वह घर भी छोड़ देती है। उसे लगता है, कि जो भी पैसे की आवश्यकता होगी वह मैं इसमें व्यय करूंगी ताकि अच्छी से अच्छी डिजाइन बना सकूं किसी भी चीज में कटौती न करनी पड़े। तुषार को भी ,कल्पना के परिश्रम और उसके कौशल पर पूर्ण विश्वास था इसीलिए वो उसके वस्त्रों में पैसा लगा रहा था।
रात -दिन एक करके कल्पना ने ,कुछ ड्रेस तैयार कर भी लीं और तुषार को उन्हें देखकर ,पूर्ण विश्वास हो गया कि कल्पना को ही ट्रॉफी मिलेगी। वह स्वयं उससे प्रभावित हुए बिना न रह सका। आखिर वह दिन भी आ गया जिस दिन, मॉडल, कल्पना की डिजाइन की हुई ड्रेस पहनकर,'' रैंप ''पर वॉक करेंगीं।कल्पना की '' मुख्य निर्णायक '' को देखने की बहुत इच्छा हो रही थी ,क्योंकि उसी के द्वारा आज उसके जीवन का अहम निर्णय सुनाया जायेगा ,किन्तु वो अभी तक नहीं आई थीं ,क्योंकि उसे पता चल गया था कोई महिला जज ही आएँगी। जब कल्पना अपने कमरे में जा रही थी ,तभी एक बड़ी सी गाड़ी आकर ,रुकी। उसमें से एक महिला उतरीं ,अन्य लोग उनका स्वागत करने के लिए आगे बढ़े किन्तु अचानक उसे देखकर कल्पना चौंक गई, फिर मन ही मन सोचा- यह कैसे हो सकता है ? कहां वह और कहां यह........ उस समय वह अपनी डिजाइनों को लेकर बहुत ही उत्साहित थी और सबसे बड़ा उद्देश्य उसका यही था ,कि उसे वह आर्डर मिले। वह अपने आसपास तुषार को भी ढूंढती है लेकिन आज न जाने तुषार भी कहां चला गया ?कहीं भी दिखलाई नहीं दे रहा, उसका आत्मविश्वास डगमगाता है, किंतु उसकी मम्मी उसे प्रोत्साहित करती है। किसी आवश्यक कार्य से चला गया होगा। तुम क्यों परेशान होती हो ?जब जीत जाओगी और उसे अपनी ट्रॉफी दिखाओगी, तो खुश हो जाएगा।
नीलिमा की नजर अचानक एक चेहरे पर पड़ी, और वह होश खोते-खोते बची , ऐसा कैसे हो सकता है ? कहीं में कोई स्वप्न तो नहीं देख रही। खैर जो भी होगा ,बाद में देखा जाएगा , अभी वह अपनी बेटी के लिए परेशान थी जितनी उसने मेहनत की है ,कम से कम उसका यह परिश्रम , उसे आगे बढ़ाने में सहायक हो यही भगवान से उम्मीद प्रार्थना कर रही थी। कार्यक्रम आरंभ होने से पहले, चीफ गेस्ट का सबसे परिचय कराया जाता है। आज के हमारी '' चीफ गेस्ट ''हैं, श्रीमती चांदनी ! यह वही चेहरा था जिसे देखकर अचानक ,नीलिमा और कल्पना दोनों ही चौंक गए थे। तब वह बताते हैं ,कि यह ''टी एंड कम्पनी '' की, मालकिन है, इनके पति की ऐसी कई कंपनियां है। जो 'रेडीमेड' कपड़े बनाती हैं, और उनके डिजाइन , पूरी इंडिया में ही नहीं, बाहर भी जाते हैं। आज उन मेधावी छात्रों को, इस प्रतियोगिता से, बहुत बड़ा लाभ होने वाला है जिसको भी इस प्रतियोगिता में विजयी घोषित किया जाएगा। उसी को इनकी तरह कंपनी की तरफ से आर्डर दिया मिलेगा और नौकरी भी मिलेगी।
सभी ताली बजाते हैं और सभी की दृष्टि, रैम्प पर खड़ी मॉडलों पर पहुंचती है। सभी डिजाइनों को, सराहना मिल रही थी। कल्पना के डिजाइन की, बहुत प्रशंसा हो रही थी और तालियां बज रहीं थी सभी को उम्मीद थी कि वही जीतेगी। किंतु जब परिणाम सुनाने की बारी आई। श्रीमती चांदनी को खड़ा किया गया , उन्हें ही परिणाम सुनाना था। वह कल्पना के डिजाइनों की प्रशंसा करती है, बेहतर हैं ,अच्छे रहे हैं ,भविष्य में ऐसे ही उन्नति करते रहना ,मेहनत करते रहना बहुत सारी बातें कहीं किंतु जब परिणाम सुनाया तो, सुनैना का नाम आया। यह सुनते ही ,कल्पना और नीलिमा के ''पैरों के तले की जमीन खिसक गई।'' उनके स्वप्न जैसे स्वाहा हो गए। कल्पना वहीं बैठ गई, नीलिमा ने उसे संभाला ,उसे पानी दिया। जब यह सब हो रहा था ,तो वह महिला मुस्कुराई और बाहर निकल गई। कल्पना को उसके अन्य साथी भी संभाल रहे थे। अचानक न जाने नीलिमा को क्या हुआ ? वह उस स्थान से बाहर निकल गई और एक गाड़ी का पीछा करने लगी। बहुत देर तक गाड़ी का पीछा करते हुए, एक स्थान पर वह गाड़ी जाकर रुकी। जो किसी का बहुत बड़ा बंगला था। वह गाड़ी तो, अंदर चली गई किंतु नीलिमा बाहर खड़ी होकर उस बंगले को निहार रही थी। तब उसने उस बंगले की नेम प्लेट पड़ी -जिस पर लिखा था ''जावेरी प्रसाद'' बंगलो नंबर 63 उस पते को पढ़कर नीलिमा की इंद्रियां तेजी से कार्य करने लगीं ।
