Sazishen [part 47]

 पूजा ! न जाने कौन सी दुनिया में खोई हुई रहती है ? समाज की और ज़िंदगी की वास्तविकता को समझती  ही नहीं है ,या समझना ही नहीं चाहती है।  वह सोचती है ,जैसे- सारा जहां उसकी मुट्ठी में है। सब चीज उसके कहने और सोचने से ही थोड़ी हो जाती है। वह मां बनने वाली है ,तो उसका सोचना है -कि चंपक अपने माता-पिता से बात करके, विवाह की बात कर सकता है। उसके लिए हर चीज बहुत ही सरल है। आसानी से कह भी देती है और सोच भी लेती है।

 क्या तुम ये सब इतना सरल समझ रही हो ?,तुम ऐसा कैसे सोच लेती हो ?

''यही तो मेरा स्टाइल है ''कहकर हंस दी। 


 जब चंपक उससे अपनी शिक्षा का बहाना लेता है, तब वह कहती है -विवाह के बाद भी लोग पढ़ते हैं , ऐसा नहीं है ,कि विवाह के बाद जिंदगी समाप्त हो जाती है। विवाह से इस रिश्ते को एक नाम मिल जाएगा और हमारे बच्चे को एक परिवार ! ऐसा वह सोचती है , किंतु ऐसा चंपक तो नहीं सोचता यदि वह उसके साथ रहता है, उसका साथ देता है तो शायद , पूजा का सोचना सही भी हो जाए। 

किंतु जिंदगी इतनी आसान कहां है ?कि आसानी से सब चीजें , हमने तय की ओर हो गईं। ऐसा ही कुछ अब  पूजा के साथ होने जा रहा है। पूजा को जिंदगी की हकीकत, या यह कहें  कि चंपक की सच्चाई का अब एहसास होगा। पूजा देख रही थी कि चंपक उसकी बात सुनकर थोड़ा असहज  हो गया है , वह तो सोच रही थी कि वह प्रसन्न होगा किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ और उसे समझाने का प्रयास करने लगा। वह यह भी सोच रहा था, कि  कहीं कॉलेज में ही, हम दोनों के मध्य कुछ बात न बढ़ जाए। पूजा को समझाता है -मैं कल घर पर आ रहा हूं, हम वहीं मिलकर बात कर लेंगे। हमें यह तय करना होगा, कि कैसे और क्या करना है ?

इसमें क्या करना है ? तुम सीधे अपनी मम्मी- पापा से बात करो ! उन्हें इस विवाह के लिए तैयार करो ! बस इतना ही तो तुम्हें करना है। 

क्यों ,तुम्हारे मम्मी- पापा मान जाएंगे ? चंपक ने पूजा से पूछा।

 मानेंगे क्यों नहीं ? उन्हें मनाना ही होगा , जब मेरी पढ़ाई पूरी हो जाएगी तब भी तो, वह मेरे लिए कोई लड़का देखकर मेरा विवाह करेंगे। अब मैंने स्वयं लड़का देख लिया , तो इसमें इनकार करने वाली कोई बात ही नहीं बनती है।हालाँकि पापा को अवश्य ही क्रोध आएगा हो सकता है ,अपनी बंदूक ही निकाल लें किन्तु मैं भी उन्हीं की बेटी हूँ। ठान लिया, सो ठान लिया। 

 चंपक देख रहा था कि ये सारी बातें यह कितनी सहजता से कह जाती है ? जैसे सब इसमें पहले से ही तय किया हुआ है। पूछूंगा तो कहेगी -''यही  मेरा स्टाइल है। ''

तुम कुछ ज्यादा नहीं सोच रहे हो ? मैं तो सोच रही थी, यह बात सुनकर, तुम बहुत ही प्रसन्न होंगे किंतु तुम तो गिरगिट की तरह रंग बदल रहे हो। 

यह तुम क्या कह रही हो ?

 हंसते हुए बोली -मैं देख रही हूं ,तुम्हारे चेहरे पर कई प्रकार के रंग आ जा रहे हैं। तुम खुश तो हो न..... 

भला यह भी कोई खुशी की बात है ,मन ही मन चंपक ने सोचा, इसने और मुझे मुसीबत में डाल दिया किंतु पूजा से बोला - हां मैं बहुत प्रसन्न हूं ,मैं सोच रहा हूं -हमें कैसे और क्या करना है ? तुमने यह बात मुझे पहले क्यों नहीं बताई ?

मैं तो तुम्हारी प्रतीक्षा में ही थी ,क्या खाक़  बताती ? जब मुझे पता चला, तब से तुम घर पर आए ही नहीं, किससे और कैसे बताती ?इसलिए तुमसे मिलने यहीं  कॉलेज में चली आई।

तुम भी अजीब हो !

''यही तो मेरा स्टाइल है ''मुस्कुराते हुए पूजा बोली। अब उसे लग रहा था, जैसे उसकी सभी समस्याएं हल हो चुकी हैं।   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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