Rasiya [part 2]

पिछले भाग में, हम अपनी कहानी के मुख्य किरदार' चतुर भार्गव ''से मिलते हैं। जो दसवीं कक्षा में पढ़ता है , किंतु पढ़ाई की अपेक्षा खेलने में, उसका ध्यान अधिक है। कहते हैं -''चतुर भार्गव ''के  खानदान की कई पीढ़ियां इसी गांव में चली आ  रही  हैं। चतुर के दादाजी' तेजाजी 'इस गांव के प्रधान, रह चुके हैं। गांव के सभी लोग उनको जानते हैं, और उनका आदर भी करते हैं। जिस विद्यालय में चतुर पढ़ रहा है, उस विद्यालय को भी ,दसवीं तक उसके दादाजी ने ही करवाया था। इसीलिए गांव के अध्यापक भी उस परिवार का सम्मान करते हैं।  यदि चतुर कोई गलती करता है ,तो इंसानियत के नाते ,उसके घर पर सूचना भिजवा देते हैं। आज भी ऐसा ही हुआ, चतुर विद्यालय गया ही नहीं, मां रामप्यारी घर में प्रसन्नता पूर्वक कार्य कर रही थी, तभी उन्हें सूचना मिलती है -कि  चतुर आज विद्यालय गया ही नहीं, इसीलिए अध्यापक ने दो लड़कों को, चतुर को घर से लिवाने के लिए भेजा था किंतु चतुर घर में होता तो तब मिलता।  जब रामप्यारी को यह बात पता चलती है, तो वह अत्यंत क्रोधित हो जाती हैं , कि यह लड़का घर के कार्य भी नहीं करता है और विद्यालय भी समय पर नहीं जाता है ।इसी कारण से , वे  उन लड़कों के साथ ,स्वयं चतुर को ढूंढने के लिए निकल पड़ती हैं  और गांव के मैदान में देखतीं हैं ,कि चतुर अपने गांव के लड़कों के साथ'' गुल्ली डंडा ' खेल रहा है।


 यह देखकर उन्हें अत्यंत क्रोध आता है, और दूर से ही चिल्लाकर कहती हैं - तू ठहर जा !आज मैं तुझे छोडूंगी नहीं , मां को इस तरह क्रोध में देखकर, चतुर गुल्ली -डंडा छोड़कर भाग खड़ा होता है। वह समझ नहीं पाता है कि मां इस तरह से क्रोधित क्यों है ? रामप्यारी के साथ ही, चतुर के विद्यालय के दो अन्य छात्र भी साथ में आ रहे थे। 

हरिराम को ,उसने उसकी चाल देने के लिए कहा था किंतु आज भी वह अपना वादा पूरा न कर सका और भागते हुए , हरिराम से कहता है - ''पहले जान तो छुड़ा लूं , आकर तुझे तेरी चाल भी देता हूं।' 

चतुर भागता हुआ, एक गली में घुस जाता है , तभी उस गली के एक घर में से पुष्पा बाहर निकलकर आती है, और चतुर को इस तरह भागते हुए देखकर ,पूछती  है - चतुर ! क्या हुआ ?तू ,इस तरह क्यों भाग रहा है ?

अरे पता नहीं, मां पीछे पड़ी है, लगता है , आज बहुत मारेगी , मुझे लगता है ,गुरुजी ने, मेरी शिकायत घर पर करवा दी है। 

जब ऐसे कर्म करेगा तो.......  पिटेगा ही पुष्पा ने,इस तरह कहा ,जैसे उसे समझा रही हो ,''बुरे काम का बुरा नतीजा '' उसे चतुर से कोई हमदर्दी नहीं है । 

तू ज्यादा मत बोल..... मुझे कहीं छुपा दे , मैं तेरे घर में जाकर छुप जाता हूं, मेरी मां को मत बताना , तेरा बड़ा एहसान होगा , चतुर गिड़गिड़ाते हुए ,पुष्पा से बोला। 

