भूत के डर के कारण ,चतुर को बुखार हो जाता है, और उसके घर वालों को यह भी पता चल जाता है कि चतुर उस 'आम के बगीचे 'में गया था जिसमें वह भूतनी रहती है। श्रीधर यानी चतुर के पिता को अपनी इस गलती का एहसास होता है कि हमें अपने बच्चों को पहले ही, इन परेशानियों से अवगत करा देना चाहिए था। चतुर की माता रामप्यारी, जितनी भी, कहानी जानती थी उसने अपने बेटे को कहानी सुनाई थी। किंतु अब जो होना था ,सो हो गया, इससे पहले की बात बिगड़ जाए , श्रीधर जी ने, शांति से चतुर से उसकी बातें पूछी। उन्होंने रामप्यारी को, मंदिर में जाकर ताबीज लाने की इजाजत दे दी , और स्वयं अपने बेटे के पास बैठ गए और उससे पूछा -वह क्या चाहती है ?
घबराते हुए ,चतुर ने पूछा -कौन ?पिताजी !
वही जो तुम्हें स्वप्न में दिखलाई दी,चतुर को विश्वास में लेते हुए पूछा।
वह तो कुछ मुक्ति के लिए कह रही थी , कह रही थी-' मुझे मुक्ति चाहिए' और कुछ हमारे पूर्वजों की धन संपदा के विषय में भी कह रही थी। अपने पुत्र की बात सुनकर, श्रीधर जी सोच में पड़ गए।
यदि वह चाहती, तो जैसे उसने, अन्य लोगों की हत्याएं की हैं, उन्हें मारा है, इसे भी मार सकती थी किंतु उसने ऐसा कुछ भीनहीं किया। बचपन की कुछ यादें उन्हें स्मरण हो आईं -लोगों को कहते सुना था -कि हमारे पूर्वजों के पास बहुत सारा खजाना था , अपनी धन -संपत्ति को , रखने अथवा छुपाने के लिए,उस समय बैंक नहीं होते थे। तब, अपना धन लोग जमीन में ही ,गाढ़ दिया करते थे। जब चंदा साहब इस गांव में आए थे, तो उनके पास बहुत धन था। आए दिन ,चोरों का भय भी बना रहता था। तब उन्होंने अपने धन को जमीन में गाढ़ दिया किंतु न जाने कैसे ? किसी को भनक लग गई , और वह वहां से निकाल कर ले गया। ऐसा नहीं कि उन्होंने संपूर्ण धन उसी स्थान पर गाढ़ा था, उन्होंने कई ऐसे स्थान थे। जिनमें थोड़ा-थोड़ा धन गाढ़ दिया था। रात -दिन उसकी सुरक्षा के लिए चिंतित रहते थे।
तब चंदा साहब के बेटे' निर्भय सिंह' थे, उन्होंने एक अनोखी तरकीब निकाली ,उन्हें तंत्र विधाओं पर अधिक विश्वास था। उन्होंने कुछ विद्याएं सीखी भी थीं। जिनके चलते, उन्होंने उस धन को एक बड़े से बक्से में बंद करके, किसी गड्ढे में दबा दिया था। तब उस समय उन्हें किसी ने सलाह दी -कि यदि किसी जीवित इंसान को, इसमें इस धन के साथ गाढ़ दिया जाए , तब बिना इच्छा के ,कोई भी उस धन को ले जाना तो दूर ,हाथ भी नहीं लगा सकता। यह बात उन्हें जँच गई अब बात इस पर आती है ,कि ऐसे किसी जीवित इंसान को कैसे मारा जाए या कैसे उस गड्ढे में, जीवित इंसान को दफन होने के लिए कहा जाए। वह जानते थे ,ऐसा कोई भी नहीं कर पाएगा , अपनी जान क्यों कोई जोखिम में डालेगा ?
