Sazishen [part 48]

कुछ समझ नहीं आता, न जाने कब क्या सोचने लगते हो और क्या करने लगते हो ? मुझे तो मना कर रहे थे कि फिल्म नहीं देखनी है और अब स्वयं ही, मुझे लेकर यहां आ गए। 

अब हमारी धर्मपत्नी जी की इच्छा थी, तो आना ही पड़ता इंस्पेक्टर विकास खन्ना प्रभा की तरफ देखते हुए बोला-मुझे एक बात समझ में आई , जब तुमने कहा कि अगर उसे हमें मिलना होगा, तो वहां भी मिल सकती है ,तब मैंने सोचा -हो सकता है,वो अपने पति के साथ यही घूमने आ जाये।हमारी पत्नी का भी दिल बहल जायेगा और हमारी तलाश भी जारी रहेगी। 

 अच्छा ,एक बात बताइये -क्या आपको पूर्ण विश्वास है ? कि वह चंपा ही थी, इतनी शीघ्रता में कैसे उसका विवाह हो सकता है ?जबकि आपने बताया था उसके चोट भी आई है। 

कुछ कह नहीं सकता ,जब वह मिलेगी तभी बता सकता हूं , इसलिए किसी भी बात के लिए मैं निश्चित तौर पर अपनी बात नहीं कह सकता था। अच्छा अब  चलो ! देरी हो जाएगी पिक्चर निकल जाएगी, मुझे पिक्चर शुरू से देखना ही पसंद है बीच में से नहीं। हंसते हुए दोनों अंदर प्रवेश करते हैं, अभी फिल्म शुरू नहीं हुई थी। 



चलो अच्छा है ,सही समय पर पहुंच गए प्रभा ने कहा ,वरना तुम तो पिक्चर ही नहीं देखते। 

फिर मजा नहीं आता है , विकास खन्ना ठहरा पुलिस इंस्पेक्टर उसकी नज़रें चारों ओर दो घूमती हैं उसे अभी भी भीड़ में कहीं लग रहा था कि कहीं न कहीं उसकी एक झलक दिख जाए और उसे उसके सवालों का जवाब मिल जाए। किंतु अभी तक कोई भी उसे नजर नहीं आ रहा था वह पिक्चर देखने बैठ गया किंतु उसका ध्यान कहीं और ही था। कुछ देर बाद उसे नींद आने लगी और वह सो गया। 

प्रभा आराम से पिक्चर देख रही थी, इंस्पेक्टर विकास खन्ना को सोते हुए देखकर, बोली- यदि तुम्हें सोना ही था तब होटल में ही रह जाते मैंने आपसे कोई जबरदस्ती नहीं की थी। 

कोई बात नहीं, तुम्हारी इच्छा पूरी करना मेरा कर्तव्य बनता है, किंतु अब मेरी  फिल्मों में कोई दिलचस्पी नहीं रही तुम अपनी फिल्म देखो और मैं रात को जगाने की तैयारी करता हूं ,कहते हुए उसने शरारत भरी नजरों से प्रभा की तरफ देखा। प्रभा ने अपनी मेहंदी लगे हाथ उसके बालों पर फिराए और बोली-जब मैं आई हूं तो पूरी पिक्चर ही देखूंगी। आप सोना चाहते हैं ,तो सो जाइए। 

फिल्म समाप्त होने के पश्चात प्रभा ने विकास खन्ना को उठाया, और बोली- कहां खोए हुए हो ? क्या अभी तक नींद पूरी नहीं हुई चलो ! फिल्म पूरी हो गई अब घर चलते हैं ,होटल में चलकर सोना। 

अंगड़ाई लेते हुए विकास खन्ना मुस्कुराया और बोला, अब होटल नहीं जाना है, मैं सोकर अब ताज़गी  महसूस कर रहा हूं ,अब थोड़ा घूमेंगे। वे लोग भीड़ से वह बाहर निकल रहे थे तभी उसकी नजर एक लड़की पर पड़ी जो बहुत महंगा सूट पहने हुए थी। महंगा पर्स था , अबकी बार वह किसी अधेड़ उम्र व्यक्ति के साथ थी। यह क्या माज़रा है, विकास खन्ना ने सोचा- जब इसे मैंने नाव में देखा था, तब तो यह  किसी जवान लड़के के साथ थी। फिल्म देखने के लिए अपने पिता के साथ आई है ,किन्तु इसके पिता से तो मैं मिल चुका हूँ।  इसका पति कहां है ? तभी वह प्रभा से कहता है -तुम यही ठहरो ! मैं अभी आता हूं। 

क्या ? चंपा तुम्हें फिर से दिख गई। 

हां, मैं अभी आया कहकर वह निकल गया। तब तक वह लड़की, वहां से जा चुकी थी। विकास खन्ना ने चारों तरफ नजर दौड़ाई किंतु वह लड़की उसे कहीं नहीं दिखाई दी. यह क्या आंख मिचोली हो रही है। समझ नहीं आता यह चंपा ही है या कोई उसकी कोई हमशक्ल कभी किसी अधेड़ के साथ दिखती है तो कभी, जवान लड़के के साथ आखिर यह क्या पहेली है ? हैरान होते हुए विकास खन्ना सोच रहा था। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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