Sazishen [part 69]

''साज़िशें'' में अब तक आपने पढ़ा कि तुषार अपनी पहचान छुपा कर रहता है। उसने अपना सही परिचय कल्पना को भी नहीं दिया। अभी उन्हें मिले हुए ,एक माह  ही तो हुआ है। किंतु इतने कम समय में भी , दोनों एक -दूसरे को समझने लगे हैं और एक दूसरे की तरह आकर्षित भी हुए हैं।  जब नीलिमा को अपना शहर छोड़ कर ,भाग कर यहां आना पड़ा। तब ऐसे समय में तुषार ही ,उसकी सहायता के लिए तैयार रहता है।  तुषार जानता है ,कि वह फ्लैट उसका अपना है किंतु कल्पना को यह बात नहीं बताता और कहता है -'कि मेरे किसी दोस्त का है जो उसने मुझे उपयोग के लिए दिया है। अपनी पहचान छुपाने की, तुषार की भी अपनी मजबूरियां हैं , उसकी मां के चले जाने के पश्चात, उसके पिता ने ,एक कम उम्र लड़की से विवाह कर लिया है। जो उसके बाप के पैसों पर, ऐश कर रही है। यह उसे बर्दाश्त नहीं हो रहा है ,वह ,उसे रोकना चाह कर भी वह रोक नहीं पाता है। 


ऐसा नहीं ,कि उसने रोकने का प्रयास नहीं किया, उसने रोकने का प्रयास भी किया और पिता से कहा भी किंतु पिता ने उसे स्पष्ट रूप से अपनी नई मां को कुछ भी कहने से मना कर दिया। उन्होंने कह दिया -कि तुम्हें भी पैसे की कोई कमी नहीं है ,जब जो इच्छा हो तुम ले सकते हो। मैंने तुम्हें भी नहीं रोका है। तुषार ने देखा ,वह नई मां किसी छोटे शहर से आई थी। किंतु उसने बड़े शहर, को शीघ्र ही समझ और अपना लिया। पैसे के कारण ,शीघ्र ही उसकी सहेलियों का एक समूह बन गया। जिनके कारण कार्य बड़े-बड़े होटलों में पार्टियां करना ,कीमती वस्त्र पहनना, और मेहनत से कमाई हुई ,कमाई को तुषार की नजर में ''स्वाहा ''करना था। तुषार और कल्पना एक बगीचे में बैठकर ,एक दूसरे से अपने मन की बात कह रहे थे किंतु तुषार अभी भी शांत था ,वह अपने विषय में कल्पना को ज्यादा कुछ भी नहीं बताना चाहता था। 

तब अचानक कल्पना बोली -मैंने बहुत सारी ड्रेसेस के डिजाइन तैयार किये हैं और एक फाइल भी बनाई है मैं चाहती हूं ,कि अबकी बार कॉलेज के 'रैम्प वाक '' में मेरी ड्रेस की डिजाइन चुनी जानी चाहिए। वहां ,बस मेरे द्वारा बनाये डिजाइन छा जाने चाहिए।   

कुछ नया करोगी तो......  अवश्य ही तुम्हारे डिजाइन होंगे । तुषार ने समझाया -कुछ ऐसा सोचो ,जो आज के समय में लोग पसंद करें ,कुछ नया लगे ,ऐसा ही कुछ विषय लेकर चलना जैसे - गांव को शहर से जोड़कर ,कोई ड्रेस तैयार करना । जिसे गांव के लोग भी स्वीकार करें और शहर के भी उसे स्वीकार करें

यह तुमने मुझे ,अच्छा सुझाव दिया , मैं परेशान थी, कि क्या विषय होना चाहिए ?  लेकिन अब मुझे लग रहा है अब मैं कुछ कर सकती हूं, तुम जानते हो अबकी बार इस इवेंट की जज कौन होगीं या होंगें ?

नहीं ,मैं नहीं जानता,

अबकी बार कॉलेज से बाहर भी एक जज आएगी और यदि उसे ,जिसकी सबसे ज्यादा डिजाइन पसंद आएंगे उन्हें वह अपनी कंपनी में कार्य भी दे सकती है। यह एक बहुत ही ,अच्छी बात है

और मैं इस मौके को छोड़ना नहीं चाहती मैं चाहती हूं ,मेरे हुनर ,मेरी काबिलियत के दम पर मुझे वह नौकरी मिले। कुछ अच्छा सा हो जाता है ,तो फिर मैं मम्मी के लिए अलग जगह ले लूंगी

तुम्हारी मम्मी ,अभी तो आई हैं , तुमसे क्या किसी ने कुछ कहा है ?

नहीं ,किसी ने कुछ भी नहीं कहा है किंतु मैं ऋण लेकर शीघ्र ही ,उसे उतारने में विश्वास रखती हूं ,कह कर कल्पना मुस्कुराने लगी। 

मैंने तुम्हें कोई उधार नहीं दिया है और न ही तुम पर कोई एहसान किया है मुंह बनाते हुए तुषार बोला। 

तुमने तो नहीं किया ,और न ही मैं ,तुम्हारा एहसान मांनती हूँ  किन्तु हमारे कारण तुमने तो किसी का एहसान लिया है और मैं नहीं चाहती कि तुम किसी के एहसानो के बोझ तले दबे रहो !किंतु अब तुम्हें एक और एहसान करना होगा। मेरी ड्रेस में जो भी खर्चा आएगा, उसमें तुम्हें ही मेरी सहायता करनी होगी।  

भला इसमें एहसान की क्या बात है ?तुम्हारे लिए तो मैं तुम्हें कोई भी ड्रेस यूँ ही उपहार में दे सकता हूँ। 

ज्यादा बनो ,मत !मैं सब समझ रही हूँ और तुम भी समझ रहे हो !मैं  क्या कहना चाहती हूँ ?

तो इसलिए भूमिका बांधी जा रही थी, छोटे एहसान के बदले ,बड़े एहसान की तैयारी हो रही थी कहते हुए तुषार हंसने लगा। 

इसमें एहसान कैसा ? जब मेरी डिजाइन की हुई ड्रेस दिखाई जाएंगी ,तब मैं तुम्हारा वह पैसा उतार दूंगी। 

तुषार सोच रहा था -कि कल्पना ,वैसे तो दिल की अच्छी है किंतु अभी उसे थोड़े पैसे की कमी है क्योंकि उसके पिता भी नहीं है उसकी कही बातें उसे बुरी भी नहीं लगती हैं , उससे प्यार जो करता है।

क्या सोच रहे हो ?

कुछ भी तो नहीं ,क्यों ?

 तब कल्पना उससे कहती है -क्यों ना आज मैं ,तुम्हें अपनी मम्मी से मिलवा दूं। 

अब तो मम्मी यही रहेंगी, मिलना तो होता ही रहेगा पर थोड़ा अपने परिवार की परेशानी के कारण उलझा हुआ सा था। ऐसे में वह किसी से मिलना नहीं चाहता था। न ही वह चाहता था कि उससे मिलने पर किसी पर भी ,उसका नकारात्मक प्रभाव पड़े। जब मिलने जाऊँ तो पूर्ण सकारात्मकता के साथ जाऊँ। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post