Rasiya [part 8]

 रामप्यारी अपने बेटे चतुर को, उस आम के बग़ीचे का किस्सा सुना रही थी - कि किस तरह,इस बाग़ में भूत का किस्सा बना ?रतनलाल जी यानि ,चतुर के ताऊजी ,पंडित जी से मिलने उनके घर पहुंच गए। पंडित जी ने अपने घर के बाहर ही ,उनका स्वागत किया। तब रतनलाल जी ने उनसे पूछा -आप ये कैसी बातें कर रहे हैं ?कि हमारे बाग़ को किसी की बलि चाहिए। 

तब पंडित जी ने उन्हें ,शांत रहकर ,मंदिर चलने का आग्रह किया और बोले - चलिए ! मंदिर में बैठकर आराम से बातें करते हैं। 

हम चलते हुए भी ,बातें कर सकते हैं ,अनमने से भाव से रतनलाल जी बोले। 

आप अपनी समस्या मुझे बताइये ! मैं सुन रहा हूँ। 

समस्या !तो हमारा वही बाग़ है , न जाने क्या हो रहा है ? फ़ल ठीक से नहीं आ रहा ,पेड़ भी सूखते से जा रहे हैं। 


तभी तो मैंने कहा -वो जमीन प्यासी है ,''बलि ''मांग रही है। 

ये क्या आपने बलि -बलि लगा रखा है ,ये सब ,बेफिज़ूल की बातें कर रहे हैं ? बलि ही चाहिए तो एक बकरे की बलि दे देंगे।

नहीं ,उसे तो इंसानी रक्त चाहिए ,जो तुम्हारे बहुत प्रिय हों ,उनका !

आप चाहते हैं ,मैं अपनी औलाद की बलि दूँ !ये आपने सोच भी कैसे लिया ? जिनके लिए हम जी रहें हैं ,उनके लिए ही तो ,इतना सब कुछ कर रहे हैं। उनकी 'बलि 'की हम सोच भी नहीं सकते। उनकी बलि दे कर हम कैसे और किसके लिए जियेंगे ,कोई और उपाय हो तो बताइये !वरना मैं ये बाग ही कटवा दूंगा। 

ऐसा अनर्थ भूलकर भी न करना ,न जाने क्या अहित हो जाये ?

ये क्या बात हुई ? झुंझलाते हुए रतनलाल जी बोले। व्यर्थ में ही मैंने ,ये बाग़ लिया ,सोचा था - वर्ष में एकमुश्त आमदनी आ जाएगी। घर के फ़ल खाने को मिल जायेंगे, मुझे क्या मालूम था ?ये बाग़ ''जी का जंजाल बन जायेगा। '' प्रत्यक्ष बोले - मैंने ऐसा किसी अन्य के मुख से नही सुना। बाग़  तो यहाँ और भी हैं। 

ये तुम्हारे पुरखों की निशानी है ,ये बहुत पुराना है ,इसने कई पीढ़ियां देखी हैं ,हो सकता है ,आपके ही किसी पूर्वज का कोई कर्म ऐसा रहा है ,जिसका ये ''मूक दर्शक'' रहा है। उसी का लाभ उठा रहा है। 

रतनलाल जी ने अपनी भौंहें सिकोड़ते हुए ,अपने मस्तिष्क पर जोर डाला आखिर हमारे किस पूर्वज ने ऐसा कुछ किया है ? जो मुझे ये सब देखना पड़ रहा है। उनकी स्मरणशक्ति जबाब दे चुकी थी ,कुछ भी स्मरण नहीं रहा ,सोचा ,हमारे गांव में ,कोई ऐसा बुजुर्ग तो होगा जो हमारी पुरानी पीढ़ी का कोई किस्सा उसे स्मरण होगा। 

क्या सोच रहे हैं ?पंडित जी ने पूछा। 

कुछ नहीं ,क्या कोई और उपाय नहीं है। 

हाँ ,ऐसा हो सकता है ,उनके बदले में कोई और अपनी जान देने के लिए तैयार हो जाता है ,तब भी काम चल सकता है। लो !मंदिर भी आ गया ,वहीँ आराम से बैठकर बातें करते हैं। 

किन्तु रतनलाल जी के मन में ,कुछ तो चल रहा था ,तब अचानक  पंडितजी से बोले -अभी मुझे एक आवश्यक कार्य स्मरण हो आया ,मैं आपसे बाद में मिलता हूँ। 

लीजिये ,मुझे इतनी दूर ले आये और अब स्वयं ही जा रहे हैं ,बिना कुछ कहे ,रतनलाल जी ने अपनी जेब में हाथ डाला और कुछ पैसे पंडितजी के हाथों  में थमा दिए। पंडित जी के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। उनके भी हृदयतल में कुछ ऐसा रहस्य छुपा था ,जो उन्होंने अभी तक किसी से उजागर नहीं किया। 

