चतुर के पिता श्रीधर जी ,डॉक्टर को बुलाकर ले आते हैं , डॉक्टर के आने पर उन्हें पता चलता है ,कि वह किसी कारण से रात्रि में डर गया था ,शायद इस वजह से उसे बुखार हुआ है। रामप्यारी उन्हें, चतुर के सपने की बात बताती है, हालांकि उसके मन में भी जिज्ञासा बनी हुई है। संपूर्ण कहानी तो वह भी नहीं जानती जितना उसे मालूम था, उसने चतुर को बता दिया। डॉक्टर के जाने के पश्चात, अपने बेटे चतुर से शांतिपूर्वक पूछते हैं -आखिर तुमने रात्रि में ,स्वप्न में क्या देखा ?
तब चतुर उन्हें बताता है -कि वह आम के बगीचे की तरफ गया था, और वही चुड़ैल या उसे भूत कहें ,वो जो भी है, दिखाई दी थी। तब वे कुछ सोच में पड़ गए। वह तो बचपन से ही ,इस गांव में रहे हैं, उड़ती -उड़ती कुछ खबरें उन्होंने सुनी भी हैं , हो क्यों न...... उन्हीं के परिवार का किस्सा है। यह बात 'चंदा साहब ''के समय की है, ''चंदा साहब'' के पास बहुत अधिक धन था। वे उस धन को सुरक्षित कर देना चाहते थे, क्योंकि वहां चोर - उचक्कों का डर बना रहता था। उनके बेटे ने थोड़ी तंत्र विद्या सीखी हुई थी ,जिसके कारण उनके बेटे निर्भय सिंह ''ने तंत्र विद्या द्वारा ,उस धन को सुरक्षा प्रदान की।
किंतु इस बात से भी ,उसे संतुष्टि नहीं हुई, तब उसने कहीं पढ़ा होगा या सुना होगा। बलि देने से, वह धन ज्यादा सुरक्षित रहेगा। तब उसने बिना किसी को बताएं। एक राहगीर की बलि शैतान को दे दी। इस बात को वर्षों बीत गए ,तब 'चंदासाहब 'ने सोचा -उस धन का उपयोग किया जाए और उन्होंने अपने बेटे से उस तंत्र को काटने के लिए कहा -जब वह धन लेने के लिए जाता है , तो वहां बहुत से सर्प निकल जाते हैं, खुदाई वाले यह देखकर ,वहां से भाग जाते हैं तब वह स्वयं प्रयास करता है। किंतु, उसे स्थान को वह छू भी नहीं पा ता। यह देखकर उसे आश्चर्य होता है, कि मेरा ही धन है और मैं ही इसे हाथ नहीं लगा पा रहा हूं। ऐसा कैसे हो गया ? उसने अपने घर जाकर ,चंदा साहब ''को संपूर्ण बातें बताई , किंतु उसने यह नहीं बताया कि मैंने किसी इंसान की बलि भी दी है। तब वह कहता है -कि मेरी विद्या काम नहीं आ रही है। मुझे अवश्य ही किसी उच्च कोटि के तांत्रिक की तलाश में जाना होगा। जो इस विद्या का अच्छा जानकार हो !इस गांव में तो कोई अच्छा तांत्रिक नहीं है , यह सोचकर वह, गांव से निकल जाता है। लोगों से पूछते हुए वह एक तांत्रिक ''बाबा अघोरानन्द ''के समीप पहुंच जाता है। देखने में तांत्रिक, बहुत ही डरावना लग रहा था लंबी दाढ़ी, गले में मुंडों की माला, रक्ताभ नेत्र जब वह वहां पहुंचा , तब वह किसी सिद्धि की प्राप्ति के लिए,अभ्यासरत थे । निर्भय सिंह ''चुपचाप बैठ कर , उनकी प्रतीक्षा करने लगे ,बेचैनी से पहलू बदलते हुए ,सोचने लगे न जाने कब ?यह मेरी बात सुनेगें ।
वहां आसपास उनके अन्य चेले भी घूम रहे थे, तांत्रिक बाबा, शायद कोई सिद्धि कर रहे थे। थोड़ा बहुत तंत्र तो वह भी जानते थे, अचानक ही वो बोल उठे - यह तुमने क्या अनर्थ कर दिया ?
क्या हुआ बाबा !मैं कुछ समझा नहीं , निर्भय सिंह ने पूछा।
बालक इतने भोले भी नहीं हो, तुमने शैतान को एक इंसान की बलि दी है , उसी का हाल तो तुम मुझे पूछने आए हो। विधाओं का सदुपयोग करना चाहिए दुरुपयोग नहीं ,तुमने एक निरपराध व्यक्ति की हत्या कर दी।
उनकी बात सुनकर निर्भय सिंह समझ गया कि यह बहुत कुछ जानते हैं। तब हाथ जोड़कर बोला -बाबा !अब इस परेशानी से आप ही निकालिए। मैं अपने उस धन को सुरक्षित करके भी हाथ नहीं लगा पा रहा हूं इसका क्या कारण है ?
