Ehsaan kyon

 उस रात्रि में बहुत रोया था, मैं आना नहीं चाहता था किंतु जबरदस्ती लाया गया। क्या यह मेरी गलती है ? क्यों मुझे इस संसार में लाने के लिए मजबूर किया गया। मैं इस मायावी संसार में आना ही नहीं चाहता था। मैं रोता रहा किन्तु डॉक्टर ने भी ,मेरा दर्द नहीं समझा और वो मुझे थपथपाती रही। मेरे पैदा होते ही ,मेरे रोने पर भी ,लोगों ने खुशियां मनाईं। जो मेरी माँ थी ,मैंने उसे देखा किन्तु पहचान नहीं पाया ,न जाने किस जन्म में मेरी माँ रही होगी ?किन्तु इस जन्म में तो अवश्य ही मेरी माँ है। अब उसी का आसरा था ,उसकी ''ममता ''की गोद तो मैंने भर दी थी किन्तु मैं उससे जानना चाहता था ,क्यों मुझे इससंसार में लाई ?मेरा इस संसार में आने का कोई इरादा नहीं था। न ही ,मैंने कोई गलती की किन्तु मैं अपने पिता और माँ के प्रेम के मध्य 'बलि का बकरा 'बन गया। उनके कथनानुसार तो - ''मैं उनके प्रेम की निशानी था।'' किन्तु मैं समझता हूँ उन भावुक क्षणों का मैं परिणाम हूँ। 


जो भी रहा ,किन्तु मैं इस संसार में आया ,मेरा अस्तित्व इस बात का सबूत है। वो रात्रि भी ,जो मेरे जन्मतिथि के नाम पर जानी जाएगी। मैं ऐसी माँ पाकर धन्य हो गया ,जो रात -दिन मुझे पाल -पोषकर बड़ा कर रही थी। उसको तो जैसे समय बिताने के लिए ,एक खिलौना मिल गया। जब जी चाहता ,नहलाती ,खिलाती ,सुंदर वस्त्र पहनाती। ये मैंने इसीलिए भी कहा -क्योंकि जब मुझे भूख लगती और मैं रोता और वो किसी कार्य में व्यस्त होती,  डपट भी देती। मेरे  भविष्य के स्वप्न सजा रही थी। धीरे -धीरे मेरे मानस-पटल से मेरी पिछली जो भी स्मृतियाँ रहीं होगीं ,मैं उन्हें भुलाता चला गया मेरा अबोध मन ! अब इस दुनिया की रंगीनियों में रमने लगा। मैं इस संसार को समझने  का प्रयास करने लगा। 

मैं अकेला ही ,इस संसार में नहीं आया ,मेरे माता -पिता के नाजुक क्षणों का लाभ मेरे से छोटे -भाई और बहन को भी मिला। आने से पहले वे भी रो रहे थे किन्तु मेरी ही तरह उन्होंने भी, इस संसार से समझौता कर लिया। अभी तक  माता -पिता अपना कर्त्तव्य समझ हमें पाल रहे थे। हमारे भविष्य के साथ -साथ अपना भविष्य भी संजो रहे थे। ताकि भविष्य में जब वो नाजुक व् कमजोर तन से बुढ़ापे की ओर अग्रसर होंगे ,तब हम उनकी सेवा  में प्रस्तुत रहें ,उनकी बात भी अपनी जगह सही है। तब तक मुझे दुनिया की रीत समझ आने लगी थी।'' इस हाथ दे ,उस हाथ ले।''यानि 'सेवा भाव 'का आदान -प्रदान। जबकि मैं तो उनका अपना खून हूँ , इसीलिए मेरा उनके प्रति ये दायित्व बनता ही नहीं वरन बढ़ जाता है। 

यहाँ तक तो सब ठीक चलता  रहा किन्तु न जाने मेरी माँ को क्या होने लगा ?बात -बात पर मुझे पैदा करने का एहसान जताने लगी। मैं जानता भी हूँ और समझता भी हूँ कि वे मेरे माता -पिता है ,मेरा कर्त्तव्य भी मैं जानता हूँ किन्तु उन्हें इतने से भी संतुष्टि नहीं हुई। मेरी यौवनावस्था आते ही ,मेरा विवाह करा दिया। अब आप ही बताइये ! मैं दो पाटों में फंसा हुआ क्या करता ?उसका एहसान था ,मैं अपना घर छोड़कर तुम्हारे लिए ,तुम्हारे पीछे आई हूँ । उसकी मानता तो माँ को असुरक्षा की भावना घेर लेती। तब माँ का कथन था -तुझे मैंने ,नौ महीने पेट में रखा ,उसके पश्चात ,तेरे सभी दैनिक कार्य किये और इस लायक बनाया। ''

अब मैं आप लोगों से ही पूछता हूँ ,,क्या मेरी गलती थी ? इतने पर भी उन्होंने मुझे एक पिता और माता का एहसास दिलाने के लिए ,मुझे भी उन क्षणों से गुजरने के लिए कहा ,उनकी पीढ़ी अथवा उनका वंश जो मुझे  बढ़ाना था। और न चाहते हुए भी......  मैंने भी अपने माता -पिता की तरह ही वही गलती दोहराई। किन्तु आज भी मुझे ,जीवन भर यही ताना सुनने को मिलता है।'' मैं तेरे गू ,मूत में सोई ,तुझे अपना लहू पिलाकर बड़ा किया। नौ महीने तुझे लाधा '',ये शब्द सुनकर मेरा मन चीत्कार कर उठता है। मेरा दिल छलनी हो जाता है ,माना कि आपने जन्म दिया ,किन्तु सारी उम्र ये एहसान क्यों ? जैसे मैंने पैदा होकर कोई बड़ी  गलती कर दी हो , यदि मैं अपने कर्त्तव्य से विमुख होता हूँ ,तब वे मुझ पर एहसान जतला सकती हैं,या मुझे उन पलों को स्मरण कराएं ,जो हमें ''प्रेम की डोरी '' से बांधते हैं। किन्तु बात -बात में ,पैदा करने का  एहसान क्यों ?

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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