मैं क्यों तुझे बचाऊँ ? तू है ,ही पिटने लायक ! तो सुनता ही किसकी है ? उस दिन तुझसे आम तोड़ कर लाने के लिए कहा था किंतु तूने एक भी नहीं सुनी। 

हाथ जोड़कर चतुर कहता है - मेरी मां !अभी बचा ले, कल को ढेर सारे आम ले आऊंगा। 

तू आज स्कूल क्यों नहीं गया ? पुष्पा के इतने पूछते ही, तब चतुर को स्मरण हुआ , अपने दोस्तों को देखकर भी उसे याद नहीं आया था कि आज वह विद्यालय नहीं गया है , तब उसे लगता है ,कि आज उसने यह सबसे बड़ी गलती कर दी है। 

ओ  तेरी...... घर से तो मैं, विद्यालय के लिए ही निकला था, किंतु गलती तो हरिराम की है , उसे ''गुल्ली -डंडा'' खेलते हुए देखकर मुझे भी 'गुल्ली -डंडा'' खेलने की इच्छा हो गई। तू जल्दी बता, मन आने ही वाली होगी , मैं कैसे बचू ?

इतना बड़ा सांड सा हो गया, क्या तुझे इतना भी नहीं पता ?हमारे पड़ोस के घर की दीवार छोटी है, अपने विद्यालय में पहुंच जा !तब तक मैं चाची  को संभालती  हूं , कह कर पुष्पा ने  उससे अपना पिंड छुड़ाया। 

यह तो मुझे ध्यान ही नहीं रहा, कहते हुए वह पुष्पा के घर के बराबर में, जो घर था, उसके अंदर घुस गया इससे पहले कि वह लोग कुछ समझ पाते ,उनके घर की  दीवार फांदकर दूसरी गली में पहुंच गया , और वहां से सीधा अपने विद्यालय की ओर दौड़ लगा दी। 

तब तक रामप्यारी भी, पुष्पा के नजदीक आ चुकी थी और बोलीं -पुष्पा ! क्या तूने हमारे चतुर को देखा है। 

हां, दौड़कर, सीधे हाथ की तरफ गया है , क्या हो गया ?चाची ! उसने ऐसा क्या कर दिया ?

अरे करना क्या है ? तुझे क्या बताऊं ? इस लड़के ने मेरी'' नाक में दम कर रखा है''। अबकी बार दसवीं के पेपर हैं , और यहां गुल्ली -डंडा खेलने में मस्त रहता है। मास्स  साहब ! ने दो लड़कों को भेजा था, अपने पीछे आते हुए लड़कों की तरफ इशारा करते हुए बोली-तब कहीं मुझे जाकर पता चला, कि आज वह विद्यालय ही नहीं गया है। सोच रही थी -पढ़ -लिख लेता तो उसकी जिंदगी संवर जाती , किंतु उसे तो इसी गांव में धक्के खाने हैं। 

क्या हो गया ? खेती संभाल लेगा , पुष्पा ने कहा। 

तू ज्यादा मत बोल ! मुझे मत सिखा कि मुझे क्या करना है, क्या नहीं करना है ?तुरंत ही रामप्यारी के तेवर बदल गए।  आज मैं इसे छोडूंगी नहीं और कहते हुए वह सीधे गली में चली जाती है, जिस तरफ पुष्पा ने इशारा किया था।

जब चतुर अपने विद्यालय के प्रांगण में पहुंचा, तो उसके हृदय की धड़कन, तेज गति से धड़क रही थीं । लग रहा था, उसका दिल उसकी पसलियों  को तोड़कर ,बाहर निकल जाएगा। गहरी -गहरी सांसें ले रहा था , वह जानता था ,यदि मास्स साहब ने देख लिया, कान पड़कर खड़ा करवा देंगे, या फिर मुर्गा बना देंगे इसलिए जब उनका ध्यान ''ब्लैक बोर्ड'' की तरफ था तब वह चुपचाप पीछे आकर बैठ गया।

किंतु गुरु तो गुरु ही होते हैं, भले ही उनका ध्यान'' श्याम पट्टी ''पर था किंतु उन्होंने सिर झुकाकर बैठे चतुर को देख लिया था। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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