Sazishen [part 64]

 नीलिमा ,,परेशानियों से जूझ रही थी उसके घर के बाहर भीड़ इकट्ठा हो गई थी वह परेशान थी ,कि किस तरह इन लोगों का सामना किया जाए ?किंतु कोई भी उम्मीद की किरण उसे नजर नहीं आ रही थी। उसे चंपकलाल जी से एक उम्मीद थी कि वे उसका साथ देंगे क्योंकि वे उसे वर्षों से जानते हैं ,किंतु यह उम्मीद भी निर्मूल हुई क्योंकि चंपकलाल जी ने ,उसका साथ देने से इनकार कर दिया। उन्हें स्वयं ही ,उस पर विश्वास नहीं रह गया था ,कि उसने ऐसा नहीं किया होगा क्योंकि 20 लाख की रकम ,कोई छोटी धनराशि नहीं होती ,किसी का भी मन डोल सकता है। ऐसा उनका समझना था ,अभी परेशानियों में उलझी नीलिमा चहूं  ओर नजरें  दौड़ा रही थी कि और किससे  वह सहायता की उम्मीद कर सकती है ,तभी एक फोन आता है और वह लपककर उस फोन को उठा लेती है। उधर से एक मधुर सी आवाज आई ,जिसे सुनते ही नीलिमा  की आंखों में आंसू आ गए और रोने लगी। यह आवाज , यह फोन किसी और का नहीं बल्कि नीलिमा की बड़ी बेटी कल्पना का था। उसके शब्द सुनकर नीलिमा भावुक हो उठी थी। कल्पना बोली - मम्मा ! मैं यह क्या सुन रही हूं ,ऐसा कैसे हो गया ?आप तो इतनी समझदार हैं ,तब भी आपने ऐसा कैसे होने दिया ?


मेरी मति मारी गयी थी ,''जब बुरा समय आता है ,अक्ल भी न जाने ,कहाँ घास चरने चली जाती है ?''परेशानी में ,नीलिमा न जाने क्या -क्या बोले जा रही थी ?

अच्छा ,मम्मा ,शांत हो जाओ ! परेशान होने की आवश्यकता नहीं ,पहले मुझे ये बताइये !आखिर हुआ क्या था ?

तब नीलिमा ने अपनी बेटी को ,सम्पूर्ण  कहानी विस्तार से सुनाई जिसको सुनकर वह बोली - मम्मा,मुझे तो लगता है ,आपको किसी ने जानबूझकर फंसाया है। अब आप पर कोई विश्वास नहीं करेगा ,ऐसे समय में अब आपको वहां से निकलना ही होगा। जब मामला ठंडा हो जाए तब चाहे वापस चली जाना। 

वही तो मैं सोच रही हूं ,कि मैं ,अब क्या करूं ?नीलिमा ने पूछा। 

आप तो मेरी ब्रेव मम्मा हो, आप कैसे इस तरह घबरा सकती हैं ? क्या आप भूल गईं  ?हमारे घर के पीछे भी एक दरवाजा है , आपको वहां से , छुपते -छुपाते निकलना होगा। यदि लोगों ने आपको पहचान लिया तो छोड़ेंगे नहीं। 

अब मुझे यह सब भी करना होगा ,व्यथित होते हुए नीलिमा ने बेटी से पूछा। 

जिस तरह की आज की परिस्थितियाँ  हैं ,उसके आधार पर हमें संभलकर ही चलना होगा ,बाद में देख लेंगे।क्या करना है ?क्या नहीं ?

आश्वस्त होते ही ,नीलिमा का दिमाग़ चलने लगा और बोली - अच्छा यह बता ,तुझे कैसे पता चला ? 

मैंने टीवी पर देखा, 

क्या टीवी पर भी यह खबर आ रही है ? 

हां हां ,

तब मैं अपने को कैसे बचा पाऊंगी? कोई न कोई तो मुझे पहचान ही लेगा। 

वह तो मैं समझती हूं किंतु उससे पहले ,आपको वहां से निकलना होगा। घूंघट करके, बुरखा पहनकर  किसी भी तरीके से ,जिससे कोई पहचाने नहीं ,नीलिमा को तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। किंतु बेटी के आवाज ने ही उसे बहुत हिम्मत दे दी। जो साहस वह अपनी बेटियों के अंदर भरती थी।  आज वही साहस  उसे अपनी बेटी से मिल रहा था। उसके दिमाग में तो ,कार्य करना ही बंद कर दिया था। तब मैं यहां से निकालकर कहाँ जाऊंगी ?

 कहीं नहीं जाना है ,मेरे पास आना है। तब तक मैं आपके यहां रहने की व्यवस्था कर दूंगी। आप घर से  आवश्यक चीज और जरूरत का सामान लेकर वहां से शीघ्र अतिशीघ्र निकलिए उसके पश्चात हम सोचेंगे कि हमें क्या करना है ? बेटी ने सुझाव दिया। ऐसे समय में ,बेटी का फोन उसके लिए वरदान साबित हुआ वह तो जैसे सब कुछ भूल ही गई थी कि उसने कितने साहस से अब तक की जिंदगी को जीया है। किंतु वह प्रेरणा ,उसे अपनी बेटी से मिली और वह जीवंत हो उठी। यह कार्य मैंने नहीं किया। मुझे फसाया गया है, किंतु जिसने मुझे फँसाया है ,मैं उसे भी छोडूंगी नहीं। पता लगा कर रहूंगी ,कि वह कौन है? सोचते हुए ,वह अपने वस्त्र बदलती  है और अपने बेटे का भेष भी बदल देती है। कुछ आवश्यक चीजें लेकर वह घर के पीछे के द्वार की तरफ जाती है. और टोह लेती है, कहीं कोई है तो नहीं। अब वह किसी भी तरह का जोख़िम उठाना नहीं चाहती थी । 

एक महिला और एक पुरुष, जो गुजराती वस्त्रों में, स्टेशन पर बैठे हैं। मुंबई जाने वाली, रेलगाड़ी की प्रतीक्षा में हैं। स्टेशन पर ,लोग इधर-उधर आ जा रहे हैं। गुजराती वस्त्रों में,सतर्कता से बैठी हुई महिला चहुँ ओर  अपनी नज़रें दौड़ा रही है। वह जानती है ,उसके इस तरह गायब होने पर लोगों को विश्वास हो जाएगा कि वह गलत थी किंतु वह यह भी जानती है कि इस समय भी उस पर कोई विश्वास नहीं कर रहा है। किस-किस को अपनी सच्चाई का सबूत देती रहेगी ?


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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