Sazishen [part 45]

 पूजा को अपने सामने देखकर,  चंपक को प्रसन्नता नहीं हुई बल्कि वह दोस्तों के सामने उससे कुछ न कह सका और मन ही मन तिलमिलाया। पूजा से पूछा -तुम यहां क्यों आई हो ? अभी भी, उसके दोस्त वहीं खड़े होकर उन दोनों को देख रहे थे। वे जानना चाहते थे कि इन दोनों का रिश्ता क्या है ? तब उसके एक मित्र ने उससे  पूछ ही लिया , यार ! यह कौन है ?

कोई नहीं, मेरी दोस्त ही है, हम पहले'' पंचगनी'' में साथ पढ़ते थे। ''कोई नहीं ,''ये शब्द पूजा को अंदर तक बींध गए। उसे क्रोध तो बहुत आया किन्तु ज़ब्त करके रह गयी। 

मुझे तो दोस्ती से कुछ ज्यादा ही लग रहा है ,कहकर मुस्कुरा दिया। 

अबे ! ये तेरी साथी है,ये तुझे ही ढूंढ रही थी।कॉलिज के एक लड़के ने आकर बताया।  

हां ,बहुत दिन हुए, हम मिले नहीं, इसलिए मिलने चली आई होगी ।


होगी ,क्या ?ये तुझसे मिलने ही आई है।  चंपक ने अपने दोस्तों से पूजा का परिचय नहीं कराया बल्कि वह उसका परिचय क्या कराता ? उससे बात करने से कतरा रहा था। पूजा ने देखा ,चंपक का व्यवहार काफी बदला हुआ है। क्या मैं तुमसे अकेले में कुछ बात कर सकती हूं ?

तुम देख नहीं रही हो, मैं अपने दोस्तों के साथ हूं ?

मैं भी तो तुम्हारी दोस्त हूं ,अभी तुमने अपने दोस्तों से बताया न...... पूजा ने, चंपक के शब्दों पर व्यंग्य किया। उसे इस बात का दुख हो रहा था कि इसने मेरा इनसे ठीक से परिचय भी नहीं कराया।' दोस्त से ही कुछ ज्यादा' कह देता तो क्या जाता ? हम तो शादी करने ही वाले हैं , ऐसा वह सोच रही थी। जब चंपक में देखा कि यह हटाने वाली नहीं है तब उसने अपने दोस्तों से कहा -तुम चलो ! मैं आता हूं। उसके दोस्त मस्ती करते हुए चले गए, और आपस में कह रहे थे -मुझे तो नहीं लगता ,कि यह दोस्ती ही है ,दोस्ती से भी कुछ ज्यादा ही लग रहा है वरना इस समय, इसके कॉलेज में इसे क्यों ढूंढती ?ऐसा क्या काम आन पड़ा होगा ?

अरे ! क्या काम आया होगा ,इसके बिना दिल नहीं लग रहा होगा, इससे प्यार जो करती है। 

तुझे कैसे मालूम ?वह उससे प्यार करती है। 

क्या तुम्हें उसकी नजरों को नहीं देखा, चंपक के प्रति उसमें प्यार नजर आ रहा था हालांकि वह नकार रहा है किंतु मुझे इनकी दोस्ती ,दोस्ती से ज्यादा कुछ लग रही है। 

उन लड़कों के चले जाने पर पूजा चंपक से कहती है - क्या हम कहीं बैठ सकते हैं ? तुम देख नहीं रही  हो मेरे दोस्त मेरी प्रतीक्षा में है

किंतु मैं भी तो, तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी, जब तो तुम प्रतिदिन मेरे घर के चक्कर लगाते थे, और अब अचानक इस तरह क्यों आना बंद कर दिया ?

 पढ़ाई में व्यस्त था , पेपर भी आने वाले हैं , तैयारी कर रहा था, वह झुंझलाते हुए बोला। 

जब तुम आते थे, मैं भी तैयारी ही कर रही थी किंतु मैंने  तुम्हारे लिए, समय निकाला , क्या तुम मेरे लिए समय नहीं निकाल सकते थे ?उसके व्यवहार ,उसकी सभी बातों को नजरअंदाज कर बोली - तुम्हें एक बात और भी तो बतानी  थी। इतने दिनों से तुम्हारी प्रतीक्षा में थी, और तुमने आना ही बंद कर दिया। तुम्हारे घर फोन किया किंतु तुमने उठाया नहीं, पहले तो तुम मेरा फोन अति शीघ्र उठा लेते थे। अब तुम्हारी मम्मी  फोन उठाती हैं ,क्या उन्हें ,तुमने हमारे विषय में कुछ बताया ?

नहीं, मैंने तो अभी कुछ भी नहीं बताया। 

तब वह यह कैसे कह रही थीं ? क्या उसे मंदिर ले जाना है और मुझे चेतावनी भी दी - मेरे बेटे से दूर रहना !

क्या मम्मी ने ,तुमसे ऐसा कुछ कहा ?आश्चर्य से चंपक ने पूछा। 

हां , किंतु अब तुम्हें हमारे विषय में उनसे बात कर लेनी चाहिए पूजा बोली। 

क्या बात करनी है ?

अभी बात तो हो ही रही है , पहले कहीं चलकर बैठते हैं, तुम्हारे दोस्तों को मालूम है ,कि तुम मेरे साथ हो ! वे  कहीं भागे  नहीं जा रहे हैं। 

अच्छा, तुम ऐसा करो !तुम अभी अपने घर चली जाओ ! मैं तुमसे वही मिलने आऊंगा। 

मैं तुम पर कैसे विश्वास कर लूं ? यदि तुम्हें आना होता तो मुझे इस तरह यहां नहीं आना पड़ता , इसलिए मुझे आज और अभी ही बात करनी है ,पूजा ज़िद  पर अड़ गई। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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