'' रसिया''अपनी पुस्तक में ,सिर झुकाए पढ़ रहा था, नहीं हमारे'' चतुर भार्गव'' वह पुस्तक में इतना लीन हो गया था, उसे पता ही नहीं चला कि कब मास्स साहब ! उसके पीछे आकर खड़े हो गए ? पता उसे सब था, किंतु उस पुस्तक में लीन होने का अभिनय अच्छा कर रहा था।
मास्स साहब ,ने देखा ,गणित का घंटा चल रहा है और वो कोई दूसरी ही पुस्तक खोले बैठा है। तभी मास्टर साहब ने पूछा -चतुर ! तुम कब आए ?अभी कुछ देर पहले तो तुम मुझे दिखलाई नहीं दिए।
गुरु जी ! मैं तो बहुत देर से आया हुआ हूं ,किंतु आपका ध्यान ही अब गया।
अच्छा, जब मैं हाजिरी ले रहा था, तब तुम कहां थे ?उस समय तो तुम्हारी आवाज मुझे नहीं आई।
अच्छा तब!!!!!! सोचने का अभिनय करते हुए बोला -शायद नंबर दो [पेशाब ]के लिए गया था।
तुम मुझसे बिना पूछे ही ,कक्षा से बाहर चले गए , मास्टर साहब ने फिर से प्रश्न किया।
नहीं गुरुजी! ऐसा कैसे हो सकता है ? आपसे पूछा था, शायद आप हाजिरी लेने में व्यस्त थे।
तुम्हें आने में देर क्यों हो गई ? मास्स साहब , जानते थे कि यह झूठ बोल रहा है, इसके प्रतिदिन के यही बहाने हैं, उन्होंने सोचा, क्यों न इसका कोई नया बहाना सुन लूं।
गुरुजी ! आज मेरी मां की तबीयत बहुत खराब थी, मैं उनकी सेवा में व्यस्त था, किंतु ज्यादा देरी नहीं हुई।
किन्तु तुम्हें लिवाने के लिए ,तो मैंने दो लड़कों को भेजा था, वह तो अभी तक नहीं आए।
वहीं कहीं खेलने में व्यस्त ! हो गए होंगे, आजकल के बच्चों का पढ़ाई में ध्यान ही कहां रहता है ? अगर वह मेरे घर मुझे लिवाने गए होते, तो मुझे मिले होते किन्तु मिलते तो तभी ,जब मैं अपने घर होता। घर होता ,तो क्या मैं यहां होता ? अब आकर कोई बहाना कर देंगे, कि गुरुजी हम तो उसे ढूंढ रहे थे और मैं यहां बैठा हूं पूरे आत्मविश्वास के साथ चतुर बोला।
गुरुजी !अभी उसको कुछ भी नहीं कहना चाह रहे थे, जब तक वे बच्चे वापस न आ जाए। कुछ ही देर पश्चात हाँफते हुए ,दौड़ते हुए वे लड़के वापस आए , और बोले - गुरुजी ! चतुर तो बहुत चालाक निकला। गांव के मैदान में' गुल्ली -डंडा 'खेल रहा था और हमें देखते ही भाग खड़ा हुआ ।
तुम लोग यह क्या कह रहे हो ? तुम उसके घर नहीं गए , वह तो अपनी मां की सेवा में व्यस्त था क्योंकि उसकी मां बीमार है।
हैं ...... गुरूजी ये आपसे किसने कहा ?आश्चर्य से उनमें से एक लड़का बोला। उसकी मां भी तो हमारे साथ, उसको ढूंढ़वाने के लिए गई थीं , और हम सबको अपनी तरफ आते देखकर ही वह भाग खड़ा हुआ। गुरु जी ने, अपनी कमची यानी कि नीम की पतली छड़ी , अपने हाथों में मजबूती से पकड़ ली थी। वह जान गए थे ,कि चतुर झूठ बोल रहा है। मास्स साहब ! के हाथ में उस कमची को देखकर , चतुर की हालत खराब होने लगी ,वह जानता था यह जहां भी, शरीर के जिस भी अंग पर पड़ जाएगी, वहीं अपने निशानी छोड़कर जाएगी।
मास्स साब जानबूझकर बोले -चतुर उठो और इन्हें बताओ कि तुम तो बहुत देर से यहां थे , पढ़ रहे थे।
हां हां मैं यहीं था, घबराते हुए ,वह बोला।
जब तुम यही थे, तब तुम बताओ ! कि मैंने आज गणित का कौन सा सवाल समझाया था क्योंकि गुरु जी ने पहले ही देख लिया था , कि घबराहट में चतुर साइंस की किताब खोले बैठा था।
