तब पास बैठी महिला ने पूछा -बहन जी,कहाँ जा रही हो ?
नीलिमा ने बात करना उचित नहीं समझा। उसे झिड़कते हुए बोली- कहीं भी जाऊं ? तन्ने केम ,उसने ये शब्द बोल तो दिए किन्तु घबरा रही थी ,कहीं गलत तो नहीं बोले। कुछ शब्द अपनी मम्मी के मुँह से सुने थे किन्तु अब न ही उन जैसा रहन -सहन और न ही भाषा आती कभी आवश्यकता ही नहीं पड़ी। किन्तु आज उसे लग रहा था ,कोई भी ज्ञान बुरा नहीं होता। कभी न कभी काम आ ही जाता है। नीलिमा के शब्द सुनकर उस महिला ने बुरा सा मुँह बनाया और नीलिमा बाहर देखने लगी। सोच रही थी -हमारे देश में इतनी भाषाएँ और बोलियां हैं किंतु हमें उनकी जानकारी नहीं होती या कम ही होती है और हमारे बच्चे पैदा होते ही, इस अंग्रेजी के पीछे पड़े रहते हैं। अपने ही देश के लोगों की, प्रांत की भाषाओं और बोलियां का ज्ञान नहीं होता जिससे लोगों के संपर्क में आ सकें उनसे बातें कर सकें, उनके विषय में जान सकें। उस महिला का पत्ता तो नीलिमा ने साफ कर ही दिया था क्योंकि इसके पश्चात सम्पूर्ण रास्ते वो नीलिमा से नहीं बोली। अब वह उसकी तरफ देखेगी भी नहीं, यही सोच कर नीलिमा को मन ही मन हंसी भी आ रही थी।
वह लोग तो पहले ही ,किसी अन्य स्थान पर उतर गए, अब उनके जाने के पश्चात नीलिमा, निश्चित हो गई थी। किंतु अभी भी उसने अपना चेहरा छुपाया हुआ था थोड़ी सी भी लापरवाही उसके और उसकी बेटी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। न जाने उसने क्या इंतजाम किया होगा नीलिमा सोच रही थी -क्या कभी ये भी सोचा था ?मुझे अपने ही शहर से इस तरह भागना पड़ जायेगा। जिस शहर ने मुझे पलकों पर बिठाया ,इतना मान -सम्मान दिया। उस....... सोचते हुए उसके जबड़े भींच गए 'डैनी 'के कारण हुआ। यदि वो मुझे मिल गया तो उसे छोडूंगी नहीं। मेरे जीवनभर की कमाई उसने चुटकियों में बर्बाद कर दी।मुझसे उसकी ऐसी क्या दुश्मनी हो सकती है ?नीलिमा ने अपनी' विचार यात्रा 'आरम्भ रखी या कोई और उसके पीछे था।
मुंबई दादर स्टेशन पर नीलिमा रेलगाड़ी से उतर गई ,और अपनी बेटी को ढूंढने लगी, क्योंकि उसकी बेटी कल्पना ने उससे पहले ही कह दिया था ,कि मैं आपकी स्टेशन पर प्रतीक्षा करूंगी। कल्पना स्टेशन पर नीलिमा और अपने भाई को ढूंढ -ढूंढकर थक चुकी थी , वह परेशान थी ,कि गाड़ी तो आ चुकी है ,आखिर यह लोग कहां गए ? अब तो फोन भी नहीं कर सकती। यही सब सोच रही थी। तभी एक महिला ने पीछे से आकर, उसका हाथ पकड़ा उसने नजरे घूम कर देखा तो प्रसन्नता के साथ-साथ आश्चर्यचकित भी रह गई। वह महिला और कोई नहीं थी ,बदले हुए रूप में उसकी अपनी माँ नीलिमा ही थी।
ओह ,मम्मा ! आप आप और इस भेष में....... प्रसन्नता से कल्पना खिल उठी ,
क्या करती ? ऐसे ही आना पड़ा, किसी न किसी के द्वारा पहचान लिए जाने का भी तो डर था।
सच में आप लोग कितने अलग रहे हैं ? दोनों को देखकर बोली -इसीलिए मैं आप लोगों को ढूंढ नहीं पाई।
यही तो हमारा उद्देश्य था।
चलिए ! अभी मैं आप लोगों को एक अच्छी सी जगह ले चलती हूँ। हम वहीं चलते हैं , ऐसा कहकर वह एक टैक्सी रोकती है ,सब उस टैक्सी में बैठ जाते हैं। कल्पना टैक्सी वाले को उस जगह का पता बताती है और टैक्सी चल पड़ती है।
टैक्सी में बैठकर ,कल्पना कहती है - मम्मा अब तो यह घूंघट हटा दो ! अब यहां कौन देखने वाला है ? कल्पना के अपने घूंघट की ओर बढ़ते हाथों को नीलिमा ने वहीं रोक दिया और टैक्सी वाले की तरफ इशारा किया।
कल्पना समझ गई कि मां क्या कहना चाहती है ? मन ही मन प्रसन्न होती है कि मेरी माँ मेहनती होने के साथ -साथ बुद्धिमान भी है। एक स्थान पर वे लोग रुक जाते हैं। वह इलाका थोड़ा, सुनसान सा लग रहा था। टैक्सी को कुछ दूर पहले ही छोड़ दिया था। वहां पर एक कमरा कल्पना ने लिया था। यह स्थान आपको कैसा लगा ? उसे दिखाते हुए नीलिमा कल्पना ने पूछा।
हां सही है, छिपने के लिए तो अच्छी जगह है। अच्छा मैं तुझे जो काम बताया था , क्या वह तूने किया ?
