Heeron ka haar

आज' फेसबुक' पर, 'अनामिका' ने अपनी सहेली रोहिणी की तस्वीर देखी, उसे देखकर प्रसन्न तो हुई किंतु मन ही मन जल -भुन भी गई। उसके जलने का कारण उसकी सहेली रोहिणी नहीं थी ,वरन  उसके गले में पड़ा हुआ, वह 'हीरे का हार' था। वह सोच रही थी-' इसके पास यह इतना कीमती' हीरों  का हार' कहां से आया ? अब सहेली की तस्वीर है ,तो लाइक करना तो बनता है और टिप्पणी देना भी बनता है। तब उसने उसकी तस्वीर के नीचे कमेंट में 'वेरी ब्यूटीफुल' लिख दिया। सहेली के लिए नहीं ,उस हार के लिए। 

 मन ही मन सोच रही थी -इसका पति तो,ज्यादा  कुछ करता भी नहीं , मेरे पति से आमदनी भी कम है तब भी देखो !कैसे' हीरों  का हार' पहनकर इठला रही है और एक मैं हूं ,सारा दिन इस गृहस्थी में खटती  रहती हूं। मेरी तो जैसे कोई कीमत ही नहीं रह गई है। इस घर की नौकरानी बनकर रह गई हूं ,अनेक विचार अनामिका के मन में आ जा रहे थे। करे भी क्या ? सहेली के गले में इतना सुंदर बेहद कीमती हार है तो जलन तो होना स्वाभाविक ही है। वह तो इतनी सुंदर भी नहीं दिखती और तब भी, उसका पति उसे 'पलकों पर बिठाकर रखता  है. और मैं अपने जमाने में कितनी खूबसूरत थी ? हीरोइन सी लगती थी, किंतु आज मैं..... कैसी हो गई हूं ,अपने को आइने में देखते हुए मन ही मन बुदबुदाई।


 बस, संपूर्ण जिंदगी यही करते रहो !दोपहर की रोटी, शाम की रोटी बनाओ और सो जाओ ! मेरे पति को इतनी भी अकल नहीं, कि एक सुंदर सा ''हीरो का हार'' लाकर गले में डाल देता। ''सरप्राइज'' नाम की भी कोई चीज होती है। उसे तो सरप्राइज तक भी देना नहीं आता, बहुत से पति अपनी पत्नी को उपहार में ,कुछ न कुछ देते रहते हैं और एक यह इंसान है ,सारा दिन स्वयं भी लगा रहेगा जैसे सारा कंपनी इसी के कारण चल रही हो और उस कंपनी से इतना भी नही कमा पाता  कि  एक ''हीरे का हार'ही मुझे लाकर दे देता। 

अनामिका, कपड़ों की तह बना रही थी और मन ही मन परेशान भी हो रही थी। जब इतने से भी बात नहीं बनी तो अपनी सहेली को फोन ही कर दिया, हेलो ,रोहिणी ! कैसी है ?

अरे यार मैं तो ठीक हूं ,तू अपनी सुना, अजी हम गरीब क्या अपनी सुनायेंगे ? बात तो तुम लोगों की होती है

क्यों ,ऐसा क्या हो गया ?

अच्छा ,अब मुझसे पूछ रही है, ऐसा क्या हो गया ? यार !तू इतना कीमती' हीरों का हार'' पहनकर फोटो खिंचवा रही है और फेसबुक पर डाल रही है और मुझसे पूछ रही है ,ऐसा क्या हो गया ? 

अच्छा वो..... वह तो ऐसे ही पहन लिया था ,सोचा ,जब पहना है तो क्यों न एक फोटो ही खिंचवा लूँ । रोहिणी की बातों को बढ़ा चढ़ाकर बताने की ,उसकी पहले से ही आदत थी।

अच्छा इतना कीमती हार तूने ऐसे ही पहन लिया, बता जीजू ने तुझे यह हार कब दिलवाया कितने का आ गया ?

