Rasiya [part 14]

 दिन में चतुर को किसी से कोई खतरा नहीं था। रात्रि में, थोड़ा डर था किंतु उससे पहले ही ,रामप्यारी ने उसके लिए मंदिर वाले पंडित जी से ताबीज लाकर, उसके हाथ में बांधने का निश्चय किया था। अपने पिता के द्वारा कहानी सुने जाने पर चतुर के मन में अनेक प्रश्न उठ रहे थे। जब तांत्रिक बाबा में इतनी शक्ति थी कि वह उसे बांध सकता था और बांधा भी, एक पेड़ के नीचे उसकी सीमा तय कर दी थी। तब वह उसे बांधकर ,उस धन को वापस भी तो ले सकते थे ,उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया ? और जब आत्मा किसी पुरुष की थी, तब अब इस बाग में किसी भूतनी की आत्मा क्यों भटकती है ?किन्तु पिता उसे समझाकर जा चुके थे। उनके आगे उनसे जिद भी नहीं कर सकता था। उसे आराम करने के लिए कहकर ,रामप्यारी मंदिर चली गयी। राम राम पंडित जी !

राम राम ! कहो ! कैसे आना हुआ ?



क्या बताऊँ ?आपका पोता चतुर !अपनी शरारतों से बाज नहीं आता। उसे बहुत तेज ताप चढ़ा है। लगता है ,आम के बगीचे में चला गया। लगता नहीं ,सच में ही गया है ,विश्वास से बोली। आज मैंने टोकरी में रक्खे  आम देखे ,किसी दोस्त के संग गया था, वो तो भाग गया और ये वहीँ आम बटोरने लगा। उस चुड़ैल की छाया उस पर पड़ी है। उसे रात्रि से ही ताप चढ़ा है। रात्रि को स्वप्न में भी वो आई थी। 

अच्छा !तो ये कहो न..... उसके लिए ताबीज़ बनाना है। पंडित जी ,रामायण लिए बैठे थे ,उसका अध्ययन कर रहे थे। तब उन्होंने उस पुस्तिका के हाथ जोड़े और उसे हटाकर अपने आसन से उठे और मंदिर से लगे अपने घर के अंदर चले गए। रामप्यारी वहाँ बैठी ,उन मूर्तियों को निहार रही थी। जो मंदिर में ,अब शायद विश्राम अवस्था में हैं ,क्योकि पूजा का समय प्रातःकाल का होता है। रामप्यारी ने अपने हाथ जोड़े ,हाथ जोड़ते समय स्वतः ही उसके नेत्र मूँद गए और अपने बच्चे की परीक्षा ,उसके स्वास्थ्य के लिए ,उनसे विनती करने लगी। इतने पर भी संतुष्ट नहीं हुई ,तब वह मंदिर से लगे नल पर हाथ धोने चली गयी और अपने वस्त्रों से हाथ पोंछते हुए वापिस आकर थाली में रखा प्रसाद लिया और हनुमान जी ,का थोड़ा सिंदूर लिया। उसकी श्रद्धा उससे ये सब करवा रही थी। जो भी तरीका उसे अपने बच्चे के लिए उचित लग रहा था वो वही करने का प्रयास कर रही थी। ताकि वो शीघ्र ही स्वस्थ हो जाये। 

कुछ देर पश्चात ही ,पंडित जी हाथ में एक चाँदी का बना ताबीज़ लेकर उपस्थित हुए ,और बोले -इस ताबीज़ को मैंने अभिमंत्रित  कर दिया है। इसे जाकर अपने बेटे की बायीं भुजा में बांध देना और परिवार में सब ठीक  हैं। 

हां जी, सभी ठीक हैं ,किंतु इस लड़के ने हमारी नाक में दम किया हुआ है , सुनता ही नहीं , इधर-उधर दौड़ता रहता है, पढ़ाई में के समय भी , इधर-उधर भटकता रहता है। जैसे उसे कुछ  स्मरण हुआ ,क्या पंडित जी ! ऐसा कोई उपाय नहीं है , जिससे उसका मन पढ़ाई में लगे। 

बच्चा है ,यही उम्र तो खेलने कूदने की होती है ,पढ़ने में तो होशियार है ,,और क्या चाहिए ?