तुमने शैतान को उसकी बलि देकर, अपना धन तो सुरक्षित कर लिया किंतु जिस व्यक्ति की हत्या की है ,बरसों से इच्छा न होते हुए भी वो तुम्हारे धन का पहरेदार बना हुआ है, अब वह भी बलि मांगता है। तुम्हारे खून की बलि चाहता है,'' रक्त के बदले रक्त , बलि के बदले बलि।''
यह क्या बात हुई ? अपनी धन की सुरक्षा के लिए ही तो मैंने ऐसा कार्य किया था। शैतान को प्रसन्न करने के लिए, इसमें मेरी गलती कहां है ?
क्या तुमने उस व्यक्ति से इसकी इजाजत ली थी, जिस व्यक्ति की तुमने बलि दी थी, क्या वह इस बात के लिए तैयार था ? निर्भय सिंह के चेहरे पर नज़रें गड़ाते हुए बाबा ने पूछा।
नहीं, ऐसे जानबूझकर कौन अपने प्राणों की आहुति देगा ?
तब तुम्हें उसका आक्रोश झेलना होगा, अब तुम उस संपत्ति के अधिकारी नहीं रहे, अब उसे संपत्ति का रक्षक वह स्वयं है। किसी अच्छे तांत्रिक से तुम्हें ये अनुष्ठान करवाना चाहिए था। तब वह सम्पूर्ण बातों को ध्यान में रखकर ,उससे वचन भरवा लेता। शैतान को बलि देना ही नहीं होता है ,अन्य बातों का भी ध्यान रखना पड़ता है। यदि तुम अपनी संपत्ति चाहते हो, तो तुम्हें अपना रक्त भेंट स्वरूप चढ़ाना होगा ,वरना वह संपत्ति...... उस संपत्ति को भूल जाओ !
बाबा !आप यह क्या कह रहे हैं ? मेरे पिता ने तो लोगों की भलाई के लिए ही ,वह धन सुरक्षित करवाया था , और अब वह चाहते हैं -कि मैं मतलब हम लोग ,कुछ अच्छे कार्य करें। अब क्या भलाई के कार्यों के लिए भी हमें अपनी संपत्ति नहीं मिलेगी ? कुछ तो उपाय होगा। उसकी बात को सुन बाबा मुस्कुराये ,किसी के प्राण हरकर ,भला करने चले हैं। निर्भय सिंह के इस तरह कहने पर , बाबा ने अपनी आंखें बंद कर लीं और कुछ ध्यान लगाने लगे। कुछ समय पश्चात उन्होंने अपनी आंखें खोलीं और बोले -जिस व्यक्ति को तुमने मारा था वह अपने परिवार के लिए पालन -पोषण के लिए धन कमाने के लिए निकला था ताकि वह कुछ धन कमा कर अपने परिवार का पेट पाल सके। तुमने एक बार भी उसे जानने का प्रयास नहीं किया, कि वह किसी परेशानी में है। तुम जानते हो, उसके घर न पहुंचने के कारण , उसका परिवार कितनी परेशानियों से जुझा है। जीवित रहकर वह उन्हें नहीं देख सकता था किंतु मृत्यु के पश्चात ,उसकी आत्मा सब देख रही थी, वह स्वयं तड़प रहा था ,'' कि काश मैं जिंदा होता तो अपने परिवार की देखभाल कर सकता था।'' तुमने उसी की हत्या नहीं की बल्कि उसके परिवार में जो चार-पांच सदस्य थे उनकी भी हत्या कर दी।
बाबा आप यह क्या कह रहे हैं? मेरा ऐसा कोई भी इरादा नहीं था। आवेश में , मैं यह सब कर गया।
आवेश में आकर ही तो इंसान गलतियाँ करता है।
अब इसका कुछ उपाय तो बतलाइए , इसका उपाय सिर्फ यही है। वह तुम्हारे 'लहू का प्यासा 'है और तुम्हारी तलाश में ,जो भी अनजान व्यक्ति उधर जाता है ,उसे मार देता है। ये हत्याएं इसीलिए हो रहीं हैं।
ओह !ये बात तो मैं पूछने वाला ही था किन्तु पहले ही उसका जबाब मिल गया। क्या ऐसा नहीं हो सकता ?मैं उसके परिवार को ढूंढकर, उस धन से उसके परिवार का पालन -पोषण करूं। उन सबको एक सुरक्षित भविष्य दूं।
तुम हो कौन ?अचानक बाबा के तेवर बदल गए। तुम होते कौन हो ? किसी को सुरक्षित भविष्य देने वाले, कहते हुए बाबा भड़क गए।
कर्म करने से पहले सोचा भी नहीं, कि इसका परिणाम क्या होगा ? उसके परिवार की सहायता तो तुम तभी कर सकते हो जब उसके परिवार में कोई जिंदा बचा होगा। हां एक उपाय अवश्य है , तुम अपने रक्त से, उस स्थान का अभिषेक करो और उससे उसके परिवार के विषय में जानो !! यदि वह इस बात के लिए तैयार होता है, और तुम्हारी रक्त की कुछ बूंद से ही वह संतुष्ट हो जाता है तब तुम उस खजाने को निकाल सकते हो।
अब तो निर्भय सिंह को डर लगने लगा, और उसने कहा -कि बाबा !मैं अब यह सब नहीं कर पाऊंगा कृपया आप मेरे साथ चलिए ! बिगड़ी बात को संभाल लीजिए।
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