Rasiyan [part 9]

न....... न......  घबराएं नहीं, यह कोई डरावनी कहानी नहीं है ,यह 'रसिया 'की जिंदगी की कहानी है , और जिंदगी में कुछ न कुछ ऐसे हिस्से जिंदगी में आ ही जाते हैं ,जिनको स्मरण कर ,अपनी जिंदगी ,खट्टी -मिट्ठी तो कभी डरावनी नजर आती है। ये भी 'रसिया' के जीवन का एक हिस्सा है। बच्चों को तो जिज्ञासा रहती ही है ,नई चीजें देखने और समझने की हालांकि चतुर लंबा हो गया है, लेकिन बुद्धि से और व्यवहार से अभी भी, वह एक जिज्ञासु ,चंचल बालक है। उसके मन में अनेक प्रश्न उठते रहते हैं। कुछ का जवाब उसे मिल जाता है और कुछ का जवाब उसे नहीं मिल पाता है। सभी बातों पर वह विश्वास भी नहीं करता है। किंतु कुछ कहानी, किस्से ऐसे होते हैं , इंसान की न चाहते हुए भी ,जिज्ञासा बढ़ जाती है। ऐसा ही चतुर है ,उसे आम के बगीचे की कहानी जो सुनाई थी, वह  जानना चाहता था कि इस कहानी में कितनी सच्चाई है ? बस कहानी ही सुनी थी ,वह भी ठीक से नहीं, इसलिए जब से आम के बगीचे से आया है ,तब से रामप्यारी से, उसके विषय में जानकारी हासिल कर रहा है।


 कहानी सुनते-सुनते वह सो जाता है, तभी से उसे वही लड़की दिखलाई देती है, और उसे अपने संग बगीचे में ले जाती है ,जहां उसका असली रूप देखकर, चतुर डर जाता है और नींद में ही चिल्ला उठता है। उसकी मां उसे गले से लगाती है ,वह समझ जाती है कि अवश्य ही ,उसने कोई डरावना सपना देखा होगा। किंतु जब उसके पैर देखती है, तो उसे आश्चर्य होता है। उसके पैर गंदे थे ,मिट्टी में सने हुए थे। जब चतुर को एहसास हो जाता है ,कि यह कोई असलियत नहीं थी वरन एक स्वप्न था। तब वह धीरे-धीरे उस ''स्वप्न '' से , उस डर से बाहर आता है। 

तब रामप्यारी उसके पैर देखकर उसके पैरों की तरफ इशारा करते हुए कहती है- ये देखा ,इसीलिए  बुरे स्वप्न आए, देखो ! तुम्हारे पैरों पर कितनी मिट्टी लगी हुई है ? रात्रि में सोने से पहले ,पैर धोने चाहिए थे।

 अपने मिट्टी में सने ,गंदे पैरों को देखकर, चतुर को आश्चर्य होता है और कहता है - मैं तो पैर धोकर ही सोया था। मेरा यह नित्य का नियम है।

तब क्या ,तुम्हारे पाँव खुद ही उठकर चले गए और गंदे होकर आ गए , रामप्यारी ने बात को हंसी में लिया। 

 रात्रि में  मेरे साथ ऐसा क्या हुआ था ? मैं तो यहीं पर था फिर मेरे पैरों में यह बगीचे की मिट्टी कैसे लगी ?क्या सच में ही मैं ,उस भूतनी के साथ था,या फिर यहाँ सोया था ,वह बड़ी ही असमंजस की स्थिति में आ गया था।  चतुर को बहुत तेज ताप चढ़ा था , उसके शरीर का तापमान पहले से अधिक बढ़ गया था। अचानक यह हालत कैसे हो गई ? कुछ समझ नहीं आ रहा था दो दिनों के पश्चात परीक्षा है , यह सब कैसे करेगा ?