किंतु अभी भी चतुर ने हिम्मत नहीं हारी, वह गणित की किताब लेने के लिए ,अपने बस्ते की तरफ गया , तभी एक दोस्त को, आंखों से इशारा किया। वह भी मुस्कुराते हुए, उसे देख रहा था, वह समझ गया था आज चतुर की ''बैंड बजने वाली है।'' तब चतुर ने, कक्षा में गिरने का अभिनय किया। जैसे किसी चीज में उलझकर गिर जाते हैं। और जिसके करीब वह गिरा उससे बोला - यार !आज मार पड़ जाएगी , तू बता दे ! कौन सा सवाल हल करा रहे थे ? तभी मास्टर साहब भी वहीं आकर खड़े हो गए। वह चतुर से कुछ भी ना कह सका।
उन्होंने चतुर को उससे पूछते सुन लिया था ,तभी मास्स साहब ! एक दम से गरजे -बताओ !कौन सा सवाल था जो मैंने, करवाया था। चतुर को उस समय मास्स साहब नहीं ,उनके कई भूत कक्षा में घूमते नजर आ रहे थे। तभी चतुर ने, घूमकर'' श्याम पट्टी'' की तरफ देखा। उसे संख्या तो दिख गई, किंतु यह नहीं समझ आया यह कौन से अध्याय का है। गणित की किताब निकालकर अंदाजे से ही, सामने की प्रश्न संख्या को देखते हुए कोशिश कर रहा था कि वह सवाल दिखा सके , शायद इसका अंदाजा सही हो ,अब उसके हाथ भी कांप रहे थे क्योंकि सभी बच्चों की दृष्टि ,अब उस पर ही थी। तभी जोरों से एक छड़ी उसकी पीठ पर पड़ी , वह बिलबिला उठा -उसके हाथों से पुस्तक छूट गयी और बोला -गुरुजी गलती हो गई ,गलती हो गई।माफ कर दीजिये।
क्या गलती हो गई ? इतनी देर से देख रहा हूं ,झूठ पर झूठ बोले जा रहा है , अपनी मां को भी बीमार कर दिया। सारा दिन खेलता रहता है। परीक्षा नजदीक आने वाली हैं , पढ़ाई में कतई भी ध्यान नहीं है ,कल को तुम्हारे माता-पिता आकर हम ही को दोष देंगे। मास्टर में अच्छा नहीं पढ़ाया।
इससे पहले कि वह दूसरी छड़ी का पात्र बनता। चतुर कक्षा के आगे की तरफ भाग गया। गुरुजी अब करुंगा अब करुंगा। गिड़गिड़ाते हुए रोने लगा।
तभी एक चपरासी रजिस्टर लेकर कक्षा में आ गया। उसे देखकर मास्टरजी ने, चतुर से कहा- जा ,कक्षा में सबसे पीछे जाकर ,मुर्गा बन जा !
तब चतुर की आंखों में आंसू आ गए थे, मन ही मन सोच रहा था -खेलना कोई बुरी बात है , कभी तो कहते हैं -''खेलोगे, कूदोगे, बनोगे नवाब !''जब खेलते हैं,तो कहते हैं -पढ़ाई करो ! यहां मेरी पिटाई हो रही है। किसी को भी मेरे हुनर का ज्ञान नहीं है। सब मेरे पीछे पड़े रहते हैं। अभी भी चतुर की सकारात्मक सोच नहीं थी। उल्टा ही सोच रहा था, उसने यह नहीं सोचा -कि मेरी गलती है और मुझे उसे सुधारना है।या कुछ समय पढ़ाई पर भी ध्यान दूंगा।
कुछ देर बाद, स्कूल का घंटा बज गया और सभी ने अपने-अपने बस्ते उठाकर, बाहर की तरफ दौड़ लगा दी। अब न ही किसी को पढ़ाई की फिक्र थी, न ही समय पर घर जाने की चिंता थी । एक दूसरे से लड़ते हुए कुश्ती करते हुए, आगे बढ़ रहे थे। किंतु आज चतुर को मार पड़ी थी। कुछ देर तक तो उसका दर्द रहा, किंतु जैसे-जैसे दर्द समाप्त होता गया ,चतुर भी ठीक होता गया।
अब वह उन लड़कों को ढूंढ़ रहा था जिन्होंने आकर गुरूजी !से उसकी शिकायत लगाई थी। कुछ छात्रों ने उसके साथ हमदर्दी भी दिखलाई और गृहकार्य के लिए कॉपी भी दी। किंतु अभी उसे घर भी जाना है, घर का सोचते ही, वह फिर से हिल उठा। आज माँ नहीं छोड़ेगी। मास्स साहब ! की पिटाई भूलकर, अब वह मां से बचने के उपाय सोचने लगा।
