Sazishen [part 66]

 नीलिमा की बेटी कल्पना ने सभी तैयारियां कर दी थीं।  नीलिमा अपना वेष बदलकर इस तरह से आई थी स्वयं कल्पना भी ,उसे नहीं पहचान पाई। उसकी बेटी ले जाने को तो उसे, किसी होटल में भी ले जा सकती थी किंतु उसे वही डर सता रहा था कि कहीं कोई उन्हें पहचान न ले ,इसीलिए वह अपनी किसी दोस्त के खाली पड़े घर में लेकर गई थी। नीलिमा उस स्थान को देखकर आश्वस्त हो गई ,तब उसने अपना घूंघट उतारा और नहा -धोकर दोनों मां -बेटा ने दिन भर के सफर की थकान उतारी। कल्पना ने भोजन के लिए किसी से पहले ही कह दिया था। नहाकर आई निलिमाने अपने बालों को पोंछते हुए ,अपनी बेटी से पूछा -कि मैंने जो कार्य तुझे करने के लिए दिया था, क्या वह हो गया ?

ममा ! मैंने  कोशिश की है, किंतु इतना बड़ा शहर है , अभी इतनी शीघ्रता से कोई जानकारी नहीं मिलेगी किंतु मेरा प्रयास रहेगा। 

ठीक है, इतना शीघ्र तो मुझे यहाँ कोई नहीं पहचान पाएगा। मैं भी कुछ दिन यहां ठहर कर यहां के हालात मालूम करती हूं और फिर उसके पश्चात ,मैं भी छानबीन करती हूं। 


आखिर मां आपको कैसे पता चला ?कि ''जावेरी प्रसाद जी ''मुंबई में ही रहते हैं,कल्पना ने नीलिमा से पूछा। 

एक बार उनका जब ,चेेक आया था तब ही, मुझे पता चला कि वह मुंबई से हैं। उसके पश्चात ,जब उनका ड्राइवर दिल्ली आया था। तब उसने भी यही कहा था -'साहब !मुंबई में हैं  और मुझे इन पैसों को लेकर भेजा है। 

आपकी उन 'जावेरी प्रसाद जी 'से क्या दुश्मनी हो सकती है ? क्या आप उनसे कभी मिली हैं या उन्हें कभी देखा है ?ये भी तो हो सकता है ,'जब इतना बड़ा प्रपंच आपको फंसाने के लिए किया गया है ,हो सकता है ,यह भी एक झूठ ही हो। ''

कल्पना के अंदेशे से,नीलिमा मन ही मन थोड़ी हताश हुई ,दुःख भी हुआ ,यदि ऐसा हुआ तो...... मैं ''जावेरी  प्रसाद जी ''को कभी नहीं ढूंढ़ पाऊँगी। तब भी हिम्मत नहीं छोड़ती, तब बोली -नहीं ,मैं उन्हें बिल्कुल भी नहीं जानती हूं किंतु समझ नहीं आ रहा कि मेरी उनसे क्या दुश्मनी है ?हम पहले कभी मिले नहीं ,एक -दूसरे को देखा नहीं और उन्होंने मेरी जीवन भर की मेहनत मिटटी  में मिला दी। अगर वो  मुझे मिल जाये  तो मैं उनसे ,अपने प्रश्नों के जवाब मांगूंगी क्रोधित होते हुए ,नीलिमा कहती है। 

सबने एक साथ मिलकर खाना खाया, रास्ते में भी नीलिमा ने कुछ नहीं खाया था उसे बहुत जोरों से भूख लगी थी उसने खाना खाया अपने बेटे को खिलाया कल्पना भी साथ में ही थी। भोजन करने के पश्चात, उसे नींद आने लगी और वह कल्पना से बोली -अब मैं कुछ देर आराम करूंगी तुम अपने भाई का ख्याल रखना , यदि यह सोता है तो और भी बेहतर रहेगा। नीलिमा बिस्तर पर लेटी  ,अपने विचारों में खो गई। ऐसा मैंने किसी का क्या बिगाड़ा था ? जो उसने मुझसे इस तरह से बदला लिया। जिंदगी भी न जाने ,मुझे कहां से कहां ले आई, कहां में मध्यवर्गीय परिवार की एक साधारण सी लड़की और कहां आज मैं एक मुजरिम हो गई हूं ,अपनी पहचान छुपाते हुए घूम रही हूं। कितनी मेहनत से मैंने अपना ,मान सम्मान कमाया था ? लोगों का विश्वास जीता था। ऐसे समय में चंपकलाल जी ने भी मेरा साथ नहीं दिया। क्या इतने वर्षों साथ रहकर भी उन्हें ,इंसान की पहचान नहीं हुई ? क्या मैं ऐसा कर सकती थी लेकिन जिसने भी किया है मुझे उससे  जवाब तो मांगना ही होगा। आखिर किसी ने मुझसे  किस जन्म का बदला लिया है ?सोचते -सोचते नीलिमा को न जाने कितनी गहरी नींद आ गई ? जब वह उठी, तो दिन ढल गया था। अथर्व और कल्पना भी उसके उठने की आहट के साथ ही उठ गए थे। 

चाय पीते हुए ,चिंता व्यक्त करती है, हमारी कमाई का भी कोई जरिया नहीं है ,मेरे पास जो भी पैसा है वह मेरे पास है और यह कितने दिन चलेगा ?

कल्पना मुस्कुराते हुए बोली -मम्मा ! परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं है , इस मकान का भी अभी  हमें किराया नहीं देना है। मैं शीघ्र ही कोई नौकरी कर लूंगी और जहां पर मैं यह कोर्स सीख रही हूं। वहां पर भी कुछ पैसे मुझे मिलते हैं ,इतना अधिक तो नहीं हो पाएगा किंतु कोशिश करूंगी अपने एक दोस्त है से भी कुछ सहायता ले लूंगी। 

दोस्त के नाम पर नीलिमा के कान खड़े हो गए, और बेटी की तरफ देखते हुए बोली -कौन दोस्त है ? 

उसे आप नहीं जानती हैं अभी नया ही बना है। 

बना है यानी कि लड़का है ,मुस्कुराते हुए नीलिमा बोली -सिर्फ दोस्ती ही है या कुछ और भी....... 

ममा ! आपको इतनी परेशानी में भी मजाक सूझ रहा है। 

नहीं ,मैं मजाक नहीं कर रही हूं, मैं इस विषय पर गंभीरता से पूछ रही हूं , वह लड़का कौन है और क्या करता है ?किस परिवार से है ? अभी एक माह पहले ही तो ,उससे मुलाकात हुई है और आप जाने क्या-क्या सोचने लगी ? वैसे अच्छे परिवार से है, उसका रहन-सहन तो यही बतला रहा है। कभी उसके घर के विषय में या उसके परिवार के विषय में मैंने उससे पूछा नहीं। कहीं विदेश में, वह यह कार्य सीख कर आया है। और हम लोगों को भी कुछ नया सिखला रहा है अभी हमारा इतना ही परिचय है। 

ठीक है ,मेरे बेटा तुम तो परेशान हो गई अभी तो हम और परेशानियों से जूझ रहे हैं अब तुम्हारी बात सुनकर थोड़ा मुस्कुरा लिए तो क्या हुआ ?

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post