यादों का पिंजरा -
पिंजरे में तो ,पंछी भी फड़फड़ाते हैं।
यादें तो...... और फड़फड़ाएगीं ।
दुखती यादें ,जब पिंजरे से टकराएंगीं ।
चीत्कार कर उठेगीं,
आंखें नम कर जाएंगी।
खुद से ही स्व को समझाएंगीं।
सुनता नहीं ,कोई पुकार !
सलाखों से टकरा, लहूलुहान हो जाएंगीं ।
स्वतंत्र छोड़ ! इनको बह जाने दे !
ठहर गई कहीं ,तो रातभर जगाएंगीं ।
रुलाएंगीं , तड़पाएंगीं।
क्षणिक मीठी यादें ,मन तो बहलाएंगीं ।
पुराने दिन -
बचपन मीठा भी ,तो कटु भी ,
''पापा की परी ,''
न मिलती ,कभी आम जन से ,
जब चाहत होती ,बाल क्रीड़ा की ,
खेलती बेजान खिलौनों से.......
ढूंढती अपने इर्द -गिर्द ज़िंदगी ,
कैसे मिलन हो ? अपनों से.......
