Rasiya [part 6]

ए कलवा !देख मैं तुझे आम तोड़ कर दे रहा हूं, तू इन्हें  इकट्ठे करते जाना , लेकर भागना नहीं ,थोड़े से तुझे भी दे दूंगा और यदि तू लेकर भागा ,तो तू जानता है -तूझे ,तेरे घर में ही ,घुसकर पीटूंगा ,चेतावनी देते हुए ,चतुर पेड़ पर चढ़ गया। कलुआ अभी छोटा था ,चतुर से डरता तो नहीं था किन्तु चतुर की कद -काठी देखकर थोड़ी देर के लिए ,सहम सा गया। 

ठीक है ,भइया ! मुझे भी थोड़े से आम दोगे। 

हाँ ,दूंगा। अच्छा बता ,तुझे आम क्यों चाहिए ?

माँ ,आम की मीठी चटनी बहुत अच्छी बनाती है ,अपनी रसना को अपने अधरों पर फिराते हुए बोला। भइया !इन पेड़ों के मालिक ने देख लिया तो बहुत मार पड़ेगी। जल्दी ही आ जाना। 

हाँ -हाँ आ जाऊंगा ,तू चिंता मत कर ,ये मेरे ताऊ का बगीचा ही तो है ,किन्तु ताऊ लालची हो रहे हैं इसीलिए हमें आम तोड़ने नहीं देते ,किन्तु मैं भी तो ,उनका भतीजा हूँ ,आम तोड़कर रहूंगा,गर्दन हिलाकर मुस्कुराया  ताऊ ने ,ये बाग़ माली को दे दिया। अब उसकी जिम्मेदारी....... कहते हुए अपनी होशियारी पर हंसने लगा। 

वैसे शाम को तो पेड़ सो जाते हैं ,इस समय आम तोड़ने कौन आएगा ?शायद ,कोई भी दिखलाई नहीं दे रहा। भइया !मेरे दोनों हाथ भर गए और मेरी कमीज़ भी ,अब जल्दी से नीचे आ जाओ ! मैंने सुना है ,यहाँ भूत रहता है,शीघ्रता करो !


अच्छा ,बहुत अच्छे !जब अपने लायक आम टूट गए ,अपनी दोनों जेबें भर लीं तो अब मुझे भूत के नाम से डरा रहा है। तू भी क्या बातें करता है ? डरपोक कहीं का ,यदि यहाँ भूत होता तो क्या यहाँ माली टिक पाता ?मुझे डराने का प्रयास मत कर ,वरना जो आम तूने अपनी जेब में भरे हैं ,उन्हें भी छीन लूंगा। 

अच्छा नहीं कहूंगा ,आम छिन जाने के डर से कलुआ बोला -अब माली भी नहीं है ,अब शीघ्रता करो !आप तो बहादुर हो ,किन्तु मुझे तो ड़र लग रहा है। 

तेरा नाम कलुआ नहीं ,डरपोक होना चाहिए था ,कहते हुए चतुर जोर -जोर से हंसने लगा ,हँसते -हँसते उसे लगा ,जैसे कोई और भी हंस रहा है। कलुआ ,ये तू कैसे हंस  रहा है ? 

मैं तो नहीं हंस रहा। 

क्या तूने किसी के हंसने की आवाज सुनी ,हाँ ,सुनी तो है ,कहते हुए ,कलुआ भाग खड़ा हुआ। 

कलुये के भागते ही ,चतुर ने उसे आवाज लगाई -अरे...... ओ रुक जा ! मैं भी आ रहा हूँ। कुछ पलों में ही ,वह नजरों से ओझल हो गया। कितना चालाक निकला ?अपनी जेबें भरकर ,मुझे भूत का डर दिखाकर, भाग गया। दूर -दूर तक कोई दिखलाई नहीं दे रहा था।  अब चतुर का ह्रदय भी घोड़े की तरह चलने लगा। तभी उसे ऐसे लगा ,जैसे कोई सूखे पत्तों पर चल रहा है। उसने साहस करके इधर -उधर नजर दौड़ाई ,शायद कोई दिख जाये यदि माली हुआ तो कम से कम मरेगा ही ,या मेरी शिकायत मेरे पिता से कर देगा , किन्तु ये जो सूनापन और शांति डरा रही है ,इससे भयावह कुछ नहीं। वह आहिस्ते से नीचे उतरा ,और अपने आम समेटने लगा। तभी उसे फिर से हंसी की आवाज आई ,बहुत ही डरावनी थी। जैसे ही , उसने अपनी नजरें  उठाईं  ,उसने देखा ,कोई महिला खड़ी होकर ,उसे देख रही थी। उसे देखना नहीं कहते ,बल्कि घूर रही थी उसका चेहरा ढका हुआ था बस आँखें दिख रहीं थीं। उन आँखों को देखकर ,चतुर की घिग्गी बंध गयी और उसने ''आव देखा न ताव ''सिर पर पैर रखकर भाग खड़ा हुआ। '' डर के कारण ,अपनी चप्पलें पहनना भी भूल गया। उसके पैर में कंकड़ चुभे ,कांटे चुभे किन्तु उसने मुड़कर नहीं देखा। जब तक उसने गांव के अंदर प्रवेश नहीं कर लिया। गांव के अंदर घुसकर उसने एक दो आदमी को देखा ,तब उसे राहत महसूस हुई और उसने गहरी सांस ली और एक जगह बैठ गया। 

