जबसे ,चतुर आम के बाग़ से आया है ,उसके मन में घबराहट है। अपनी माँ से उस बाग के विषय में जानना चाहता है। रामप्यारी ने भी उसे डराने के उद्देश्य से कहा -कि उस बाग़ में चुड़ैल रहती है किंतु चतुर के मन में चुड़ैल के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न हुई ,आखिर वह चुड़ैल कौन है ,कैसी दिखती है ? रामप्यारी ने चुड़ैल तो अच्छी नहीं थी ,जो सुना था वह उससे बता दिया -सुना है ,जो उसकी आंखों में देखता है, उसे अपने सम्मोहन में करके अपने साथ ले जाती है।
मन ही मन चतुर सोच रहा था था -मैंने भी तो ,उसकी आंखों में देखा था किंतु उसने मुझे तो सम्मोहित नहीं किया, इसका मतलब वह 'चुड़ैल 'नहीं थी। तब वह कौन थी ? यह प्रश्न फिर से उसके मन -मस्तिष्क में गूंजने लगा , उसकी आंखें बहुत डरावनी थी। उन आंखों को सोचकर, वह घबरा उठा और अपना ध्यान हटाने का प्रयास किया। व्यर्थ ही ,मैं उस बगीचे में गया था। वह खाना खाकर चुपचाप उठा और अपने कमरे में चला गया। जितना भी उस ओर से ध्यान हटाने का प्रयास करता उतना ही ,वह दृश्य उसके सामने उभर कर आ रहा था।उसे लग रहा था ,वे आँखे अभी भी यहीं कहीं हैं और उसे घूर रही हैं। वह चारपाई पर लेट गया,अब उसने अपनी आंखें बंद कर लीं। उन आंखों ने उसे सम्मोहित सा कर लिया था, जो रह रहकर उसके सामने आ रही थीं। बेचैनी से कमरे में इधर-उधर घूमने लगा। तब तक माँ ने सम्पूर्ण कार्य निपटा दिया था। आज चतुर का मन कर रहा था कि वह मां के समीप ही ,अपनी चारपाई डाल दे। वैसे तो छत पर ही ,सब सोते थे, किंतु पढ़ते समय, चतुर अपने कमरे में पढ़ता था क्योंकि बाहर, कीड़े -मकोड़े, झींगुर इत्यादि आ जाते थे। पढ़ने का प्रयास किया किंतु मन नहीं लगा। उसने बाहर छत पर ही अपनी चारपाई डाल ली।
रामप्यारी ने पूछा- क्या तू आज पढेगा नहीं ? परीक्षाएं सिर पर हैं, कितना लापरवाह हो गया है ? पढ़ाई में तनिक भी ध्यान नहीं है। दो पेपर ही तो बचे हैं, अभी तीन दिन की छुट्टी बीच में है ,आप परेशान न हों मैं कर लूंगा ?
मैं ,क्यों परेशान होउंगी ? बस इम्तिहान में पास होना चाहिए।
हां ,हो जाऊंगा कहते हुए, वह वही चारपाई पर लेट गया।
कुछ देर शांत रहने के पश्चात, फिर से बोला -उस आम के बगीचे में, किस चुड़ैल का साया है ?
तू आज कैसी बातें कर रहा है ?जब से आया है ,आम के बगीचे की ही बात कर रहा है, कहीं तू वहां गया तो नहीं था।
नहीं -नहीं, मैं तो ऐसे ही पूछ रहा हूं।
तो कोई और बात कर........
नहीं ,मुझे उसी बगीचे की कहानी ही सुननी है ,आखिर वहां क्या हुआ था ? और वो चुड़ैल कोेन है ?
वो उस ''बाग़ की बलि ''है ?
कुछ न समझते हुए ,चतुर ने प्रश्न किया - ये 'बाग़ की बलि 'क्या होता है ?
