जब चंपक पूजा से मिलने आता है और पूजा को समझाने का प्रयास करता है -कि वह इस बच्चे को गिरा दे इस बात के लिए पूजा तैयार नहीं होती है किंतु चंपक के बदलते तेवर को देखकर ,वह परेशान हो उठती है और चंपक के सामने गिड़गिड़ाती है- कि वह ऐसा क्यों कर रहा है ? इसमें बुराई ही क्या है? बच्चा भी रहेगा और हम भी ठीक से रहेंगे। क्यों न...... वह अपने माता-पिता से बात कर ले ,लेकिन वह नहीं जानती थी कि चंपक की विचारधारा बदल चुकी है। विचारधारा ही नहीं बल्कि उसकी पसंद भी बदल चुकी है। अब उसकी पसंद 'पूजा' नहीं' छाया' है। पूजा रोने लगती है -उसे लगता है ,जैसे वह अब तक न जाने कौन सी दुनिया में खोई हुई थी? अब उसे जिंदगी की हकीकत का एहसास हो रहा था ,वह इस बच्चे को कहां लेकर जाएगी ? किसी से कह भी नहीं सकती। उसने माता-पिता को भी कुछ नहीं बताया है ,ऐसी बात बताने की भी कहां होती है ?गलती तो उसने ही की है तो भुगतेगी भी वही, उसे चंपक से अटूट प्रेम था, इसीलिए पहले उसे समझाने का प्रयास करती है, किंतु चंपक अपनी बात से टस से मस नहीं होता है।
तब वह उस पर क्रोधित होती है और क्रोधित होते हुए कहती है- मैं तुम्हें देख लूंगी और मैं तुम्हारे घर जाकर तुम्हारे घर वालों से इस विषय में बात करूंगी।
पूजा की यह बात सुनकर चंपक भी ,अत्यंत क्रोधित हो जाता है और उससे कहता है -कि तुम्हारा ऐसा कहने का साहस भी कैसे हुआ? कि मेरे घर जाने की भी ,तुम सोच सको ! मैं इस जबरदस्ती के' प्रेम' को नहीं अपनाऊंगा मैं तुमसे प्रेम नहीं करता। कहीं ऐसा तो नहीं ,तुमने यह सब जानबूझकर किया हो ताकि तुम मुझे विवाह के लिए ,विवश कर सको !
उसका यह इल्ज़ाम सुनकर ,पूजा चिल्ला उठी और बोली -तुमने मेरे विषय में ऐसा सोचा भी कैसे ?
तुम कर सकती हो ,मैं सोच भी नहीं सकता ,तुम क्या अपने को बहुत होशियार समझती हो ?तुमने ही मुझे अपने रूप के जलवे दिखा मुझे अपने समीप आने के लिए विवश किया और अब मुझे धमकी दे रही हो ,ताकि मैं तुमसे जबरदस्ती विवाह कर लूँ।
ये सब तुम क्या कह रहे हो ? मैंने तो ऐसा सोचा भी नहीं था कहते हुए पूजा रोने लगी। इस समय वह अपने को विवश महसूस कर रही थी। चंपक की बात सुनकर तो लगता है, बात ही खत्म हो गई ,जब प्रेम ही नहीं करता है ,जहां प्रेम नहीं है तो वहां अधिकार भी स्वतः ही समाप्त हो जाता है। किंतु पूजा इस रिश्ते को अभी भी संभालना चाहती है, या यूं समझिए ,अपनी गलती को सुधारने का एक प्रयास करती है और चंपक से पूछती है -मुझमें क्या कमी है ,तुम मुझे क्यों नहीं अपना रहे हो ? क्यों अपने माता-पिता से बात नहीं कर लेते ? तभी जैसे उसे कुछ झटका सा लगा और बोली- कहीं, तुम्हें कोई और लड़की तो पसंद नहीं आ गई। मुझसे मन तो नहीं भर गया, अब वह ऐसे शब्दों का प्रयोग करने लगी थी. जो उसने सोचा भी नहीं था। एक तरह से कहा जाए तो उसे सोचना चाहिए था कि उसके साथ ऐसा भी हो सकता है। यही उसकी गलती थी, इंसान का मन कब और कैसे बदल जाए कोई कह नहीं सकता कभी-कभी तो अपने मन की भी गारंटी नहीं होती, तो वह तो दूसरे की गारंटी कैसे ले सकता है ?
तब चंपक को लगता है, कि अब इसे स्पष्ट बात ही देना चाहिए और बोला तुम सही समझी मेरे लिए एक लड़की देखी हुई है वह उन्हें भी पसंद है और मुझे भी मैं उसी से विवाह करूंगा। उसके ऐसे कठोर शब्दों को सुनकर पूजा रो उठी उसने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि इतना सीधा दिखने वाला चंपक इतना चालाक और धोखेबाज निकलेगा। तब उसे क्रोध आता है और कहती है, तो यूं कहो ना कि तुम्हारा मन बदल गया है तुम्हें कोई और लड़की भाग गई है अब तुम उसके संग रंग ले लिया मनाने के सपने देख रहे हो। और अपने इसी स्वार्थ के चक्कर के चलते तुम मुझे धोखा देने के लिए तैयार हो गए। और कहते हुए वह उसकी तरफ झपटती है।
चंपक तो जैसे पहले से ही तैयार था और उसने, पूजा का हाथ पकड़ लिया और बोला -ऐसा दुस्साहस भी मत करना , तुम अपनी मर्जी से मेरी झोली में आ गिरीं थीं , मैं तुम्हारे पीछे नहीं गया था अपने हाथों से उसकी उसके मुंह को दबाते हुए बोला।
पूजा भी उसका विरोध करती है, किंतु वह एक लड़की, ऊपर से गर्भवती, चंपक पर हावी नहीं हो पाई। तब चंपक ने उसे पकड़ कर दूर से ही धक्का दे दिया उसे क्या फर्क पड़ता था ? कि वह बच्चा जिए या मर जाए, अब तो पूजा भी उसके लिए ऐसी ही हो गई थी। पूजा अपने बिस्तर पर तो जा गिरी किंतु बिस्तर के दूसरी तरफ जो दीवार थी उससे उसका सिर टकराया, सिर दीवार से टकराते ही पूजा को चक्कर आ गया और वह वहीं बेहोश हो गई। उसकी हालत देखकर एक बार को तो चंपक घबरा गया और सोचा -कहीं यह मर तो नहीं गई। मरे या जिए मेरी बला से, यह सोचकर उसने, घर से बाहर निकलकर आसपास देखा ,कि कोई देख तो नहीं रहा है और तीव्र गति से बाहर निकल गया।
