Do kavitayen

 यादों का पिंजरा -

पिंजरे में तो ,पंछी भी फड़फड़ाते हैं। 

यादें तो......  और फड़फड़ाएगीं । 

दुखती यादें ,जब पिंजरे से टकराएंगीं । 

चीत्कार कर उठेगीं, 

आंखें नम कर जाएंगी। 

खुद से ही स्व  को समझाएंगीं। 



सुनता नहीं ,कोई पुकार !

सलाखों से टकरा, लहूलुहान हो जाएंगीं । 

स्वतंत्र छोड़ ! इनको बह जाने दे !

ठहर गई कहीं ,तो रातभर जगाएंगीं । 

रुलाएंगीं , तड़पाएंगीं। 

क्षणिक मीठी यादें ,मन तो  बहलाएंगीं । 


पुराने दिन -

बचपन मीठा भी ,तो कटु भी ,

''पापा की परी ,''

न मिलती ,कभी आम जन से ,

जब चाहत होती ,बाल क्रीड़ा की ,

खेलती बेजान खिलौनों से....... 

ढूंढती अपने इर्द -गिर्द ज़िंदगी ,

कैसे मिलन हो ? अपनों से....... 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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