Sazishen [part 68]

कल्पना बगीचे में, अपने दोस्त तुषार से बातचीत करती है। जब वो मुंबई में आई थी , उसके कुछ दिनों पश्चात ही ,कल्पना की मुलाकात तुषार से होती है। समय के साथ ,दोनों शीघ्र ही ,एक -दूसरे के करीब आने लगे। एक -दूसरे पर विश्वास भी बढ़ गया। तुषार विदेश से पढ़ाई करके आया था ,किन्तु तब भी उसके व्यवहार में ,कोई अक्खड़पन या फिर पैसे का घमंड नहीं था। न ही उसने किसी को भी ये बताया कि वो बहुत बड़े कारोबारी का बेटा है। कल्पना से वह एक मध्मवर्गीय परिवार का बेटा बनकर मिला किन्तु जब कल्पना को पता चला ,वो विदेश में रहकर पढ़ाई करके आया है ,तब उसने स्वतः ही अंदाजा लगा लिया -'कि बड़े घर का होगा। ''


कल्पना  की अपने कार्य के प्रति इतनी लगन और मेहनत देखकर वह उससे प्रभावित हुआ और वह हमेशा उसका साथ देने के लिए तैयार रहता। दोनों आपस में बातचीत करते हैं ,घूमते हैं ,साथ में खाना भी खाते हैं  किंतु कभी, एक दूसरे ने अपने परिवारों के विषय में कुछ नहीं बताया। न ही किसी ने पूछने का प्रयास भी किया। आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई, किंतु अब कल्पना को अपने परिवार के विषय में तुषार को बताना पड़ा ,तुषार उसके लिए हमेशा से ही सहायक रहा है और उसने इस समय भी उसकी सहायता की है। किंतु आज न जाने क्या सोचकर कल्पना ने उसके परिवार के विषय में जानना चाहा किंतु वह बड़ी ही होशियारी से उस बात को, टाल गया। उसने कल्पना से यही बताया -वह एक साधारण व्यक्ति का जीवन जी रहा था, और वही उसने कल्पना से बताया , किंतु क्या यही तुषार की हकीकत है ?

तुषार एक अमीर परिवार का लड़का है। कोरोना के कारण , उसकी माँ नहीं रही। उसे अपनी माँ से बहुत लगाव था। पिता उद्यमी व्यवसायी हैं, किन्तु उनकी एक ही कमजोरी रही है और वो है ,महिलायें ! इसी कारण से, उसकी माता का पिता से व्यवहार खिंचा सा रहता था। कई बार उनके  मध्य झगड़ा भी हुआ है उनके दफ्तर में भी ,उनके चाल -चलन को लेकर चर्चा रही है ,किन्तु कम्पनी का मालिक होने के कारण उन्हें कोई कुछ कहता भी नहीं  है। जब से उसकी माँ ,इस संसार को ही छोड़कर चली गयी। तब से उन्हें जैसे कोई रोकने -टोकने वाला नहीं रहा। अति तो तब हो गयी, जब वो न जाने कहाँ से अपनी उम्र से आधी उम्र की लड़की से, विवाह करके आ गए। हो सकता है, वो तुषार से एक दो वर्ष ही बड़ी हो ,किन्तु अब वो इस समय उसकी माँ बनकर उस घर पर कब्ज़ा करके बैठ गयी है। हालाँकि तुषार विदेश में पला -बढ़ा है ,किन्तु उसमें संस्कार ,उसकी सोच भारतीय ही हैं। इस बेमेल विवाह से वह प्रसन्न नहीं है। 

तुषार के पिता की वो कम उम्र ,नई पत्नी,उनके घर- ऐश्वर्य को देखकर ,अत्यंत प्रसन्न हुई ,उसे तो जैसे कुबेर का खजाना मिल गया। दोनों हाथों से धन लुटाती रहती है ,अपने मायके भी धन भेजती है। पिता को तो उस पर पूर्ण विश्वास है जो भी करती है ,कुछ नहीं कहते। बच्ची जैसी पत्नी मिल गयी ,तो उनका बौरा जाना स्वाभाविक है। अपने इतने बड़े बेटे के सामने भी ,उससे चुहलबाज़ी करने से बाज नहीं आते ,उन्हें शर्म भी नहीं आती ,कि बेटा क्या सोचेगा ?या उस पर इस बात का क्या असर होगा ? नौकर भी पीठ पीछे हँसते हैं। किन्तु उन्हें तो समाज की ,अपने बेटे की कोई परवाह ही नहीं है। अक्सर तुषार अपने  कमरे में ही रहता है। भोजन भी अपने कमरे में ही मंगा लेता है। जब भी पैसों की आवश्यकता हो तो मैनेजर से कह देता है और उसे जरूरत के हिसाब से पैसे मिल जाते हैं। 

तुषार की नई माँ ,न जाने क्या -क्या करती रहती है ? बड़े लोगो में उठना -बैठना ,उनसे मिलना पार्टी करना ,जो भी करना है उसे पूरी छूट है ,न ही कोई उस हिसाब लेता है। एक दिन इस विषय पर तुषार की अपने पिता से झड़प भी हो गयी। जब उसने कहा -माँ ,भी तो यहाँ रहती थी ,उसने तो कभी इतने खर्चे नहीं किये। और ये है ,न जाने कितने खर्चे बढ़ा लिए हैं ,कोई इससे कहता क्यों नहीं ?

पहले तो तुम ,इसके विषय में सम्मान से बात करो !पिता क्रोधित होते हुए बोले। तुझे इससे या इसके विषय में कहने की कोई आवश्यकता  नहीं है। 

मेरी माँ ने इस घर को कितने परिश्रम से संवारा है ?और ये.......  मेरे विचार से तो बर्बाद ही कर रही है। 

तुम्हारी माँ के लिए भी ,पैसे की कोई कमी नहीं रही है ,किन्तु वो जीना ही नहीं जानती थी। न कभी स्वयं प्रसन्न रही ,न ही मुझे रहने दिया। ये ज़िंदगी को जी रही है। जब भी मैं ही कमाने वाला था और आज भी मैं ही कमा रहा हूँ। समझे !तुम्हें जब भी पैसे की आवश्यकता हो मैनेजर से ले सकते हो किन्तु इसके लिए कुछ मत कहना। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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