Sazishen [part 61]

''नीलिमा सक्सेना ''के पास , 'जावेरी प्रसाद' का व्यक्ति आता है और नीलिमा को एक रूपयों  से भरा बैग देता है। वह बताता है -कि यह जावेरी प्रसाद का धन है। उन्होंने मुझे सुरक्षित रखने के लिए दिया था किंतु मेरा घर बहुत छोटा है और वहां पर रहने वाले लोग ज्यादा हैं। मैं इसकी देखरेख ठीक से नहीं कर पाऊंगा। इसीलिए कुछ दिनों के लिए ,आपके पास यह रुपया रखने के लिए आया हूं। किसी अनजान व्यक्ति से, नीलिमा कैसे पैसे ले सकती थी ? वह भी 20 लाख रुपया कम रकम नहीं होती। पहले तो पैसा रखने से इंकार ही कर देती है। तब वह उससे कहता है -कि आपके लिए हम अनजान नहीं हैं ,हमारे लिए आप अनजान नहीं हैं। जब वह अपनी विवशता बताता है ,तब वह तैयार हो जाती है और उस ड्राइवर का नाम भी पूछती है। वह जावेरी प्रसाद जी का ड्राइवर'' डैनी'' था। इतनी भारी रकम अपने पास रखकर, उसकी स्वयं की नींद उड़ चुकी थी। किसी को कुछ भी पता न चले ,यह सोचकर वह, पलंग के  नीचे वह पैसा रख देती है , किंतु इससे भी उसे संतुष्टि नहीं हुई और वह सोचती है -कि अगले दिन मैं इस पैसे को लॉकर में रख कर आ जाऊंगी ,ताकि यह सुरक्षित रहे, जब वह वापस लेने आएगा। तब उसे यह धन लौटा दूंगी। 


किंतु नीलिमा नहीं जानती थी ,वह किसी बड़े षड्यंत्र का शिकार हो रही है। देखने में तो बात सीधी और सच्ची नजर आ रही है कि  जावेरी प्रसाद जी ने वह धन' डैनी 'को रखने के लिए दिया और डैनी उस धन को, नीलिमा सक्सेना के पास सुरक्षित रखने के लिए आता है और कुछ दिन में वापस ले जाने की विनती करता है। उस पैसे के कारण ,नीलिमा परेशान तो होती है किंतु अगले दिन बैंक में रखने के लिए सोच कर , उस सूटकेस को अपने पलंग के नीचे रख देती है। उस पर कोई अविश्वास भी नहीं कर सकता था। क्योंकि उसने अपने परिश्रम से और ईमानदारी से , उस संस्था का नाम बढ़ाया है , और साथ ही लोग ,उसे भी जानने लगे। 

प्रातः काल नीलिमा उठाती है और अपने बेटे, के सभी दैनिक कार्य पूर्ण कराती है ,क्योंकि वह तो उसकी बिना सहायता के कुछ कर ही नहीं सकता है हालांकि नीलिमा का प्रयास रहता है कि उसका बेटा अथर्व  अपने सभी कार्य  स्वयं करें किंतु उसके पश्चात भी, बहुत से ऐसे कार्य हैं ,जो नीलिमा को करने पड़ जाते हैं। उस पर कार्य का अधिक दबाव भी नहीं है , क्योंकि दोनों बेटियां, बाहर जा चुकी हैं। दोनों ही अपनी-अपनी रुचि के कार्य कर रही हैं। अब नीलिमा को, संस्था और अपने बेटे अथर्व के सिवा और कोई कार्य नहीं है। पहले वह स्कूल में पढ़ाती थी किंतु अब संस्था, के मालिक चंपकलाल जी ने, उसका वेतन तय कर दिया है। उसका घर खर्च भी इसी से चल जाता है। अभी नीलिमा अपने कार्य पूर्ण कर ही रही थी , तभी अचानक उसके दरवाजे की घंटी बजती है। इस वक्त दरवाजे पर कौन होगा ? सोचकर नीलिमा दरवाजा खोलती है। सामने कई सारे व्यक्ति  खड़े दिखलाई देते हैं ,अपनी आदत के अनुसार , मुस्कुराते हुए नीलिमा ने उनसे पूछा - जी कहिए !

हमें आपके घर की तलाशी लेनी है, उनमें से एक व्यक्ति ने कहा। 

मेरे घर की तलाशी ! भला क्यों ?

आप हटिये !अभी पता चल जाएगा ,कहते हुए वह व्यक्ति जबरन ही, उसके घर में घुस गया। 

क्या अजीब जबरदस्ती है ? मुझे पता तो होना चाहिए कि मेरे घर की तलाशी क्यों ली जा रही है ? उसके पीछे-पीछे जाते हुए नीलिमा ने पूछा। वह घर में से सामान को इधर-उधर निकाल कर कुछ ढूंढ रहा था। आप क्या ढूंढ रहे हैं ? मुझे पता तो चले ! तेज स्वर में नीलिमा बोली। 

देखिए ! चिखिये मत ! हम अपना कार्य कर रहे हैं। 

आप लोग कौन है ? मैं यह भी नहीं जानती, और क्यों मेरे घर की तलाशी ले रहे हैं ? मुझे यह भी मालूम नहीं है। क्या आप पुलिस वाले हैं ? पुलिस वाला कहते ही उसे, इंस्पेक्टर विकास खन्ना का स्मरण हो आया किंतु अब इससे भी कोई लाभ नहीं, क्योंकि इंस्पेक्टर विकास खन्ना का, इस शहर से तबादला जो हो चुका है। 

तब उस व्यक्ति ने जवाब दिया -हमें पता चला है ,कि आप संस्था के नाम पर , काला धन एकत्रित कर रही हैं। लोगों से बहुत सारा पैसा ले लेती है , और संस्था को भी नहीं देती हैं। 

यह सब आपसे किसने कहा ?

किसी ने तो कहा होगा? हमारे पास शिकायत आई है तभी हम लोग यहां आए हैं। कहते हुए उसने नीलिमा के उसी पलंग के नीचे झांका और वहां से, सूटकेस निकालकर बाहर ले आया। 

देखिए !यह रहा वह धन , कहते हुए उसने अपने साथ आए अन्य लोगों, को वह धन दिखलाया ,कुछ ने  उसकी तस्वीर भी ली। उसके साथ ही ,नीलिमा की तस्वीर भी ली , देखिए !यह सब आप सही नहीं कर रहे हैं। यह धन मेरा नहीं है ,मेरे पास किसी की अमानत है। 

भला इतना धन, आपके पास कोई क्यों रखेंगा ? क्या बैंक नहीं है ?यह धन संस्था के नाम  पर है , किंतु इसे आपने अपने घर में रखा हुआ है। 

यह सब आपसे किसने कहा ?क्या संस्था के मालिक चंपकलाल जी ने आपसे शिकायत की ? या  किसी और ने, कुछ कहा। 

चंपकलाल जी ,को भी पता चल जाएगा, जिस पर वह इतना विश्वास किये  बैठे हैं, वह कितनी धोखेबाज और चोर है ? वरना एक 'समाज सेविका 'के पास इतना धन कहां से आया ?जिसकी बेटी विदेश में शिक्षा ग्रहण कर रही है, और बड़ी बेटी महंगे से महंगा कोर्स सीख रही है। 

देखिये  मेरी बेटियों के विषय में कुछ मत कहिये !वे होशियार हैं  , वह छात्रवृत्ति से गई है,मैंने भी कोई चोरी नहीं की। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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