चंपक को पूजा की याद सता रही है ,प्यार में नहीं ,बल्कि अपने बच्चे के कारण वह उसे स्मरण कर रहा था। उसे लग रहा था ,छाया से बच्चा जब होगा तब होगा किन्तु जो अब है ,क्यों न उसको ही अपने समीप लाया जाये ?उसकी बेचैनी और परेशानी देखकर ,चंपक की माता जी ने ,उससे प्रश्न पूछा -तू इतना परेशान क्यों है ?
माँ के प्रश्न से ,चंपक थोड़ा सकपका गया। अब माँ से क्या कहे ?उसकी औलाद तो है किन्तु न जाने कहाँ है ? कई दिनों से उसे ढूँढ रहा हूँ किन्तु वो तो कहीं मिल ही नहीं रही। सब मेरी ही गलती है। मैं इस....... अपनी पत्नी की तरफ देखते हुए ,के रूप के माया जाल में जो फंस गया था। मैंने सच्चे प्यार को और अपनी संतान को खो दिया।
क्या सोच रहा है ,बताता क्यों नहीं ?
कुछ नहीं ,तभी उसने फिर से वही पत्र उठाया और उसे पढ़ने लगा। जिसमें लिखा था -मैं इसे पैदा करुँगी ,किन्तु ये अनाथों वाली ज़िंदगी जियेगा, यानि वो मेरे बच्चे को किसी 'अनाथाश्रम 'में डाल देगी। कैसी औरत है ?मेरे किये की सजा मेरे बच्चे को देगी। अगले दिन वो एक इंजीनियर को बुलवाता है और एक नक्शा तैयार करवाता है। कुछ ही महीनों पश्चात ,एक इमारत बनकर तैयार हो जाती है। वो इमारत अनाथ बच्चों के लिए थी ,उसे उम्मीद थी ,शायद इन अनाथों में कहीं न कहीं मेरा बच्चा भी हो सकता है। ये वही अनाथाश्रम है ,जिसको आज ''नीलिमा सक्सेना ''संभालती है।
इतने वर्ष हो गए ,चंपक को न ही पूजा मिली ,न ही उसका बच्चा !बस एक उम्मीद से जीये जा रहा था। छाया जब तक दवाई खाती ,ठीक रहती ,किन्तु इतना तो समझने ही लगी थी कि वो इस परिवार को कोई ख़ुशी न दे सकी। उसने दवाई खानी बंद कर दीं ,धीरे -धीरे उसकी तबियत बिगड़ती गयी और एक दिन वो इस दुनिया को छोड़कर ही चली गयी। चंपक अकेला अपने कारोबार में व्यस्त हो गया किन्तु उसे एक उम्मीद थी ,शायद किसी न किसी दिन मेरा बेटा मुझे मिल जाये। मेडिकल कॉलिज के आज भी चक्कर लगाता है ,ताकि कभी तो पूजा उसे मिलेगी और उसके बच्चे का पता बताएगी।
मैडम !ये इंसान बरसों से यहाँ आ रहा है ,आपके विषय में पूछता भी है ,जबकि हमने इससे कितनी बार झूठ बोला है ,कि हमें उनका पता मालूम नहीं है किन्तु तब भी यहाँ आता है और आपके विषय में पूछता है। आप क्यों नहीं ,उससे एक बार मिल लेतीं ,सिस्टर मारथा ने पूजा से पूछा ।
सिस्टर !वो मेरे लिए नहीं ,मेरे बच्चे...... कहते -कहते रुक गयी और बोली -अपने बच्चे के लिए यहाँ आता है। मैं उस दिन को कभी नहीं भूल सकती ,जिस रात्रि ये मुझे धक्का देकर आ गया था ,इस इंसान ने एक बार भी पलटकर नहीं देखा कि ऐसी हालत में ,मैं जिन्दा हूँ या मर गयी। वो तो मेरे सिर में चोट आई और मैं बेहोश हो गयी। यदि मर ही गयी होती तो ,मेरे पेट में जो इसका बच्चा पल रहा था। वह भी मर जाता इसीलिए अब इसके लिए हम मर ही गए हैं।
मैडम !क्या अब आप कभी विवाह नहीं करेंगी ?अब तो आपको अपने विषय में सोचना चाहिए , अकेले इतनी बड़ी ज़िंदगी कैसे बिताएंगी ?
क्यों ?मेरा बेटा है ,मेरे मरीज़ हैं ,मुझे और क्या चाहिए ? मारथा ! हमारे यहाँ दिल से रिश्ता जुड़ता है और मैंने एक से रिश्ता जोड़ा ,हालाँकि उससे मुझे धोखा मिला किन्तु मैंने तो प्यार किया था। उसे तो नहीं झुठला सकती। उसके प्यार की निशानी मेरे पास है ,मुझे और क्या चाहिये ?
जब आपको उनसे इतना प्यार है ,तो उनके पास क्यों नहीं चली जातीं ,क्यों नहीं मिल लेतीं ? एक बार तो मिल लीजिये ,शायद उनके मन में अपनी गलती का एहसास हो ,वो आपसे क्षमा मांग ले।
आज बहुत बातें हो चुकीं ,जरा बाहर जाकर तो देखो !कोई मरीज आया है या नहीं ,पूजा मारथा को कोई जबाब नहीं देना चाहती थी ,इसीलिए बहाने से उसे बाहर भेज दिया।
उसके जाने के पश्चात ,पूजा ने अपनी दराज़ से एक तस्वीर निकाली ,जिसे देखते ही उसकी आँखें नम हो आईं। मैंने तो उसी दिन तुमसे विवाह कर लिए था ,जिस दिन मैंने अपने आपको तुम्हें सौंप दिया था। बस दुनिया की थोड़ी रीत ही तो निभानी थी ,जिसके लिए तुमने किसी और को चुना। आज भी मैं अपने को तुम्हारी 'अर्धांगनी 'ही मानती हूँ। अब तुम्ही बताओ ! एक विवाहिता का क्या दुबारा विवाह होता है ?'' पका हुआ बर्तन !क्या दुबारा चाक पर चढ़ता है ? न जाने कितने प्रश्न वो उस तस्वीर से पूछती ? और उस तस्वीर को चुपचाप दराज़ में रख देती।
