Sazishen [part 56]

चंपक ने पूजा की मकान मालकिन को, तब अपना परिचय दिया , जब वह पूरी तरह आश्वस्त हो गया कि उसके लिए कोई खतरा नहीं है। तब वह बोला -हां ,मैं ही 'चंपक' हूं। जब वह उसकी मकान मालिक को अपना परिचय दे देता है। तब वह अपने घर वापस जाती है, और कुछ देर पश्चात एक सफेद रंग का लिफाफा लेकर ''चंपक'' के पास आती है और उसके हाथ में वह लिफाफा देते हुए कहती है -जब वह जा रही थी ,तब उसने यह लिफाफा मुझे चंपक को देने के लिए कहा था। 

क्या उसने कुछ और भी कहा था ? चंपक को जिज्ञासा हुई। 

नहीं, उसने कुछ नहीं कहा, बस यह लिफाफा थमा कर चली गई। 


क्या उसने , इस घर को छोड़ने का कारण भी नहीं बताया और यह भी नहीं बताया -कि वह कहां जा रही है ?

नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है जितना वार्तालाप हम दोनों के बीच हुआ था, वह मैं आपको बता चुकी हूं यह तुम्हारी धरोहर थी जो मेरे पास थी। अब मैं यह तुम्हें सौंपकर निश्चित हो गई हूं। 

चंपक, पूजा की मकान मालकिन से वह लिफाफा ले लेता है ,लेकिन उसके मन में बहुत उलझन हो रही थी ,न जाने इस लिफाफे में ऐसा क्या है ? रास्ते में खोलकर पढ़ना भी नहीं चाहता था, इसलिए वह तीव्रगति से अपने घर की तरफ  प्रस्थान कर गया। उसने थोड़ा लिफाफे को दबाकर देखा, कि कोई ऐसी चीज तो नहीं है , किंतु उसमें कुछ कागज ही उसे महसूस हुआ। शीघ्र अति शीघ्र घर पहुंच जाना चाहता था, उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके पैर में पहिए लग गए हों।मन तो चाह रहा था कि काश !पंख होते तो उड़कर पहुंच जाता ,न जाने क्या संदेश होगा ?

 घर पर  पहुंचकर ,सबसे पहले उसका सामना उसकी मां से हुआ ,माँ ने प्रश्न किया, कहां चला गया था ?

यहीं , अपने दोस्त के घर मिलने गया था। 

 आ गया है तो , भोजन भी तैयार है ,चलकर भोजन कर ले।

 नहीं ,अभी भूख नहीं है, वह शीघ्र अति शीघ्र अपने कमरे में पहुंचकर, उस लिफाफे को खोलकर देखना चाहता था। अपने कमरे में पहुंचकर उसने दरवाजे की कुंडी लगाई , और कुर्सी पर बैठकर , मेज पर लिफाफा रखा और उसे आराम से खोलने लगा। उस लिफाफे में से एक पतली सी अंगूठी गिरी, उस अंगूठी को देखकर, चंपक को स्मरण हुआ ,जब वे दोनों बाहरवीं कक्षा में थे, तब एक बार चंपक अपने घर आया था और कहीं मेला देखने गया था। वहां उसने इस अंगूठी को देखा था।  उस अंगूठी को  देखते ही, उसे पूजा की याद हो आई , और उसने वह अंगूठी पूजा के लिए ले ली थी। हालांकि वह अंगूठी कीमती नहीं थी, चंपक के पास इतना पैसा भी नहीं था कि वह उसके लिए सोने की या हीरे की अंगूठी लेता। किंतु जब उसने वह अंगूठी पूजा के हाथों में सौंपी थी, तब उस अंगूठी को देखकर पूजा कितनी प्रसन्न हुई थी ? उसने एक बार भी नहीं कहा -''तुम मेरे लिए नकली अंगूठी लाये हो। ''वह तो इसी बात से प्रसन्न थी ,कि उस मेले में भी इसे मेरा स्मरण रहा। वह खुशी उसके सामने छलककर आ गई, स्वयं भी ,उस अंगूठी को देखकर ,मुस्करा उठा। तब उसने वह लिफाफा दोबारा खोला, शायद इसमें कुछ और भी है ,उसमें एक कागज था -उत्सुकता वश उसने वह कागज खोल कर देखा, तो पूजा का पत्र ,उसके नाम था -शायद वह पत्र उसने रोते  हुए लिखा था ,उस कागज़ पर जगह -जगह , बूंदों के निशान थे।


 

