हीरों की चमक ,सभी को लुभाती।
नारी को इसकी चमक, दीवाना बनाती।
हीरा तपता है ,कटता है, तब निखरता है।
उसका वही दर्द उसकी कीमत बढ़ाता है।
हीरा मिलता ,कोयले की खान में,
खिलता है, कमल भी , कीचड़ में,
दोनों की पैदाइश , निम्न स्तर में ,
निखरकर आते ,अपने स्वरूप में।
रास आती नहीं ,सभी को उसकी संगत।
मूल्य, उड़ा देगी, तुम्हारे चेहरे की रंगत।
उसकी चमक में न खो जाना ,इस कदर,
किसी की राशि के लिए नहीं, ये तर्कसंगत।
निखरो !तुम भी तपो ! इस जीवन में,
हीरे से तुम भी कम नहीं, चमको !इस जहां में,
भूलो ! न कभी यह बात ,तुममें भी है ,हीरे सी बात।
जोेहरी तुम्हें पहचान ही लेगा, रहो !चाहे किसी खान में।
कभी चाहत न रही, हीरों के हार की,
जरूरत क्या हीरे को, हीरों के हार की।
लुभाती बहुत बातें ,लोगों को संसार की।
तमन्ना नहीं कोई, जब कीमत ही नहीं जानी यार ने अपने यार की।