रोहिणी को बातें बढा-चढाकर बोलने की आदत तो थी ही , तब अनामिका से बोली -अभी' अक्षय तृतीया' आई थी न......  तब यह कहने लगे -चलो ,तुम्हें एक हार ले देता हूं। तभी उन्होंने लिया था, वैसे तो मेरी ससुराल वाले भी बहुत अमीर है , ऐसे कई हार तो मेरी सास के पास रखे होंगे किंतु कंजूस इतनी है ,मुझे देती नहीं है। 

क्या बात करती है ?

हां हां, ये खानदानी रईस हैं। एक दिन मैं  इनसे यूं ही ,कह रही थी -कि तुम्हारी मम्मी के पास इतने हार हैं एक मुझे ही दिलवा देते , तब ये बोले -मम्मी से मांगने की क्या आवश्यकता है ? हम तुम्हें एक नया  हार दिलवा देते हैं। 

अच्छा, अब फोन रखती हूं ,उनके आने का समय हो गया है, खाना भी तो बनाना है, कुढ़ते हुए अनामिका बोली। 

इधर अनामिका ने फोन रखा, रोहिणी के पास, एक और फोन आ गया , वह रोहिणी की सहेली थी, रोहिणी से बोली -अरे यार मैंने तुझे जो अपना' हीरों का हार ''दिया था , कब वापस कर रही हो ?

तुम कभी भी ले जा सकती हो, मुझे कोई आपत्ति नहीं है,मेरा काम हो गया रोहिणी बोली। 

अगले दिन ,उसकी सहेली रोहिणी से वह हार लेकर चली गई, वह हार उसकी सहेली का भी नहीं था , बल्कि उसकी सहेली के बॉस का था , जिसने अपनी बहन को, उसकी सालगिरह पर तोहफे के रूप में देने के लिए लिया था। रोहिणी की सहेली यानी प्रगति, अपने बॉस की, भी अच्छी सहेली थी इसीलिए एक दिन के लिए उसने भी, उससे वह हार मांग लिया था। उसकी बॉस ने सहेली होने के नाते उसे वह हार दे तो दिया था किंतु बहुत ही एहतियात बरतने के लिए कहा था और समय पर लौटाने के लिए भी कहा था। प्रगति से वह हार, 1 दिन के लिए रोहिणी ने मांग लिया था जिसको पहन कर उसकी तस्वीर फेसबुक पर डाली थी और अनामिका जल भुन  गई थी। 

इस बात को,अभी कुछ दिन ही बीते थे , अनामिका ने अपने पति को भी बहुत भला -बुरा सुनाया , किंतु कुछ लाभ नहीं हुआ। मध्यमवर्गीय परिवार से वह पति बेचारा क्या करता ?हार तो दिलवा नहीं सकता था चुपचाप संपूर्ण बातें सुन ली। 

एक दिन अनामिका ने रोहिणी को फोन किया और बोली -यार ! मुझे एक दिन के लिए अपना वह ''हीरों  का हार'' दे दे !

क्यों ,क्या हुआ ? तू जानती ही है ,वह बहुत कीमती है , कहीं खो गया तो......  तुझे उस हार की क्यों आवश्यकता पड़ गई ?

कहीं नहीं खोयेगा , मेरे पति के बॉस की पत्नी की वर्षगांठ है,उसके यहाँ पहनकर जाऊँगी। 

देख यार !तू बुरा मत मानना ,वैसे तो वो लॉकर में रखा हुआ था किन्तु दो दिन पहले मुझसे मेरी सहेली प्रगति उस हार को मांगकर ले गयी। 

अच्छा उदास मन से अनामिका ने ,अपने पति को दो -तीन बातें और सुनाई ,देखा ,मेरी कैसी हालत हो गयी है ?अब जिन्हे मैं अपने आगे कुछ भी नहीं समझती थी ,उनसे हार मांगना पड़ रहा है। 

तुम्हारे तो अपने पास भी, एक से एक कीमती हार है ,तुम अपना वही सोने का' रानी हार' पहन लो !अपने पास जो भी होता है ,उसी में खुश रहना चाहिए दूसरों से ख़ुशी उधार नहीं मांगी जाती। ख़ुशी अपने अंदर की संतुष्टि से मिलेगी। तुम भी किसी से कम नहीं हो ,यह मानने की बात है। पति की बात सुन ,अनामिका ने ,मन मारकर वही हार पहन लिया। जब वे लोग वहां पहुंचे बॉस ने उनका अच्छे से स्वागत किया किन्तु उनकी पत्नी को देखकर ,अनामिका चौंक गयी। 

अपने पति को एक तरफ लेजाकर बोली -''ऊँची दुकान फीके पकवान। ''

मैं कुछ समझा नहीं, तुम ये सब क्यों कह रही हो ?