तुम्हें प्रिय दोस्त !भी नहीं कह सकती क्योंकि तुमने दोस्ती भी ठीक से नहीं निभाई ,तुम्हें प्यारे या कुछ भी कहने का अधिकार, अब मैं नहीं समझती,तुमने मुझे एक उपहार न जाने उस समय क्या सोचकर दिया ,और उसे मैंने अब तक अपने दिल से लगाकर रखा। तुम्हारी अमानत तुम्हें वापस कर रही हूँ। किन्तु कुछ बातें भी हैं ,जो तुमसे कहना चाहती हूँ ,जब से मेरे मन में चाहत ने जन्म लिया ,तुम्हारे लिए ही ,उस चाहत को मैंने महसूस किया। तुम्हें ही अपना सबकुछ मान लिया ,तुम्हारे संग ही जीवन के स्वप्न सजाने लगी। तुम ये नहीं कह सकते -कि मैंने अकेले ही वो स्वप्न देखे ,मेरे हर स्वप्न में तुम मेरे साथ थे।'' हालाँकि मैं डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही हूँ। इस तन की वास्तविकता मुझे मालूम है  किन्तु मैं अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं कर सकी। मेरा अच्छा -बुरा जो भी था, तुम्हारे लिए था। ज़िंदगी इतनी बुरी भी नहीं थी। तुमने भी मेरा साथ दिया था वरना अकेले मैं कैसे माँ बन जाती ? ज़िंदगी जब तुम्हारे साथ ही जीनी है ,तब अविश्वास का तो प्रश्न ही नहीं उठता। जब तुम्हें ही अपना सर्वस्व मान लिया , ये ज़िंदगी तो तुम्हारे ही नाम की थी। तब वो सब जो हमारे बीच हुआ ,वो गलत नियत ,या गलत विचारों के तहत नहीं हुआ था। मैंने तुमसे कोई जबरदस्ती नहीं की थी ,तुम पीछे हट सकते थे किन्तु तुम भी तो......  मेरी परवाह करने लगे थे। क्या मुँह से कह देने से ही प्यार की पुष्टि हो जाती है ?तुम्हारा व्यवहार तो चीख -चीखकर कह रहा था ,कि तुम्हें भी मुझसे प्यार था। तब अचानक ये दूरी कैसी ?मेरी ज़िंदगी में अचानक ही इतना सबकुछ हो गया। मैं कुछ समझ ही न सकी। तुम्हारे धोखे को भी ,बर्दाश्त न कर सकी। तुम मुझसे पीछा छुड़ाना चाहते थे ,जो हाथ ,मेरे तन पर प्यार से तुमने फिराए ,मेरे हाथों को चूमा। तुम्हारा वो स्पर्श ! मैं ,अब भी महसूस करती हूँ।  आज उन्हीं हाथों ने मुझे दूर धकेल दिया। एक बार भी ,यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि मैं जिन्दा हूँ या मर गयी। 

मेरे पेट में ,तुम्हारे प्यार की निशानी है ,जिसे तुमने स्वीकार नहीं किया। मेरे लिए तो प्यार की निशानी ही है किन्तु तुम्हारे व्यवहार के कारण इसका भी भविष्य तय हो गया ,अब उस पत्र को पढ़ते हुए चंपक को लग रहा था ,जैसे -ये शब्द लिखते हुए उसे क्रोध आ गया था ,उसने आगे लिखा -तुम ये मत समझना ,तुम्हारे इस व्यवहार के कारण ,मैं अपना ''गर्भपात ''करवा लूंगी ,इसे मैं पैदा तो अवश्य करूंगी किन्तु तुम्हारे कारण ये अनाथों की ज़िंदगी जियेगा। तुम कभी भी ,इसका चेहरा नहीं देख सकोगे। पिता बन जाओगे ,किन्तु बेऔलाद रहोगे ,ये मेरा श्राप है ,अब तुम कभी भी पिता नहीं बन पाओगे। तुम अपनी औलाद के लिए तरसोगे। न ही ,अब तुम्हें मैं कभी मिलूंगी ,ढूंढोगे तो भी नहीं मिलूंगी। मैं इतना तो जान ही  गयी हूँ ,किसी के लिए तुमने मुझे इस हालत में छोड़ा है ,जाओ ! तुम्हें मैं उसके लिए छोड़ती हूँ। भूल से भी कभी ,मेरी याद आये तो मिलने का प्रयास भी मत करना ,तुम्हारी ज़िंदगी से मैं इतनी दूर जा चुकी हूँ ,पलटकर भी न देख सकूंगी। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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