सुना है ,हमारे पड़ , पड़दादा, ज़िद के पक्के थे। हालांकि उन्होंने उस बक्से पर कुछ तंत्र क्रियाएं की हुई थीं किंतु उन्हें इस बात से संतुष्टि नहीं थी । उन्होंने ठान लिया, कि किसी न किसी को तो इस बक्से के साथ बंद करना ही है। एक दिन एक राहगीर जा रहा था , वह भूख -प्यास से थका हुआ था ,न जाने कहां जा रहा था ,कौन सी उसकी मंजिल थी ? तब उन्हें उस राहगीर के सिवा कोई और नजर नहीं आया। उन्होंने उसे भोजन कराया और उसे गड्ढे के समीप ले गए। उससे कहा -कि यहां कुछ पूजा करनी है ,वह बेचारा, उनके भोजन के कारण एहसानमंद हो गया था। वह उनके समीप ही आसान पर पूजा के लिए बैठ गया , और जैसे ही उन्हें मौका मिला उन्होंने उसको उस गड्ढे में धक्का दे दिया और ऊपर से मिट्टी भी डाल दी। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता कि तेरे साथ क्या हुआ है ? तब तक उसे जिंदा दफन कर दिया गया था। उस गड्ढे के भर जाने पर ,उन्होंने कहा -''मैंने शैतान को जिस इंसान की बलि दी है ,उसे मैं इस धन की सुरक्षा का कार्यभार सोंपता हूँ। उस धन का पहरेदार घोषित करता हूँ।''
यह बात चंदा साहब को भी मालूम नहीं थी , चंदा सब जानते थे ,कि उनका पुत्र, कुछ तंत्र क्रियाएं करता है किंतु इतना नहीं जानते थे कि वह इतना स्वार्थी हो जाएगा कि किसी की हत्या भी कर सकता है। कई महीने बीत गए, वर्ष भी बीत गए धन तो उनके पास इतना था कि कभी उसे धन को निकालने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी और वह निश्चिंत भी थे , कि उस धन को हमने बांधकर रखा हुआ है। कोई चोर या डाकू उसे ले नहीं जाएगा।
कुछ दिन पश्चात, गांव में या गांव के आसपास लोगों की हत्यायें होने लगी। यह आश्चर्य की बात थी ,आखिर यह हत्याएं कौन कर रहा है ,और कैसे हो रही है ? चंदा साहब ! को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था , उन्हें लगा ,शायद मेरे इस धन के कारण ही यह हत्याएं हो रही है। शायद किसी को अंदेशा हो गया है कि यहां पर धन गड़ा है किंतु हत्याएं होने का क्या कारण हो सकता है यह वे नहीं समझ पाए। तब उन्होंने सोचा -शायद किसी को इस खजाने का पता चल गया है। इससे पहले की इस खजाने की जानकारी किसी और को हो, क्यों न मैं इस खजाने को किसी अन्य सुरक्षित जगह पर छुपा दूँ। यह बात उन्होंने अपने पुत्र से कही - कि वहां से अपनी तंत्र विद्या हटाओ ! और उस धन को किसी अन्य सुरक्षित स्थान पर रख देते हैं। थोड़ा धन गांव की उन्नति के लिए भी प्रयोग में आ जायेगा क्योंकि उम्र के साथ -साथ उन्हें एहसास होने लगा था। सब यहीं छोड़कर जाना है ,अपना कर्म ही अपने संग जाता है। शायद इन हत्याओं का कारण समाप्त हो जाए।
उनके पुत्र ने पहले तो इंकार किया किन्तु बाद में सोचा -यह बात मान ली ,उसने सोचा -वर्षों हो गए ,कम से कम उस धन को एक बार देखना तो चाहिए, सुरक्षित है भी या नहीं। ''जब उसने कुदाल से ,उस मिटटी को हटवाने का प्रयास किया ,तब वहाँ से बहुत सारे सर्प निकलकर बाहर आ गए। जो उन व्यक्तियों की और झपटे। सभी लोग वहां से भाग खड़े हुए। जब उसने स्वयं प्रयास किया तो उसे भी बहुत बड़ा झटका लगा। यह कितने आश्चर्य की बात थी? अपने धन को वह स्वयं ही हाथ नहीं लग पा रहा था। ऐसा क्या हो गया ? वह सोच रहा था।