रतनलाल जी ,गांव में किसी ऐसे व्यक्ति के विषय में सोचते हैं ,चचा हरपाल के पास शायद मेरे सवालों का जबाब हो उनकी उम्र नब्बे वर्ष से ज्यादा की हो गयी है ,शायद हमारे ख़ानदान का कोई ऐसा किस्सा उन्हें स्मरण हो ,जो मेरी समस्या को सुलझा सके। 

तभी रामप्यारी को खर्राटों की आवाज सुनाई देती है ,उसने करवट बदलकर देखा ,तो चतुर सो गया था। लो, मुझे इसने कहानी सुनाने में लगा दिया और स्वयं सो गया। चतुर..... ओ चतुर सो गया क्या ?तब भी एक आवाज लगाकर जान लेना चाहती थी कि गहरी नींद में सोया है या नहीं। उसकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया न देखकर रामप्यारी ने भी करवट बदल ली।

कहानी सुनते -सुनते चतुर सो गया ,उसके सोने के पश्चात ,रामप्यारी भी सो गयी। अचानक चतुर को लगा ,जैसे उसे कोई पुकार रहा है। वह अपनी चारपाई से उठा और उसने अपनी छत से नीचे झांककर देखा। यह तो वही आंखें हैं ,जो उसने वहां बगीचे में देखी थीं। यह क्या मुसीबत है ? चतुर ने सोचा। तभी उन आंखों में न जाने कैसी चमक आई ? चतुर अब  मुस्कुरा रहा था। 

आओ ,चतुर !मेरे साथ आओ ! चतुर ने आव देखा न ताव '' तुरंत उसके करीब पहुंच गया। तुम कौन हो? चतुर ने पूछा -क्या तुम्हारी मां ने ,तुम्हें मेरी कहानी नहीं सुनाई , उसने प्रश्न किया। 

सुनाई है ,तब तुम क्या चुड़ैल हो ? 

लोग तो यही कहते हैं, किंतु जब मैं जिंदा थी तब उन लोगों से डरती थी किंतु आज लोग मुझसे डरते हैं कहते हुए हंसने लगी। वाह ,री दुनिया ! मुझ पर अपनी हैवानियत दिखा अब मेरे मरने के पश्चात भी ,मुझसे डरते हैं। 

पता नहीं, लोग तुमसे क्यों डरते हैं ? मुझे तो तुम अच्छी लगीं। 

क्योंकि मैं अच्छे लोगों के साथ, अच्छा व्यवहार ही करती हूं। 

आखिर तुम्हारे साथ क्या हुआ था ?तुम कैसे मरी या मारी गईं ?

तुम नहीं जानते ,यह सब बहुत प्राचीन धन -संपदा की बात है। 

प्राचीन धन -संपदा !यह तुम क्या कह रही हो ? या कहना चाहती हो। 

तुम अब भी नहीं समझे, यानी तुम्हारे पूर्वजों का खजाना ! मेरा साथी चला गया, अब मैं भी मुक्ति चाहती हूं।'' इंसान कर्म करते हुए नहीं डरता, उन कर्मों के परिणाम ,जब सामने आते हैं तो भागता है। 

किसने क्या कम किया ? मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा , वैसे यह तो बताओ !तुम कौन हो ? तुम भूत कैसे बनी ? तुम्हें किसने मारा ? बातें करते हुए ,तब तक वह बगीचा आ चुका था। चतुर के प्रश्न पूछने पर उसने चतुर की तरफ देखा और रोने लगी , बगीचे में अंदर घुसकर हंसते हुए बोली -यह स्थान अब मेरा है , सब कुछ मेरा है ,मेरा !मैं इसकी मालकिन हूं। 

कहते हुए अचानक उसकी आवाज भी बदल गई और वह डरावनी लगने लगी। उसके इस रूप को देखकर चतुर हिल गया और उसकी घिग्घी बंध गयी और वह चीख उठा -मम्मी !

राम प्यारी प्रातः काल उठकर ,अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त हो जाती है। बेटे की चीख सुनकर दौड़कर उसके करीब आई उसने देखा ,चतुर बुरी तरह डरा हुआ काँप रहा था। उसने अपने आंचल से अपने भीगे हुए हाथों को पोँछा  और चतुर के करीब आकर पूछा -क्या हुआ ? कहते हुए उसने ,उसे अपने गले से लगा लिया उसने चतुर के ललाट को छुआ तो तब उसे पता चला, यह तो बुखार से तप रहा है। अचानक इसे क्या हुआ सोचकर घबरा उठी। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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