पंडित जी के जवाब से रामप्यारी, चुप हो गई और अपनी जेब से ₹10 निकाल कर पंडित जी के हाथ पर रख दिए यह आपके ताबीज के , और जब बेटा, पूरी तरह स्वस्थ हो जाएगा। तब आपसे मिलाने लेकर आऊंगी , तभी आपकी दक्षिणा भी दे देंगे। 

पंडित जी मुस्कुराए ,वे जानते थे गांव में कौन कैसा है ? उन्होंने चुपचाप वे  ₹10 रूपये लिए और दान पात्र में डाल दिए। 

रामप्यारी ,ताबीज लेकर घर पहुंची, घर के मंदिर में जाकर हाथ जोड़े ,प्रसाद और ताबीज लेकर, बेटे के पास गई। आते ही ,उसने चतुर से प्रश्न किया -कोई परेशानी तो नहीं हुई, और अपने हाथों से उसके बदन को छूकर, उसका ताप को जांचने लगी। अब तो कम लग रहा है, अब देखो ! बिल्कुल ही ठीक हो जाएगा। कहते हुए, उसने ताबीज बेटे के हाथ में बांधा और उसे खाने के लिए प्रसाद दिया। तिलक लगाना तो भूल ही गई, वापस मंदिर के पास गई और वहां से सिंदूर उठा लाई। अब उसे लग रहा था ,कि उसने अपने बेटे को पूरी तरह से सुरक्षित कर दिया है। मन पर एक बोझ था ,जैसे वह उतर गया है। इतना सब कर लेने के पश्चात, अब रामप्यारी को उसकी परीक्षा की चिंता होने लगी और चतुर से बोली -शाम तक तुम्हारा ताप ठीक हो जाएगा ,अब आराम करो ! और रात में देर तक जाग कर, अपनी परीक्षा की तैयारी करना। कहते हुए ,अपनी रसोई संभालने चल दी। तभी उसे स्मरण  हुआ, एक गोली नाश्ते के बाद भी थी। वापस आई और चतुर से पूछा -नाश्ते के बाद की गोली खा ली थी। चतुर ने हाँ में गर्दन हिलाई , झूठ तो नहीं बोल रहा। 

इतनी अधिक परवाह  से चतुर चिढ़ गया था और बोला -भला, मैं क्यों झूठ बोलूंगा ? बुखार नहीं उतारना  है, वैसे वह स्वयं ही स्वतंत्र होकर, खेलना -कूदना चाहता था, पढ़ना चाहता था। भला कोई इस तरह क्यों बिस्तर में पड़ा रहना चाहता है ?

उसकी नाराजगी देखकर रामप्यारी, बोली -अच्छा-अच्छा, ठीक है अब आराम कर, मैं तेरे लिए , खाने में कुछ हल्का सा बनाकर लाऊंगी। रामप्यारी अपनी मां होने का फर्ज निभा रही थी, मां को तो बच्चे की फिक्र हो ही जाती है। जिसमें कि उसे भय है कि कहीं, उस भूतनी का साया तो, इस पर नहीं पड़ गया है। 

शाम तक जैसे-जैसे, चतुर का बुखार कम हो गया। वैसे ही, रामप्यारी ने कुछ किताबें लाकर उसके सामने रख दीं और बोली- अब बहुत आराम हो गया ,बैठकर पढ़ाई करो !मन ही मन चतुर सोच रहा था - मां भी न  कितनी अजीब है ? सुबह से तो मेरी तिमारदारी में लगी थी और बुखार उतरते ही, किताबें आगे रख दीं। मां  का यह रूप ,उसे पसंद नहीं आया , इससे तो पहले ही अच्छी लग रही थी। किंतु अब तो काम निपटा कर रामप्यारी उसके समीप ही आकर बैठ गई थी। चतुर की अभी पढ़ाई की इच्छा तो नहीं थी किंतु मां के सामने, किताब में ध्यान देने का उपक्रम करने लगा। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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