चहुं ओर अंधकार,
भटकते हम, न सुने कोई पुकार !
जीवन को जीते,
सूझता आगे जाने का,न कोई मार्ग !
चल रहे ,अपनी राह,
गहन ,अंधकार में,
उम्मीद के दिए संग।
बढ़ते आगे गए,
अपने साहस के संग।
सूझता नहीं कुछ ,
समझ आता ,नहीं।
प्रभु ! ऐसे में थामो !
अपने भक्त का हाथ ,
भटकता ,इस अंधेरे में,
दिखता नहीं, कोई साथ।
प्रभु ने संभाला है,
यही सोच ,आगे बढ़ता गया।
प्रकाश की तमन्ना में,
मौत के समीप पहुंच गया।
विस्तृत ,खुला गगन !
प्रकाशित हुआ मन !
जीवन का अंतिम सत्य समझ गया।
जगत के व्यूह में फंसा, निकल गया।
