चंपक ऐसे ही एकांत में बैठा हुआ था और कुछ सोच रहा था तभी उसकी मम्मी उसके करीब आईं , और उन्होंने उससे पूजा के विषय में पूछा। पहले तो वह उनकी बात सुनकर चौंक गया कि ये पूजा को कैसे जानती हैं ? किंतु जब उन्होंने बताया कि उन्होंने उसे उसके साथ मंदिर में देखा था , तब बात को छुपाने का कोई अर्थ ही नहीं रह गया था।
वो पूजा थी ,हम दोनों पंचगनी से ही साथ थे ,वो डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही थी।
तू बार -बार थी ,क्यों बोल रहा है ?क्या वो अब नहीं है ? ख़ैर !वो बात छोड़...... तू ये बता तुम दोनों के बीच का रिश्ता केेसा था ?
कैसा क्या ?हम दोस्त थे।
सिर्फ दोस्त ही थे ,अब नहीं हो ,तुमने उसे अपने विवाह में भी नहीं बुलाया।
क्या करता ?उसे मैंने ही अपनी ज़िंदगी से बाहर कर दिया ,कहते हुए ,उसने सम्पूर्ण बातें अपनी माँ को बतला दी।
अपने बेटे की कहानी सुनकर ,उन्हें बहुत दुःख हुआ ,और बोलीं -क्या तुममें इतनी भी हिम्मत नहीं थी ?कि अपने प्यार को स्वीकार करते ,एक बार मुझसे कहकर तो देखते -'कि मम्मी मुझे इस लड़की से प्यार है।'ठीक ही हुआ ,तुम उस लड़की के प्यार के क़ाबिल ही नहीं थे। जिस लड़के में अपने प्यार को स्वीकारने का साहस ही नहीं है ,आज मुझे दुःख हुआ ,मेरा बेटा कायर निकला।
माँ के ये शब्द सुनकर ,चंपक को आश्चर्य हुआ कि उसकी माँ ऐसी सोच रखती है। अभी तो उसने पूजा के गर्भवती होने की बात तो उन्हें बताई ही नहीं ,यदि उन्हें ये बात बताता तो ,न जाने क्या सोचतीं ?शायद मैं उनकी ''नजरों से गिर जाता। ''
गलती किसी की भी नहीं है ,मेरी सोच की ही है ,मेरे स्वार्थ की है। छाया की तस्वीर देखते ही ,मैं तो उसे[पूजा ]को भुला बैठा था। अपने अंतर्मन को टटोला ,वहां से आवाज आई -''तू झूठ बोल रहा है ,तूने उससे संबंध बनाया ,उसके प्यार का लाभ उठाया और जब नई लड़की सामने आई ,तो उसे अपनी ज़िंदगी से ''दूध में से मक्खी की तरह ''निकाल फेंका। तुझे छाया से भी प्यार नहीं है ,यदि उससे प्यार होता ,तो वह जैसी भी है ,उसी रूप में स्वीकार लेता।''
छाया उसके क़रीब आती तो उसे डाँटकर भगा देता किन्तु अब वैसा भी नहीं कर सकता ,क्योंकि जैसे ही उसे डांटता, वह बहुत जोरो से रोने लगती और सारा घर सर पर उठा लेती ,तब मां ने समझाया -इस तरह तो यह ठीक नहीं होगी यदि इसको, ठीक करना है। तो इससे प्यार से बातें करना, प्यार से तो जानवर भी अपने हो जाते हैं।
बैठे बिठाये न जाने कौन सी मुसीबत मोल ले ली ? इतना गहरा प्यार जो चंपक को, छाया के प्रति अपने अंदर नजर आ रहा था ,उसका झरोखा न जाने कब सूख गया था ? सोचा -अब जीवन भर इसी से साथ निभाना है, तो क्यों ना प्यार से ही ,इसे ठीक कर लिया जाए ? यह सोचकर, वह उसके साथ धीरे-धीरे साथ निभाने का प्रयास करने लगा। चंपक के प्यार अपनेपन से वह भी ठीक हो रही थी। वह उसे प्यार से समझाता , उसे उठना -बैठना सब सीखाता। एक बार को तो चंपक को लगा जिंदगी इतनी मुश्किल भी नहीं है, जितना मैं समझ रहा था। उसे खुशी थी कि धीरे-धीरे छाया के व्यवहार में स्वभाव में बदलाव आ रहा है। विवाह को 2 वर्ष बीत गए। अब तो दादी ने भी कहना आरंभ कर दिया था, इसे ही बच्चों की तरह पालता रहेगा। या कभी बच्चे का भी मुंह मुझे देखना पड़ेगा।
डॉक्टर ने बताया ,वह अब ठीक है ,छाया भी इस चीज के लिए तैयार हो गई थी 4 वर्ष बीते 5 वर्ष बीते किंतु औलाद का सुख ,व खुशी न मिल सकी । तभी उसे एक दिन पूजा का पत्र वही दराज में रखा दिख गया। न जाने क्या इच्छा हुई ?दोबारा उस पत्र को पढ़ने लगा और उसका वह श्राप उसे स्मरण हो आया। उस समय उस श्राप की उसने कोई अहमियत नहीं समझी थी किंतु आज उसे एहसास हो रहा था कि उसने बहुत बड़ी गलती कर दी। डॉक्टर ने तो बताया था ,छाया अब ठीक है ,शायद इसने जो भी दवाइयां खाई हैं ,उनके कारण बच्चा होने में देरी हो रही है ,हो सकता है ,न भी हो !आज उसे लग रहा था ,ये पूजा के 'श्राप 'का ही असर है।मन ही मन सोच रहा था ,क्या पूजा ने मेरे बच्चे को पैदा किया होगा ?यदि मेरा बच्चा है ,तो मुझे उससे मिलना होगा। एक उम्मीद की किरण चंपक को नजर आई।
आज चंपक एक नहीं, कई बड़ी कंपनियों का मालिक है किन्तु बेऔलाद ! दादी तो इसी इंतजार में चली गयी। एक दिन ऐसे ही बैठे -बैठे सोच रहा था ,आज यदि पूजा का बच्चा होता तो छह -सात वर्ष का हो गया होता। वो भी तो मेरा अपना खून है ,यही सोचकर उसके मन में जोश आया और वह मेड़िकल कॉलिज जा पहुंचा और पूजा का पता पूछा किन्तु किसी को कोई जानकारी नहीं थी, जबकि पूजा वहीं काम कर रही थी ,किन्तु उसने किसी को भी ,उसकी बिना इजाजत के अपनी कोई भी जानकारी देने से इंकार कर दिया था। निराश ,हताश चंपक वापस घर आ गया । आज उसे पूजा की याद बहुत सता रही थी।
