तुषार ! अब तुम ही बताओ !मैं क्या करूं ? मम्मा अकेली हैं ,ऊपर से भाई भी ठीक नहीं है ,और न ही ठीक होने की उम्मीद है किन्तु तब भी मम्मा में ,आज भी उसके प्रति एक विश्वास है ,उसे इतना सक्षम बना देना चाहती हैं ,ताकि उनके न रहने पर भी वह किसी पर निर्भर न रहे ,मैं उनके विश्वास को तोडना नहीं चाहती। छोटी बहन भी बाहर है। अब मम्मा का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व मुझ पर ही आ जाता है। मुझे किसी ऐसी नौकरी की तलाश करनी होगी ,जो मेरी पढ़ाई से बचे समय में कर सकूँ और अपने साथ -साथ ,उनका खर्चा भी उठा सकूँ।
ये तुम क्या कह रही हो ? तुम्हारी मम्मी क्या मेरी मम्मी नहीं..... उसकी तरफ देखते हुए तुषार ने पूछा ,तुम्हें मैंने उस फ्लैट की चाबी तो दी है।
हाँ ,वो तो ठीक है ,किन्तु उनके अन्य खर्चे भी तो होंगे और उस फ्लैट का बहुत -बहुत आभार !
तुम ऐसा क्यों कह रही हो ?मुझे अपना दोस्त भी कह रही हो और आभार भी व्यक्त कर रही हो। मैंने तुम पर कोई एहसान नहीं किया है । यह सब हमारी दोस्ती और प्यार के नाम पर है। रही बात ,अन्य खर्चो की मैं अपने वेतन में से कुछ पैसे तुम्हें दे दिया करूंगा।
नहीं, तुम्हारा इतना एहसान ही बहुत है ,और भार में नहीं सहन कर पाऊंगी।
फिर वही बात ! नाराज होते हुए तुषार बोला।
तुम बात को समझा करो ! वे लोग मेरी जिम्मेदारी हैं। यदि तुम मेरी सहायता करना ही चाहते हो तो, कोई अच्छी सी नौकरी ढूंढने में मेरी सहायता कर देना। ताकि मुझे अच्छी आमदनी भी हो जाए और मैं अपनी पढ़ाई भी जारी रख सकूं। वैसे तुम क्या समझते हो ? मेरी मम्मी ने भी कम परिश्रम नहीं किया हैं, जहां पर अब तक रह रही थी ,नौकरी ही करती थीं। किंतु भाई के कारण कभी-कभी इधर-उधर भी जाना पड़ जाता था इसीलिए मैंने उन्हें यहां बुलवा लिया, उम्र भी बढ़ रही है ,अकेली परेशान होती होगीं।
यह तो तुमने सही किया, ऐसे समय में अपने बच्चे ही ,अपने माता-पिता के प्रति सेवाभाव नहीं रखेंगे तो और कौन रखेगा?ठीक है, मैं तुम्हारे लिए कहीं अच्छी सी नौकरी देखता हूं। वैसे तुम्हें जो अपनी डिजाइनिंग की फाइल बनानी थी ,क्या तुमने बना ली ?
नहीं ,आज पूरी कर दूंगी, क्योंकि दो दिनों से ,मैं मम्मी के कार्यों में ही व्यस्त थी। आज रात्रि को देर तक जागरण होगा ,कहते हुए कल्पना हंसने लगी। वैसे मैं सोच रही हूं क्यों न मैं भी, मम्मी के साथ ही रहने लगूँ , मेरा जो किराया जाता है ,वे पैसे भी बच जाएंगे। वह भाई की बीमारी में काम आ जाएंगे।
तुम्हारी यही बातें तो मेरा मन मोह लेती हैं , तुम अपने परिवार के लिए कितना सोचती हो ? अपनी इच्छाओं , सहूलिया तो का त्याग कर, उनके विषय में सोच रही हो
इसमें त्याग कैसा? वे अपने ही तो हैं। क्या मम्मी ने हमारे लिए त्याग नहीं किया ? वह चाहतीं , तो अपना विवाह करके अपना घर बसा सकती थीं। किंतु उन्होंने , पापा के जाने के पश्चात ,अपना संपूर्ण जीवन, हम बच्चों के लिए ही तो समर्पित कर दिया।
तुम्हारी यही सोच तो..... तुम्हें आगे तक लेकर जाएगी।
मुझे आगे कहीं नहीं जाना है ,हंसते हुए कल्पना बोली -बस मेरे परिवार को एक सुकून भरी जिंदगी मिल जाए और तुम जैसे अच्छे दोस्त मिल जाए तो मुझे जीवन में और कुछ नहीं चाहिए। कल्पना तुषार के कंधे पर था सिर रखते हुए बोली -वैसे तुषार एक बात पूछूं ! कभी तुमने अपने परिवार के विषय में मुझे कुछ नहीं बताया।
बताने लायक कोई ऐसी बात है ,ही नहीं , मैं भी तुम्हारी तरह ही वक्त का मारा हुआ हूं।
मतलब मैं तुम्हारा अर्थ नहीं समझी।
तुम्हारे पास अपना एक फ्लैट है , तुमने विदेश में रहकर पढ़ाई की है ।
ओ मैडम ! मैं कोई करोड़पति नहीं हूं। पढ़ाई के लिए मैंने लोन लिया था, और वह फ्लैट भी मेरा नहीं है, मेरे दोस्त का है। वह यहां नहीं रहता, उसने अपने फ्लैट की चाबी मुझे दी हुई है।
अच्छा ,आश्चर्य से कल्पना बोली।
और नहीं तो क्या ? तुमने मुझे क्या समझा है ?
''बड़े दिलवाला ''कहकर हंसने लगी ,उसकी हंसी देखकर ,तुषार भी मुस्कुरा दिया।
