अपने रसिया, यानी की 'चतुर भार्गव 'ठहरे मस्त मौला ! मां को भावनात्मक रूप से , अपने पक्ष में कर लिया। बेचारी का इकलौता बेटा है , हालांकि वह चाहती है -कि वह पढ़ -लिखकर बड़ा आदमी बन जाए शहर में जाकर, एक अच्छी सी नौकरी करें , किंतु उसे इतना भी, कष्ट पहुंचाना नहीं चाहती , जितना आज उसके मास्स साहब ने पहुंचाया। बेचारे को कमची से पीटा ,तन पर निशान पड़ गए। मास्टर है ,कि हैवान !भला ,कोई बच्चे को इस तरह से पीटता है। लेकिन वह नहीं जानती थी ,यह सब, चतुर का अभिनय है, जिसमें वह फस गई है। वो तो पिट -पिटकर बेहा बन चुका है जितना पिटता है उतना ही मजबूत होए के साथ -साथ लम्बा होता जा रहा है।
मां है, भावनात्मक रूप से जुड़ाव है , उसे कष्ट देना तो नहीं चाहेगी। बस इसी बात का, चतुर ने लाभ उठाया। खैर जो भी है, उस दिन तो वह बच गया। लेकिन इन बातों से क्या चतुर के व्यवहार में कोई सुधार आया ? यह गलतफहमी, तो किसी को पालनी भी नहीं चाहिए। उसके पिता वाली बात -'बच्चा है ,बच्चा बालपन में खेलेगा ,कूदेगा नहीं तो और किस उम्र में खेलेगा ?हमारी उम्र में ,यह उम्र तो बनी ही इसीलिए है।
मां ने अपने बेटे को लाड़ तो लड़ाया, किंतु उससे वायदा भी ले लिया -''अब वह परिश्रम से अपनी शिक्षा पर ध्यान देगा। ''सारा दिन उसे कुछ करना नहीं होता है , इसीलिए यदि उसे खेलना है तो कुछ घंटे, पढ़ाई के लिए भी निकालने होंगे। चतुर ने, मां की बात को समझा और माँ से वायदा भी किया -'कि वह पढ़ाई के लिए समय निकलेगा।' खेल के समय खेल और पढ़ाई के समय पढ़ाई करेगा।' अभी इस घटना को कुछ दिन ही बीते थे , तभी उनका कुम्हार चतुर की शिकायत लेकर घर पर पहुंच गया। घर के बाहर शोर -शराबा सुनकर, रामप्यारी ने अपनी सास को बाहर देखने के लिए भेजा कि बाहर कैसा शोर - शराबा है ? रामप्यारी की सास ने बाहर आकर देखा, टीकाराम खड़ा शोर मचा रहा था।
अम्मा !ऐसे नहीं चलेगा , अपने लड़के को थाम कर रखो ! मेरा जो नुकसान हुआ है ,उसे कौन भरेगा ?
कुछ देर पश्चात ,रामप्यारी भी बाहर आई, और अपनी सास से पूछा -माता जी क्या हुआ ?
क्या होना था ? तेरी औलाद के करतब सुना रहा है , इसने जो बर्तन बना कर रखे थे, उन्हें फोड़ आया।
ऐसा कैसे हो सकता है ? घूँघट की ओट से रामप्यारी बोली -वह तो अपनी किताब लेकर छत पर बैठा पढ़ रहा है।
तो क्या मैं झूठ बोल रहा हूं ?
तुम झूठ नहीं बोल रहे हो ,तुम्हारा नुकसान हुआ है तभी तो यहाँ तक चले आये , किंतु किसी और का बालक होगा ,हमारा नहीं...... वह तो छत पर बैठा पढ़ रहा है। यकीन ना हो तो....... छत पर चलकर देख लीजिए।
रामप्यारी स्वयं तो छत पर गई नहीं, और अपने सास के साथ, ''टीकाराम ''को भेज दिया।
चतुर जोर-जोर से, अपनी पुस्तिका लेकर, याद कर रहा था , और ऐसा व्यवहार कर रहा था जैसे उसने अपनी दादी और टीकाराम को देखा ही नहीं। टीकाराम क्या कहता ? चुपचाप नीचे आ गया और बड़बड़ा रहा था ,उसने भी यही कपड़े पहने थे। तब तक राम प्यारी ने बहुत सारा गेहूं निकालकर रख लिया था , और टीकाराम को देते हुए बोली -तुम्हारा जो भी नुकसान हुआ है, उसके बदले इसे ले जाओ !
