Sazishen [part 63 ]

''नीलिमा ''के घर के बाहर, बहुत सारे लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई है। वह उसके विरुद्ध नारेबाजी कर रहे हैं। कुछ लोगों का व्यवहार तो इतना नकारात्मक है , कि वह घबरा जाती है और रोने लगती है। ऐसे में अपने बेटे को लेकर वह कहां जाएं ,क्या करें ? पहले तो सोचती है, वह अपनी बात इस भीड़ को बताएं किंतु वह यह भी जानती है ,यदि भीड़ बिगड़ गई, तो उसका भी बहुत कुछ बिगड़ जाएगा। ऐसे में कोई किसी की सुनता भी नहीं है। अपनी वह बेटे की सुरक्षा के लिए, उसे दरवाजे पर, भारी सामान लगा देती है। तब वह शीघ्र अति शीघ्र अंदर आती है और चंपकलाल जी को फोन लगाती है। पहले तो बहुत देर तक फोन लगता  ही नहीं है , क्योंकि वह भी अनेक सवालों का सामना कर रहे थे। उन्हें भी लोगों को जवाब देना पड़ रहा था, क्योंकि नीलिमा उनकी संस्था में ही, कार्य करती थी।


 बहुत देर तक फोन ना उठने पर, नीलिमा सोचती है -पता नहीं ,क्या हो रहा है ?न जाने आज किसका मुंह देख लिया ? कोई  भी कार्य उचित रूप से नहीं हो रहा है। यह सब मेरा  ही दोष है। मुझे उस पर विश्वास ही नहीं करना चाहिए था। यह चंपकलाल जी की भी तो गलती है ,उन्हें मुझे बताना तो चाहिए था कि वह' चैक' झूठा था। इसी कारण से मैंने भी विश्वास किया था। हो सकता है ,वह ''वाहन चालक '' भी झूठा ही हो । अब मैं क्या करूं ? कैसे इन लोगों से पीछा छुड़ाऊं ? इंस्पेक्टर साहब भी तो, अब दूसरे आ गए हैं। इंस्पेक्टर विकास खन्ना तो मुझे अच्छे से जानते थे। न जाने यह इंस्पेक्टर भी साथ देगा या नहीं। वह दोबारा फोन करने का प्रयास करती है। अबकी बार फोन लग जाता है -हेलो !

चंपकलाल जी ! क्या आप जानते हैं ?मेरे घर के बाहर भीड़ इकट्ठा हो गई है। किसी  तरह से इनसे मेरी जान छुड़वाइए। आप तो मुझे जानते ही हैं। मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है ,नीलिमा गिड़गिड़ाते हुए बोली।  

देखो ! इस विषय में मैं ,तुमसे कुछ नहीं कह सकता, क्योंकि इसके विषय में तुमने भी मुझे कुछ नहीं बताया था। तुम्हारे पास इतना पैसा कहां से आया ?

कैसे बताती ? कल ही तो वह ''डैनी ''देकर गया था।  कुछ दिन ,रखने के लिए देकर गया था। 

वह तुम्हारे पास क्यों 20 लाख रुपया रखेगा ? और डैनी कौन है ? उसे यदि पैसा देना था तो हमारी संस्था को देकर जाता ,तुम्हें क्यों देकर गया ?

उसने संस्था के लिए ,कोई पैसा नहीं दिया है, कुछ दिन रखने के लिए दिया था , कुछ दिन के बाद आकर   वापस ले जाता। 

क्या तुम उसे जानती थीं  ?

नहीं ! मैं तो 'जावेरी जी 'को जानती थी। 

फिर वही बात ! क्या तुम ''जावेरी जी'' को भी जानती हो ? 

यह आप क्या कह रहे हैं ? बस उनका नाम सुना है। 

वह तुम्हें नहीं जानते ,तुम उन्हें नहीं जानती, बिना जान -पहचान के ही कौन 20 लाख रुपए देता है ?ये कोई मामूली रक़म नहीं...... 

 उनके ड्राइवर ने मुझसे कहा था -कि वह मुझे मेरे लेखो और संस्था ,मेरे कार्यो के कारण मुझे जानते हैं। 

तुमने ऐसा क्या कार्य किया है ? तुमने तो मेरी संस्था का नाम ही डुबो दिया , भड़कते हुए चंपकलाल जी बोले। 

सर ! ऐसा मत कहिए ! मैंने आपकी संस्था को अपने जीवन के कीमती क्षण दिए हैं। 

 तो तुमने उनकी कीमत वसूल कर ली। 

नहीं ,ऐसा कुछ भी नहीं है, पैसे मेरे पास नहीं हैं। 

हां यह भी है ,''रंगे हाथों जो पकड़ी गई हो। '' तुम भी कोई ''दूध की धुली ''नहीं हो। 

सर !मुझे आपसे सहायता की उम्मीद थी, यदि आप भी ऐसा कहेंगे तो फिर मुझ पर कौन यकीन करेगा ? सबसे पहले मेरा इन लोगों से पीछा छुड़वाईये। चंपकलाल जी भड़के हुए थे ,इतना पैसा मेरी संस्था की कार्यकर्ता पर निकला ,हो सकता है ,इससे पहले भी ,इसने मुझसे झूठ बोला हो ,अब पकड़ी गयी तो ''घड़ियाली आंसू बहा रही है। ''

इससे तो पीछा छुटेगा, या नहीं किंतु शायद पुलिस भी सक्रीय हो गई हो, हो सकता है ,तुम्हें ससुराल ले जाने के लिए वे लोग ,आ ही रहे हों क्योंकि उन्होंने इस विषय में कुछ भी जानकारी न होने के कारण अपना पल्ला झाड़ लिया। 

नहीं ,सर मैं इस तरह से नहीं जा सकती, मेरे बेटे का क्या होगा ? वह तो ,अपनी मां के बिना कुछ भी नहीं कर सकता। 

यह सब तो तुम्हें, ऐसा कार्य करने से पहले ही सोच लेना चाहिए था। 

मैंने कोई भी ऐसा कार्य नहीं किया है, आप मुझ पर विश्वास क्यों नहीं कर रहे हैं नीलिमा रोने लगी किन्तु चंपकलाल जी ने फोन काट दिया। मैं जेल नहीं जा सकती ,जब मैंने कुछ किया ही नहीं ,तब मैं ''जेल ''क्यों जाउंगी ?बाहर कोलाहल अंदर कोलाहल !अब वह क्या करे ?तभी उसके फोन की घंटी बज उठी। पहले तो एकदम से डर गयी ,अपनी व्यथा में जो भटक रही थी उससे बाहर आते ही ,उसके मन में फिर से एक उम्मीद की किरण चमकी और उसने लपककर फोन उठाया किन्तु  वो चंपकलाल जी का फोन नहीं था। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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