Sazishen [part 62]

 अगले दिन ,''समाचार पत्र ''की मुख्य सूचना यही थी। एक ''समाज सेविका ''ने किया ,घोटाला !''बच्चों के नाम पर आये पैसे ,खाये ! लोग दान करते हैं ,गरीबों की सेवा करते हैं। विकलांगों की सहायता करते हैं किन्तु कुछ लोग ऐसे भी हैं ,जो 'समाज सेवा 'के नाम पर ,दूसरों का हक़ भी खा लेते हैं। ये बात तो तब है ,जिसका स्वयं का बेटा ''किसी बिमारी से पीड़ित है। उस माँ को ,अन्य बच्चों का हक छींनते हुए ,क्या तनिक भी लज्जा नहीं आई। कैसी स्वार्थी और लालची माँ है ? उसने समाज की सेवा का बीड़ा उठाया था ,या समाज को चूना लगाने का।''क्या कोई माँ इतनी भी स्वार्थी हो सकती है ?जो दूसरे के हक़ का निवाला छीनकर अपने बच्चों को खिलाये। क्या दूसरों के बच्चे ,बच्चे नहीं हैं ?ये शहर उस माँ से पूछता है -'जिन लोगों ने उस पर इतना विश्वास किया,उसने उनके विश्वास  को क्यूँकर चकनाचूर करके रख दिया ?

नीलिमा के पास ,चंपकलाल जी का फोन आता है ,नीलिमा को थोड़ी राहत मिलती है और सोचती है -कम से कम ये तो मेरी बातों को समझेंगे ,झट से फोन उठाती है -हैलो  !

मैं ये क्या पढ़ -सुन रहा हूँ ? सभी समाचार -पत्रों में यही खबर छपी है,टेलीविजन पर भी यही दिखाया जा रहा है। 


मैं अब आपसे क्या बताऊँ ?सर ! मुझे फंसाया जा रहा है ,मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया। आप स्वयं ही सोचिये ! क्या आज तक किसी ने भी इतनी बड़ी धनराशि हमारी संस्था को दी है। ये सब मुझे फंसाने की चाल है। 

ये सब देखते हुए तो ,मुझे नहीं लग रहा ,कि तुम्हें फंसाया गया है फिर कोई तुम्हें क्यों फँसायेगा ?किसी की तुमसे क्या दुश्मनी हो सकती है ?

सर !यह तो ,मैं भी नहीं जानती , किंतु मैं इतना जानती हूं कोई तो है, जो मेरा दुश्मन बना हुआ है , और उसने मुझे इस जंजाल में फँसाने की 'साजिश 'की है। 

तुमने टीवी चलाकर देखा, सब कुछ स्पष्ट नजर आ रहा है ,आखिर ये  इतने सारे पैसे तुम्हारे पास कहां से आए ?

वही तो मैं आपसे बताना चाह रही हूँ ,ये पैसे ''जावेरी प्रसाद जी , के हैं। 

कौन है ? यह 'जावेरी प्रसाद !'

क्या आप भूल गए ? उन्होंने अभी कुछ महीना पहले ही, हमारी संस्था को 2 लाख का चेक दिया था। 

उसे कैसे भूल सकता हूं ? न जाने कौन है ? धोखा था सब , 

यह आप क्या कह रहे हैं ?नीलिमा आश्चर्य से बोली -यह आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया ?

क्या बताता ?उसमें तुम क्या कर लेतीं ?

मैं सतर्क तो हो सकती थी, धोखा खाने से बच जाती। उन्हीं का वो...... इससे पहले की नीलिमा अपनी बात पूर्ण कर पाती ,उसके मुख्य द्वार पर उसे तीव्रगति से आता कोलाहल सुनाई देने लगा। लगता है ,काफी सारे लोग हैं ,जो उसके उस द्वार, पर धक्का -मुक्की कर रहे हैं।

 सर मैं अभी बात करती हूं , कह कर दरवाजे के समीप चली गई। झिरकियों में से झांककर देखा, कुछ महिलाएं और पुरुष हैं -''जो ''नीलिमा सक्सेना'' हाय हाय कर रहे हैं , इसे बाहर निकालो ! इस धोखेबाज औरत को, जो बेचारी बनाकर ,अब तक हमारी भावनाओं से खेलती आई है। हमने तो सोचा था, बेचारी ! विधवा महिला है , बच्चों का साथ है ,कहां जाएगी ? उसकी सहायता कर दिया करते थे, किंतु उसने तो , ''पहुंचा पकड़ते ही, हाथ पकड़ लिया'' इंसानियत ही भूल गई। इस मोहल्ले से निकालकर बाहर करो ! ये इस मोहल्ले में रहने लायक नहीं है। कुछ महिलाओं ने उसके द्वार पर, लातों से प्रहार किया। इतनी आक्रोशित भीड़ को देखकर, नीलिमा सहम गई। वह बुरी तरह घबरा उठी, यदि ये लोग अंदर आ गये  ,तो....... उसने उनके हाथों में रंग की बाल्टी देख ली थी। यह मेरे मुंह पर 'कालिख़ ' लगाने आई हैं , एक -दो को तो वह अच्छे से जानती भी है ,मैंने इनकी कितनी बार मदद की है ? किंतु आज कैसे मेरे विरोध में खड़ी हो गई है। सच ही कहते हैं ,दुनिया में कोई किसी का नहीं है। सोचते हुए ,अपने बेटे को गले से लगाकर रोने लगी। 

ऐसे में उसे चंपकलाल जी से उम्मीद थी ,वह भी टूट गयी ,मैं भाग कर जाऊंगी भी ,तो कहां ? क्यों ना बाहर निकलकर एक बार इनका सामना ही कर लिया जाए ? इन्हें  बतला देती हूं कि मैंने  ऐसा कुछ भी नहीं किया है। क्या ये  लोग ,मेरी बात को मानेंगे ? भीड़ तो कतई नहीं मानेगी। इस भीड़ में जो मेरे विरोधी होंगे, वह अवश्य ही कुछ न कुछ करके मुझे फसाने का प्रयास करेंगे ,मेरी बात कोई भी नहीं सुनेगा। अभी मैं इन लोगों के सामने नहीं जा सकती। यदि ये लोग ही अंदर आ गयीं ,यह सोचकर ,उसने दरवाजे के पास घर के भारी -भारी सामान ,जैसे -मेज ,कुर्सी, अच्छे से सटा दीं , ताकि यह दरवाजा खुलने न पाए। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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