अरे चतुर यहाँ क्या कर रहा है ?जा अपने घर जा !बच्चे इतनी देर तक बाहर नहीं घूमते ,इससे पहले  कि वह उस व्यक्ति को देखता ,वह चला भी गया किन्तु आवाज से अंदाजा लगा लिया था। हमारे पड़ोसी रामवतार चाचा हैं। 

देर तक ,उन आंखों के विषय में सोचता रहा , कितनी  क्रूर और भयावह आंखें लग रही थीं , किंतु वह महिला कौन थी ? उसे तो मैंने कभी गांव में नहीं देखा। गांव के बड़े -बूढ़े ,स्त्री -पुरुष सबसे परिचित था। गांव ही कितना बड़ा था ? फिर वह महिला कौन हो सकती है ,क्या सच में ही कोई भूतनी थी ? कलुआ को  अब अपने पैरों के दर्द का एहसास हुआ। उसने अपने तलवों में से कांटे निकाले, जिनसे  रक्त चुचियाने लगा था । अब चतुर को आभास हुआ, कि वह अपनी चप्पल भी ,वहीं  बाग में छोड़ आया है। कहने को तो, वह बाग, अपने ही परिवार का है किंतु जैसे-जैसे परिवार बढ़ते चले गए, जमीन बाग -बगीचे सब बँटते चले गए और वह बाग ताऊ जी के हिस्से में आया। जो हमेशा गुस्से में ही दिखाई देते हैं , न जाने ,उन्हें क्या परेशानी है ? चतुर कभी समझ नहीं पाया , कभी उन्हें प्रसन्न होते हुए उसने नहीं देखा। उसने अपने निक्कर में जो आम भरे थे , और कमीज की जेब में थे , पहले तो सोचा -इन्हें यही फेंक दूं! फिर सोचा-जब इतनी मेहनत की है तो घर ले जाता हूं। 

रामप्यारी चूल्हे पर रोटी बना रही थी, चतुर को देखते ही बोली -न जाने कहां घूमता रहता है ? अब आ गया है ,तो रोटी खा ले। चतुर चुपचाप अपने पैर धोने चला गया , और आम निकालकर एक टोकरी में रख दिए। चतुर को इस तरह चुपचाप देखकर रामप्यारी को थोड़ा, एहसास हुआ ,जो बच्चा इतना चंचल है। आज कैसे शांत है ? चतुर क्या कुछ हुआ है ?

नहीं तो....... चतुर ने संक्षिप्त सा जवाब दिया। अब वह कैसे कहे कि वह आम के बगीचे में गया था और वहां उसने किसी को देखा। हो सकता है ,इस बात के लिए उसे डांट भी पड़े इसलिए बोला -नहीं ,आप रोटी दे दीजिए। 

खाना खाते हुए ,अपने को थोड़ा, हल्का महसूस कर रहा था तब उसने अपनी मां से पूछा -मुझे लगता है ,रात के समय बाग में कोई नहीं रहता। 

तुझे क्या करना है ? रात में तो माली भी नहीं रहता , कहते हैं - वहां  एक चुड़ैल रहती है। डर के कारण, उस बाग में कोई नहीं जाता। तू यह सब क्यों पूछ रहा है ? 

वैसे ही पूछ रहा था , चुडैल कैसी होती है ?

तू पगला है ,क्या ? मैंने कभी किसी चुड़ैल को नहीं देखा, सुना है, उसके पर उल्टे होते हैं , और उसकी आंखें....... कह कर रामप्यारी चुप हो गई। 

आंखें क्या ?

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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