जब हमारी बात कोई मान ही नहीं रहा, तब मैं यह भुगतान क्यों लूं ?
रामप्यारी की सास बोली -कोई बात नहीं, तुम्हारा नुकसान तो हुआ है , गांव के ही किसी बालक ने कर दिया होगा ,उसकी भरपाई हम कर देते हैं। तुम यह अनाज ले जाओ ! रामप्यारी की सास के कहने पर टी काराम ने वह गेहूं उठा लिया और अपने घर चला गया।
उसके जाने के पश्चात ,राम प्यारी छत पर गई , तब चतुर छत की मुंडेर पर बैठा हुआ था। बड़े प्यार से ,हौले से चतुर से बोली -बेटा ! पढ़ाई हो गई।
हां थोड़ा सा और रह गया है, उसे भी करता हूं।
अबकी बार अच्छे नंबर लाना, बातें तो वह कर रही थी किन्तु उसकी नज़रें इधर-उधर घूम रहीं थीं। उसने टीकाराम को गेहूं देकर यूं ही नहीं टरका दिया ,उसे पूर्ण विश्वास था -कि चतुर ने ऐसा किया होगा। किंतु बाहर वाले के सामने अपने बेटे को डांट या पीट भी तो नहीं सकती। तब छत पर उसने, मिट्टी के निशान देखे जो पड़ोस की छत से आ रहे थे।
तब अपनी माँ को इधर -उधर देखते ,देखकर चतुर ने पूछा -क्या ढूंढ़ रही हो ?
मैं सबूत ढूंढ़ रही हूँ ,चोर , कितना भी शातिर क्यों न हो ?कुछ न कुछ सबूत छोड़ ही देता है। तब रामप्यारी ने, चतुर से पूछा -तेरे चप्पलों में यह मिट्टी कैसे लगी है ?
मां तुमने ध्यान नहीं दिया, जब मैं आया था ,तभी यह गंदी हो गई थीं , कीचड़ में सन गयी थीं। बाहर एक गढ़ा था, उसमें कीचड़ हो गई थी बस वहीं पर मेरा पर धंस गया था। वैसे टीकाराम यहां क्यों आया था? अनजान बनते हुए ,उसने पूछा।
क्यों ,तुम्हें नहीं पता ?उसके चेहरे पर नजरें गड़ाते हुए पूछा। ये कीचड़ तो नहीं लग रही, यह मिट्टी तो चिकनी है।
मुझे नहीं पता, अबोध बनते हुए ,चतुर बोला।
गांव में रह रहा है, मिट्टी में खेलता है, और तुझे यह नहीं पता कि कीचड़ और चिकनी मिट्टी में क्या अंतर है ? सच-सच बता !तूने ही उसके बर्तन फोड़े , है ,न....... और पड़ोस की छत से वापस घर आ गया।सच बोलेगा तो नहीं मारूंगी , नहीं तो ,अभी बुलाऊं रामकली ताई को , उन्होंने तो तुझे अपनी छत पर चढ़ते हुए दिखाओ होगा, गुर्राते हुए रामप्यारी बोली।
वह समझ गया ,मां से अब झूठ बोलना, ठीक नहीं रहेगा , वह बोला -थोड़ी देर के लिए ही तो गया था।
मैंने तुझे कब मना किया ?खेलने के लिए किंतु क्या किसी की हानि करेगा ?उसने कितनी मेहनत से बर्तन बनाए होंगे ? कभी सोचा है।
सतीश आया था, कुछ देर के लिए ,उसके साथ चला गया। हम पेड़ पर चढ़ गए थे, तभी न जाने उसने क्या सोचा, कहने लगा -कि देख , टीकाराम के बर्तन सूख रहे हैं। देखते हैं ,कौन कितना ,बढ़िया और ज्यादा निशाना लगाता है ? अब मां तुम तो जानती ही हो। मुझे कोई चुनौती दे दे, और मैं वह काम ना करूं ऐसा हो ही नहीं सकता।