ज़्यादा मैं भी ,कुछ नहीं जानती किन्तु सुना है ,जब यह बाग़ तेरे ताऊजी के हिस्से में आया ,तब न जाने क्या हुआ ?बेरौनक सा हो गया। इसके पौधे भी झुलसने लगे ,इससे आमदनी भी नहीं हो पा रही थी ,फ़ल आते तो सड़ जाते। तब तेरे ताऊ जी ने, इसको कटवाने का निश्चय किया और सोचा -इस बाग़ को कटवाकर इस पर खेती की जाएगी किन्तु हानि बहुत होगी। तब एक बार तुम्हारी ताई ने जाकर पंडित जी से पूछा -कि पंडित जी ! हमारे बगीचे में क्या परेशानी आ गई है ?
तब पंडित जी ने कहा -आपका यह 'बाग' बलि चाहता है।
पंडित जी !यह आप क्या कह रहे हैं और यह बाग़ कैसी बलि चाहता है ?उन्होंने पूछा।
जी हां ,किसी सम्पत्ति के लिए कई बार ऐसा करना होता है ,कोई -कोई सम्पत्ति उन्नति के लिए ,बलि मांगती है,या जो उसका उपयोग कर रहा है ,उसकी क़िस्मत में नहीं होती ,संयोग से मिल भी गयी तो अपना हिस्सा मांगती है ,इसमें गढ़ा हुआ ,धन भी हो सकता है। तब वो आगे बढ़ती है। बलि मिलने पर ,सफलता मिलती है।
तब क्या ताऊ जी ने बलि दी ?दी भी, तो किसकी दी ?
पंडित जी ने बताया-कि इस बाग में,किसी की बलि दी जाए, तो यह अच्छे से फलने -फूलने लगेगा।
आगे भी बताओ ! यह बात तो आप बता चुकी हो ,चतुर बेचैनी बोला।
शांत भी रहेगा ,बता तो रही हूं , जब तेरी ताई जी ने पूछा -इस बाग़ को किसकी बलि चाहिए ?
तब पंडित जी ने बताया -बड़े पुत्र की बलि चाहता है, और यदि विवाहित है तो दोनों दंपति की। यह सुनते ही तेरे ताई जी के'' पैरों तले जमीन खिसक गई।'' भला ऐसी धन -संपदा से क्या लाभ ? जिसमें अपने बेटे -बहू की बलि दी जाए।
यह बात, तेरी ताई जी ने, ताऊजी को बताई। वह तो इस चीज को मानते ही नहीं थे, और ताई जी से बोले -बेफिजूल की बातें ना करो ! तुम जानती ही हो ,हम ऐसा करेंगे ही नहीं , मैं इस बाग को ही कटवा दूंगा, उन्होंने अपना निर्णय सुनाया।
अच्छा तब क्या हुआ ? किंतु बाग़ तो आज भी है। जब पंडित जी ने सुना कि रतन लाल जी ,बाग कटवा रहे हैं , तब उन्होंने कहा -ऐसा भूलकर भी मत करना, वरना अनर्थ हो जाएगा।
यह क्या मुसीबत है ? जब आपस में, सब अलग हुए थे ,तब ताऊजी ने बाग ही चुना था अब उन्हें क्या पता था ? कि यह उनकी संपत्ति नहीं है।
यह क्या बात हुई, यह बाग़ तो,हमारे पूर्वजों का ही है ,किंतु तेरे ताऊ की किस्मत में नहीं था।
चतुर को इन बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था, किंतु इन बातों में दिलचस्पी जरूर आ रही थी और मन ही मन सोच रहा था -क्या ऐसा भी होता है ? उसके बाद क्या हुआ ?
तेरे ताऊ जी ने सोचा -कि पंडित ,हमें बहका रहा है, अपनी दान -दक्षिणा के लिए ऐसा कर रहा है , तब वह स्वयं पंडित जी के पास गए -राम-राम ,पंडित जी !
पंडित जी अपने घर से बाहर आए और हाथ जोड़कर बोले -रतन लाल जी !राम-राम कहिए !जजमान ,कैसे आना हुआ ?
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