Sazishen [part 54]

इंस्पेक्टर विकास खन्ना,' नीलिमा सक्सेना' के घर जाता है और उसे बताता है- कि किस प्रकार उसने नैनीताल में, चंपा को देखा वह भी कुंवारी नहीं बल्कि विवाहिता के रूप में देखा।

' नीलिमा सक्सेना' आश्चर्य से पूछती है-इंस्पेक्टर साहब क्या बात कर रहे हैं ? ऐसा कैसे हो सकता है ? हां यह तो मैं मानती हूं कि उसे यहां से गायब हुए ,अब लगभग पंद्रह दिन हो गए होंगे किंतु इतनी शीघ्र उसे कौन ऐसा व्यक्ति मिलेगा ? जो उससे विवाह कर लेगा। 

यह तो मैं भी नहीं जानता, बल्कि मैंने उसे एक व्यक्ति के साथ नहीं बल्कि दो लोगों के साथ देखा है, अलग-अलग स्थान पर और अलग-अलग लोगों के साथ। 


मतलब ! मैं आपका कुछ समझी नहीं, इसमें समझना क्या है ? नाव पर वह, किसी लड़के के साथ थी और थिएटर में वह किसी अधेड़ उम्र व्यक्ति के साथ थी ,अब यह नहीं पता कि उसने किससे  विवाह किया है। 

न जाने ,इस लड़की को क्या हो गया है ? रहस्यमई होती जा रही है। क्या आपने उसके परिवार से बात की ?

हां, उसके परिवार से ही बात की, किंतु उन लोगों को उसके विषय में कोई भी जानकारी नहीं है। 

तब क्या आप मेरे पास उसकी कोई जानकारी लेने आए हैं, तो मैं पहले ही बताए देती हूं ,मुझे उसके विषय में कुछ भी मालूम नहीं है। यह तो मैं समझ रही थी, कि उसे लड़की का व्यवहार ठीक नहीं था किंतु मैंने तब भी उसको अपने पास रखे हुए था। यह तो अच्छा हुआ, कि उसने मुझे या मेरे बच्चों को किसी भी तरह की हानि पहुंचाने का प्रयास नहीं किया। तब मन ही मन बुदबुदाई - यदि हानि पहुंचाने का प्रयास करती भी....... तो मैं उसकी औकात उसे नहीं दिखा देती। 

क्या आप कुछ कह रही हैं ? इंस्पेक्टर विकास में महसूस किया कि नीलिमा सक्सेना कुछ कह रही थी। 

नहीं, मैं क्या कहूँगी ? आप अपनी छानबीन जारी रखिए, मेरे घर की वह नौकरानी थी, इसीलिए मेरा उत्तरदायित्व बनता था, कि मुझे पता हो, कि वह कहां है ? बाकी मुझे उससे  कोई लेना-देना नहीं है जब उसके परिवार वालों को ही, उसके न रहने पर  कोई परेशानी नहीं है तो मैं क्यों परेशान होगी ? इंस्पेक्टर को  लस्सी का गिलास पकड़ाते  हुई नीलिमा सक्सेना बोली। 

आप मुझे गलत समझ रही हैं इस वक्त मैं अपनी ड्यूटी कर रहा हूं, आपकी लस्सी पीने नहीं आया हूं। 

अब बन ही गई है ,तो पी लीजिए , मन  को राहत मिलेगी, मुस्कुराते हुए नीलिमा सक्सेना बोली -और कहिए इंस्पेक्टर साहब ! प्रभा जी का क्या हाल है? कोई उपन्यास लिखा या नहीं , अप्रत्यक्ष रूप से वह अपने उपन्यास के विषय में ही उससे जानना चाहती थी। 

अभी लेखन में ,उनका कहां ध्यान रहा है ?आजकल तो घर -गृहस्थी को संभाल रही हैं ,स्कूल जाती हैं और अपने घर परिवार को देखती  हैं।

अभी परिवार में हैं ,ही  कितने सदस्य ?आप और प्रभा !