उसकी शिक्षा को लेकर रामप्यारी अनेक चिंताओं से ग्रस्त हो गई ,उसकी शिक्षा को लेकर, तभी उसे स्मरण हुआ -यह बार-बार उस बगीचे वाली चुड़ैल के विषय में पूछ रहा था , कहीं ऐसा तो नहीं ,यह उस बगीचे में पहुंच गया हो और उसका साया ही इसे लग गया हो। मन ही मन बुदबुदाती है -यह लड़का भी न जाने क्या करके छोड़ेगा ?कितनी बार इससे कहा  है ,'इधर -उधर मत भटका कर ''सोचते हुए उसने , मुट्ठी में पांच लाल सूखी साबुत मिर्च लीं और साबुत नमक लिया ''तब उस सामान को चतुर के ऊपर घूमने लगी। ''जो भी बुरी बला हो ,वह टल जाए।''कहते हुए उसके तन के इर्द -गिर्द घुमाया और जाकर उस सामग्री को चूल्हे की अग्नि में झोंक आई।  उसे अपने इस टोटके पर, पूर्ण विश्वास था। उसने आश्वस्त होकर चतुर से पूछा --तुम ठीक हो , ऐसा क्या देख लिया था ? जो तुम डर गए थे। 

 चतुर बताना नहीं चाहता था ,चतुर जानता था अगर उसने, मां को बताया -कि वह उस बगीचे में गया था या उसने उस बगीचे में , एक डरावने साये को देखा तो मां डाँटेगी। कुछ नहीं ,अनमना सा होते हुए वह बोला -रात्रि में आपसे कहानी सुन रहा था ना.......  शायद उसी का असर था। 

देखा, मैं कह रही थी न......... कोई भी उसकी चर्चा भी नहीं करता और तूने संपूर्ण कहानी सुनने का प्रयास किया जिसका असर यह हुआ ,बुरी आत्माओं का नाम भी लेना, बड़ा खतरनाक हो जाता है , कहते हुए , चतुर को आराम करने के लिए कहकर अपने कार्य पर जाने लगी, और बोली- कुछ ही देर में ,डॉक्टर आ जाएगा। 

किंतुु......   वह तो कुछ कह रही थी। 

चतुर की बात सुनकर रामप्यारी वापस आई , और बोली - क्या कह रही थी ?

हमारे पूर्वजों की कुछ धन -संपदा, ऐसा ही कुछ था ,स्मरण करते हुए चतुर कहता है -पूर्वजों का खज़ाना ! कह रही थी, मुक्ति चाहती हूँ। 

यह तू कैसी बहकी -बहकी बातें कर रहा है ? डॉक्टर साहब को आने दे। तब तेरे लिए, पंडित जी से ताबीज बनवाकर लाऊंगी। कहकर वो चली तो गई ,किंतु वे बातें ,उसके मन -मस्तिष्क में घूम रही थीं। हो सकता है, वह मुक्ति चाहती हो, तभी वह हमारे चतुर के स्वप्न में आई किंतु वह किस खजाने की बात कर रही थी ?वे सभी बातें उसके लिए पहेली बन गए ,तब रामप्यारी मन ही मन बुदबुदाई -आई थी ,कुछ तो बताकर जाती। व्यर्थ में ही लड़का भी डरा दिया और कुछ बताया भी नहीं,रामप्यारी स्वयं ही ,अपनी सोच पर झुंझलाई। इधर बेटा बिमार है ,और मैं भी न...... क्या -क्या सोचे जा रही हूँ ? वह चतुर के पिता की प्रतीक्षा करने लगी। जब वह आएंगे तो उन्हें सारी बातें बताऊंगी , शायद वही कुछ जानते हों। 

कुछ देर पश्चात ही, चतुर के पिता डॉक्टर को लेकर आ गए। जब रामप्यारी को पता चला था ,कि चतुर को बुखार है तो तुरंत ही उसने मोहल्ले के एक लड़के को चतुर के पिता का पता लगाने के लिए भेज दिया था , और साथ ही कहलवा दिया था -'कि डॉक्टर को लेकर आ जाएं, चतुर को बहुत बुखार है। '

उसे लड़के ने अपना कार्य है, पूरी ईमानदारी से किया और कुछ देर पश्चात ही ,डॉक्टर साहब और उसके पिता आ गए। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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