इसीलिए क्योंकि तुम्हारे बॉस की पत्नी ने ,वही हार पहना हुआ है ,जो रोहिणी का है। 

ऐसा कैसे हो सकता है ?बॉस की पत्नी भला तुम्हारी सहेली को कैसे जानती होगी ?क्या दुनिया में ऐसा एक ही हार है ?और भी तो हो सकते है। 

हाँ हो सकते हैं ,किन्तु ये वही है ,विश्वास न हो तो, अभी दिखाती हूँ ,कहते हुए ,उसने अनामिका की वो तस्वीर अपने पति को दिखलाई। 

हाँ ,है तो ऐसा ही ,किन्तु ये उसे क्या जानती होंगी ?

ये मेरा कार्य है ,मैं पता लगाकर रहूंगी ,अनामिका दृढ़ निश्चय के साथ बोली। 

मौका देखकर अनामिका ने बॉस की पत्नी से बात की, और बोली - आपका हार बहुत सुंदर है, क्या भाई साहब !ने उपहार में दिया ?

धन्यवाद ! इन्हें इतनी दिलचस्पी कहां ? मुंह बना कर बोली -वैसे यह हार मेरी बहन ने मुझे दिया है , आपकी बहन तो बहुत अमीर है।

 नहीं, ऐसा कुछ नहीं है ,उसकी और मेरी शर्त लगी थी, जब उसकी तरक्की होगी तो मुझे एक' हीरों का हार' देगी। अब वह एक बड़ी कंपनी की डायरेक्टर बन गयी है , शर्त के मुताबिक उसने मुझे मेरे जन्मदिन पर यह उपहार दिया। 

आपकी बहन का क्या नाम है ?

तब तक प्रगति ! और उसकी बॉस भी वहां आ गई थीं , उनकी आपस में बातें होने लगी तब प्रगति ने पूछा -आप इस हार में इतनी दिलचस्पी क्यों दिखा रही हैं ?

वह इसलिए, क्योंकि मेरी सहेली के पास भी, बिल्कुल ऐसा ही हार है, कहते हुए उसने अपनी सहेली की तस्वीर प्रगति को  दिखलाई। अरे यह आपकी सहेली है ,तब प्रगति अनामिका को एक तरफ ले गयी और बोली -मेरी बॉस को यह तस्वीर मत दिखाना ,तब वे पूछेंगी -ये हार इसके पास कैसे ?मैंने तो उसे एक दिन के लिए ही  दिया था। 

क्या बात कर रही हैं ? अनामिका फिर से चौंक गई क्योंकि वह जानती थी ,रोहिणी किसकी सहेली है ?रोहिणी ने ही तो उससे कहा था -कि दो दिन पहले प्रगति ले गयी।  उसे बातों को बढ़ा -चढ़ाकर कहने की और झूठ बोलने की आदत है। यह सब पता लग जाने के पश्चात अनामिका को बहुत हंसी आई और दुःख भी हुआ ,व्यर्थ में ही, उसने अपने पति को बुरा -भला कह दिया। जब दोनों पति -पत्नी घर वापस लौट रहे थे ,तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता स्पष्ट झलक रही थी। 

तब संजय बोला - मैं कहता हूं न...... , जो हमारे पास है, उसी में संतुष्ट रहना चाहिए, बनावटी जिंदगी से कुछ लाभ नहीं है। इस तरह की उधार की, या झूठी  जिंदगी जीने से क्या लाभ ? आज भी हम लोगों में से बहुत से ऐसे हैं , कि जो दिखावे के लिए किस्तों पर  जिंदगी जी रहे हैं। घर का हर सामान किस्तों पर, आता है। ऐसे दिखावे से क्या ?लाभ ! जब सच्चाई सामने आएगी तो 'जग हंसाई ही होनी है।' 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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