अभी -अभी नई -नई शादी हुई है ,अब तक तो उनकी माँ संभालती थी किन्तु अब वे स्वयं संभालती हैं ,उन्हें समझने में थोड़ा समय लगेगा। 

हाँ ,सो तो है ,नीलिमा महसूस कर रह थी ,इंस्पेक्टर अब प्रभा को बड़े सम्मान से बोल रहा है। होना भी चाहिए दोनों को एक -दूसरे का ख्याल रखने के साथ -साथ सम्मान भी करना चाहिए। शुरू के दिन कितने खुशनुमा होते हैं ?एक -दूसरे का ख्याल रखते हैं ,परवाह होती है ,किन्तु यही प्यार समय के साथ न जाने कहाँ चला जाता है ?क्या पता चलता है ?किसके मन में चोर है ?वो प्यार झूठा है या सच्चा। मैं ही ,धीरेन्द्र को कहाँ पहचान पाई ?घर के सभी लोग उसके व्यवहार से प्रसन्न थे ,उसने भी मुझे जैसे ज़िंदगी जीना सिखाया ,वरना पापा की बंदिशों और उनके क्रोध के कारण  ,मैं ही ज़िंदगी को कहाँ देख पाती ?मेरी हालत तो वही रही'' आसमान से गिरे ,ख़जूर में अटके। ''

लस्सी पीकर गिलास मेज पर रखते हुए ,इंस्पेक्टर विकास ने नीलिमा से कहा -लस्सी अच्छी बनी है ,वैसे आप क्या सोच रहीं हैं ?

मुस्कुराकर बोली -कुछ नहीं ,तुम दोनों के प्रेम को देखकर ,कुछ बातें स्मरण हो आईं ,ईश्वर से दुआ करती हूँ ,तुम दोनों  का प्यार इसी प्रकार बना रहे। 

धन्यवाद !अब मैं चलता हूँ ,कहकर इंस्पेक्टर बाहर आ गया। 

पूजा को बहुत देर तक होश नहीं रहा और जब उसे होश आया उसके पास कोई नहीं था। उसका शरीर काँप रहा था ,धीरे -धीरे उसे वे सभी बातें स्मरण हो आईं ,जो उसके और चंपक के बीच में हुई थीं। सोचकर अब उसे लग रहा था, उसने चंपक पर विश्वास करके, जिंदगी की कितनी बड़ी गलती कर दी ? उठने का प्रयास किया किंतु चक्कर सा आया और वापस बिस्तर पर लेट गई। बहुत देर तक इसी तरह पड़ी रही , सिर हल्का सा दर्द था , जहां पर, उसके सिर में दीवार लगी थी, वहां से शायद थोड़ा खून निकला था और वहीं जम गया। अपने मन में  हिम्मत बँधाते  हुए, वह उठी और एक गिलास पानी पिया , उसे भूख भी जोरों की लगी थी , उसे तो विश्वास था कि चंपक आएगा और दोनों, मिलकर खाना खाएंगे और आगे रिश्ते को बढ़ाने की बातें करेंगे किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया। उसे खाने को देखकर उसकी आंखों में आंसू आ गए। फिर भी उसने मैं खाना गर्म किया और खाया। कुछ देर आराम करके के पश्चात, नहाने चली गई। 

चंपक, पूजा के पास से चला तो आया था लेकिन उसका मन परेशान था, वह जानना चाहता था कहीं पूजा को ज्यादा चोट तो नहीं आ गई या मर तो नहीं गई। जितना मैं बुलाना चाहता था उतनी ही उसे उसकी याद आ रही थी। तभी उसे स्मरण  हुआ, वह तो मेरे बच्चे की मां भी बनने वाली थी। मैंने कुछ ज्यादा ही कर दिया। मुझे उसे समझाना चाहिए था। उसका  वह दृश्य बार-बार उसकी आंखों के सामने आ रहा था, जब उसने पूजा को बिस्तर पर पटका था, और उसका सिर्फ दीवार में लग गया था। क्या वह जिंदा होगी ? कहीं ऐसा ना हो, अपने ऊपर किए अपराध पर, वह पुलिस को सब बता दे ! पुलिस में सूचना दे दे ! वह घायल शेरनी हो रही थी , कुछ भी कर सकती है। जब मेरे प्यार के लिए वह अपने माता-पिता, की भी परवाह नहीं कर रही थी तो अपने बच्चे के लिए, शायद मेरी भी परवाह न करें। मुझे एक बार उसे देखना तो चाहिए था , मुझे पता होना चाहिए कि मैं दिल का इतना बुरा नहीं हूं , मैं कोई अपराधी नहीं हूं किंतु उसने मुझे गुस्सा दिलवा दिया जिसके कारण यह हादसा हुआ। मेरा उद्देश्य उसे चोट पहुंचाना नहीं था , बस उससे पीछा छुड़ाना था। अपने अंतर मन को टटोलकर देखा, क्या वह पूजा से प्यार करता है ? नहीं , भीतर से आवाज आई। यह जबरदस्ती का रिश्ता था और वह समझना ही नहीं चाहती थी। मुझे प्रेमी होने के नाते तो नहीं किंतु इंसानियत की नाते एक बार उससे मिलने जाना तो चाहिए। उसे देखने जाना तो चाहिए , वह ठीक से तो है या नहीं। 

 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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