चंपक, पूजा के साथ जो भी, व्यवहार करता है ,उससे ,उसे इस बात का दुख तो अवश्य होता है। उसका उद्देश्य पूजा को दुख पहुंचाना नहीं था ,किंतु जब वह जबरदस्ती का रिश्ता बना रही थी इसीलिए उसे ऐसा कदम उठाना पड़ा। वह छाया के कारण भी थोड़ा स्वार्थी हो गया था। वह छाया को अपनी जिंदगी में लाना चाहता था इसीलिए वह, पूजा से रिश्ता तोड़ना चाहता था किंतु पूजा अपने आपस के रिश्ते को नाम देना चाहती थी। जो कि चंपक के लिए संभव नहीं लग रहा था। जब पूजा ने ही उसे धमकी देनी आरंभ की तब उसे क्रोध आ गया और उसने पूजा के साथ ऐसा व्यवहार कर दिया। पहले तो वह घबरा गया कि कहीं चोट अधिक गंभीर तो नहीं या वह मर तो नहीं गई। फिर उसे उसके हाल पर छोड़कर चुपचाप उस घर से बाहर आ गया किंतु बाद में उसे अपने व्यवहार पर पश्चाताप हुआ और सोचने लगा- एक बार तो मुझे ऐसी हालत में उससे मिलने जाना चाहिए। प्रेमी न सही , बल्कि इंसानियत के नाते तो जाना ही चाहिए वह यही सब सोच रहा था। किंतु डर रहा था, यदि वह दोबारा जाता है और कुछ हादसा हो गया होगा , तो पुलिस का उस पर भी ध्यान जाएगा। नहीं, मुझे नहीं जाना है उसने निर्णय किया और अपने घर जाकर सो गया। रात भर वह करवटें बदलता रहा और अगले दिन ,उसने निर्णय ले लिया कि वह एक बार तो अवश्य जाकर उससे बात करेगा और उसे समझाएगा।
यही सब सोचते हुए ,वह उसके घर के करीब गया। आसपास नजर दौड़ाई कोई देख तो नहीं रहा है।उस जगह काफी शांति थी। मन ही मन अंदाजा लगाया- इसका अर्थ है ,पूजा ठीक है और सही -सलामत है। तब वह उस घर के करीब गया तो देखा, वहां तो ताला लटका हुआ था। यह देखकर उसे आश्चर्य हुआ आखिर वह कहाँ चली गयी ?
अभी वो यह सब सोच ही रहा था ,तभी एक महिला उसके पास आई और आते ही बोली -क्या तुम चंपक हो ?
चंपक ने घूमकर देखा ,और सोचा ,आखिर यह मेरा नाम क्यों पूछ रही है ? शायद ,कहीं मैं फंस न जाऊँ ?क्या मालूम उसने मेरा नाम पुलिस के सामने ले दिया हो और यह महिला कौन है ?उसकी तरफ देखा , गले में' मंगलसूत्र 'सफेद रंग की ,आसमानी बॉर्डर वाली साड़ी पहने थी। देखने से सभ्य परिवार की ,पढ़ी -लिखी महिला लग रही थी। तब चंपक ने अपना नाम तो नहीं बताया ,उससे ही पलटकर प्रश्न किया। आप कौन ?
मैं इस घर की मकान मालकिन !मुस्कुराते हुए बोली।
इस घर पर तो ताला लगा है ,इस घर......
इसीलिए तो आपका नाम पूछ रही थी ,इस घर में जो लड़की रहती थी ,वो कल ही घर छोड़कर चली गयी। शायद ,उसके सिर में चोट भी आई थी। बेचारी ! बड़ी ही दुखी लग रही थी ,मैंने उससे पूछा भी ,उसकी चोट के विषय में ,क्या हुआ ?
तब उसने क्या कहा ? घबराते हुए चंपक ने पूछा।
कह रही थी ,फ़िसलकर गिर गयी ,जिसके कारण उसे चोट आई।
ओह !चंपक ने गहरी स्वांस ली और बोला -अब वह कहाँ गयी ?
ये तो उसने कुछ नहीं बताया ,न ही मैंने पूछा।
तब आप मेरा नाम क्यों जानना चाहती थीं ?
वो इसीलिए ,क्योंकि उसने कोई चंपक नाम के लड़के के लिए एक लिफाफा, मुझे देने के लिए कहा था। तुम्हें इस घर के आसपास मंडराते हुए देखा तो पूछ लिया। कहीं तुम ही तो चंपक नहीं।
चंपक सोच रहा था ,इन्हें कुछ बताऊं या नहीं ,
क्या सोच रहे हो ?तुम्हें अपना नाम मालूम है या नहीं ,उस लड़की को ,चंपक के आने की उम्मीद होगी ,तभी तो उसे संदेश देने के लिए कहा। यहाँ इससे पहले तो कोई आया नहीं ,शायद तुम ही चंपक हो ,तभी यहाँ हो चंपक के चेहरे पर दृष्टि गड़ाते हुए ,उसने पूछा। जैसे उसे विश्वास हो ,यही चंपक है किन्तु उसी के मुँह से एक बार उसका नाम जानना चाहती थी।
जी.....जी ,मैं कुछ और सोच रहा था ,वैसे मेरा नाम ही'' चंपक'' है। लाइए ,दीजिये केेसा लिफाफा है ?