अच्छा ! रामप्यारी दिलचस्पी दिखाते हुए बोली-फिर तूने कितने बर्तन तोड़े ? तू उससे जीता या नहीं।
अरे जीतता कैसे नहीं ? मैंने उसके दस बर्तन फोड़े , उत्साह में दोनों हाथों की अंगुलियां दिखाते हुए बोला -मेरा निशाना बहुत तेज था ,सीधा टक से जाकर लगता था।
वह कितने बर्तन फोड़ पाया।
वह क्या फोड़ता ? हंसते हुए बोला सिर्फ छह ! तब तक रामप्यारी कमरे के अंदर से एक छड़ी उठा लाई थी। और चतुर को घूरते हुए बोली -मैं सोच रही थी ,यहां बैठकर मेरा बेटा पढ़ रहा है, और यह ,वहां बर्तन फोड़कर आ रहा था। कहते हुए ,उसे मारने दौड़ी। छड़ी बड़ी थी, इससे पहले कि वह भाग पाता दो छड़ी उसे लग चुकी थी ,वह भागते हुए वह सीढ़ियों [जीने ]से नीचे उतरने लगा। और कह रहा था -जब तो कह रही थी ,-सच -सच बताएगा ,तो मारूंगी नहीं ,और अब मार रही है।
तुझे पता है ,कितने परिश्रम से ,वो बर्तन बनाता है। वो तो मैंने उसकी भरपाई कर दी किन्तु उसके परिश्रम का क्या ??
गलती हो गयी माँ !क्षमा करो !कहते हुए दादी के पीछे छिपने का प्रयास करने लगा।
तब उसकी दादी ने रामप्यारी को डांटा -अब इसे क्यों मार रही है ? उसके बदले में तूने उसे गेहूं दे तो दिया।
उसकी भरपाई तो हो गयी किन्तु इसने जो हमसे झूठ बोला -उसका क्या ?? गांव के लोगों के सामने हमारी बेइज्जती करवाता रहता है।
मैंने कौन सा झूठ बोला ?सब बता तो दिया ,दूर से ही गिड़गिड़ाते हुए चतुर बोला।
जब वो रामप्यारी के हाथ नहीं आया ,घर भी तो इतना बड़ा है , कहीं न कहीं छुप जाता है।रामप्यारी उसके पीछे दौड़ते -दौड़ते थक गयी। तब रामप्यारी को चिमटा दिखलाई दिया और उसने दूर से ही ,चिमटा फेंककर मारा किन्तु चतुर भी इन चीजों का पुराना खिलाडी है। कूदकर अपने को बचा लिया और बाहर भाग गया ,पीछे से माँ चिल्लाती रही -आने दे तेरे बाप को ,आज तुझे न पिटवाया तो मेरा नाम ''रामप्यारी'' नहीं। देखा ,माताजी !हमारी बेइज्जती में कौन सी कसर रह गयी है ? अब टीकाराम जैसे लोग भी ,घर पर लड़ने पहुंच जाते हैं। जो इसके दादा का कितना सम्मान करता था ?
अब गलती तो अपने बालक से हुई है ,इसमें बुरा क्या मानना ?जितने के वो बर्तन बेचता ,उससे ज्यादा का अन्न तो हमने उसे दे दिया। क्यों ,बालक के पीछे पड़ी है ?कुछ भी फेंककर मार देती है ,किसी दिन उल्टी -सीधी जगह लग गया तो ,तू ही रोती फिरेगी ,उसकी सास समझाते हुए बोली।
