Sazishen [part 46]

पूजा ,चंपक से मिलने उसके कॉलिज ही पहुंच जाती है और उससे बात करना चाहती है। चंपक का ये केेसा रिश्ता है ?आज चंपक को ,पूजा का उसके कॉलिज आना ,उससे बातें करना पसंद ही नहीं आ रहा है। वह नहीं चाहता कि पूजा, अब उसके सम्पर्क में रहे। किन्तु पूजा ने तो ,चंपक से प्रेम किया है। स्कूल में ,वह जब से उसकी दोस्त बनी ,तब भी उसके साथ थी , और अब ,जब उससे प्रेम करने लगी है ,तब भी उसका साथ चाहती है ,उसी के साथ रहना चाहती है। उसी के सपने देख रही है। इसमें उसकी कहाँ गलती है ?

चंपक चाहता तो, इस रिश्ते को आगे बढ़ाने से इनकार कर सकता था, किंतु वह उसके साथ रहा। किंतु जब से उसने' छाया' की तस्वीर को देखा है। तब से वह पूजा से दूर जाने लगा। पूजा को इस विषय में कुछ भी मालूम नहीं है, किंतु हां इस बात से अवश्य परेशान है कि अब चंपक उसके पास नहीं आ रहा है और अब तो, परेशानी कुछ ऐसी हो गई कि उससे मिलना आवश्यक हो गया है । जब वह चंपक से अकेले में मिलकर बात करना चाहती है तो वह दोस्तों का बहाना लेता है। उसके दोस्त भी, पूजा के प्यार को देख पाते हैं फिर चंपक क्यों नहीं देख पा रहा ? पूजा कहीं अकेले में बैठकर उससे आराम से बात करना चाहती है किंतु वह उसे टाल देना चाहता है और कहता है- कि तुम अभी घर चली जाओ ! मैं वहीं  तुमसे मिलने आऊंगा। किंतु पूजा इतने दिनों से उसकी प्रतीक्षा में थी और वह नहीं आया, इसी बात के ड़र से, वह घर जाने से इनकार कर देती है और बलपूर्वक चंपक का हाथ पकड़ कर, खींचती है , मुझे तुमसे कुछ आवश्यक बातें करनी हैं  , समय बीतता जा रहा है ,मैं अब घर नहीं जाऊंगी, जब तक तुमसे बात नहीं कर लेती। 


चंपक की ऐसी हालत में देखकर, उसके दोस्त हंसते हैं -यार ! एक बात तो जरूर है ,अवश्य ही इस चंपक ने कुछ झोल किया है ,तभी वह लड़की इतने अधिकार से उसे ले जा रही है। 

 चंपक को पूजा पर क्रोध आ रहा था किंतु क्या कर सकता है ? वह कॉलेज के, बगीचे में एक स्थान पर चंपक को लेकर गई और बोली -तुम्हारा व्यवहार इतना बदला हुआ, क्यों है ? तुम इतने दिनों से ,मुझसे मिलने आए भी नहीं। 

फिर से वही बात दोहरा रही हो, तुमसे बताया तो था कि मैं अपनी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा हूं। 

किंतु कुछ देर के लिए तो, मुझसे मिलने आ ही सकते थे। क्या तुम्हें अब मुझसे प्यार नहीं रहा ?

नज़रे चुराते हुए चंपक बोला -नहीं ,ऐसी कोई बात नहीं है। 

यदि ऐसी कोई बात नहीं है ,तो जो बात मैं तुम्हें बताने जा रही हूं ,उसे  सुनकर तुम उछल पडोगे। 

ऐसी कौन सी बात है ? जो मैं उछल पड़ूंगा। 

मैं माँ बनने वाली हूँ और तुम पिता...... 

यह क्या कह रही हो ?तुम तुम्हारा दिमाग तो सही ठिकाने पर है, ऐसा कैसे हो सकता है ?

क्यों नहीं हो सकता है ?

अभी, तुम्हारा -हमारा रिश्ता क्या है ? तुम समाज के सामने इस रिश्ते का क्या नाम दोगी ? दोस्ती ! क्या दोस्ती में ऐसा कुछ होता है ?

यह तो तुम कह रहे हो , किंतु तुम आरम्भ से ही जानते हो, कि मैं तुमसे प्रेम करती हूं। दुविधा तुम्हें है ,मुझे नहीं। मैं पहले से ही, इस रिश्ते को एक नाम दे चुकी थी। विवाह तो एक बंधन है , जब हमारे मध्य ' प्रेम ''है वह भी हो जाएगा। 

न जाने ,तुम कौन सी दुनिया में जी रही हो ? वह उसकी बात सुनकर कांप उठा , कहीं यह बात बहुत अधिक ना बढ़ जाए ,उसके चेहरे का रंग उड़ गया था। जाने यह क्या सोचे बैठी है ? इसने ऐसा हो जाने  ही क्यों दिया ? यदि वह उस पर नाराज होता है या चिल्लाता है , तब यह भी नाराज हो सकती है। हो सकता है, बात कुछ ज्यादा ही बढ़ जाए। अपने आप को संभालते हुए ,कहता है - देखो पूजा ! तुम समझ नहीं रही हो। यह सब ऐसे और इतनी जल्दी नहीं होता है। हमारे रिश्ते का भी कोई नाम नहीं है , मुझे मम्मी -पापा को समझाने में भी समय लगेगा। उन्हें बताना होगा, हर चीज का एक वक्त होता है न ही ,तुम्हारी पढ़ाई पूरी हुई है और न ही मेरी, हम कैसे इस जिम्मेदारी को उठा सकते हैं ?

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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