कितना अच्छा लगता है ? काली-काली चौड़ी सड़कें, आसपास ऊंचे ऊंचे मकान , जिंदगी भाग रही है ,दौड़ रही है ,उन काली नागिन सी सड़कों पर, टिन के उन महंगे डिब्बों में। आधुनिक युग है ,आधुनिक युग में इंसान कितनी उन्नति कर चुका है ? आज यहां से वहां, कुछ घंटे में ही पहुंच जाता है। एक पल का भी आराम नहीं है, रात- दिन भाग रहा है ,दौड़ रहा है ,अपने सपनों के पीछे ..... कई बार तो ऐसा लगता है ,न जाने वह क्यों दौड़ रहा है ? क्यों इतना हैरान -परेशान है ? कहां पहुंचना चाहता है ? कभी आज के हालात देखते हुए लगता है ,कि वह बहुत उन्नति कर रहा है ,आगे बढ़ रहा है या पीछे जा रहा है ,कुछ समझ नहीं आता।
दिन पर दिन गर्मी बढ़ती जा रही है , सड़कें गर्म तवे की तरह तप रही हैं। उन पर भी, आदमी उछलता हुआ , अपने सपनों से विवश दौड़ रहा है। क्या कभी उसने सोचा है? यह कैसी उन्नति है ? खेत -खलियान, पेड़ पौधों से समझौता ,करके वह आगे बढ़ रहा है। उन सड़कों पर, ए.सी. गाड़ी में जाता है। दूर-दूर तक कहीं भी ,पेड़ पौधों का निशान भी नहीं दिखाई देता है। एक पेड़ की छाया नहीं दिखाई देती कि उसके नीचे बैठकर , क्षण भर को इंसान आराम भी कर ले। गाड़ी वाले तो निकल जाते हैं ,उस भट्टी सी तपती उन सड़कों पर, वे गाड़ियां भी ,ऐसा प्रतीत होता है जैसे गर्म तवे पर , खील पकती हैं।
कुछ लोग प्रसन्न मुद्रा में दिखाई देते हैं, क्योंकि कभी उनके पास पैसा नहीं था उनके लिए ,सौ रूपये भी भारी पड़ जाते थे। लाखों की तो वह कल्पना भी नहीं कर सकता था। उस इंसान के पास पैसा नहीं दिखता था किंतु उसके पास प्राकृतिक साधन, सब कुछ था। आज का इंसान! उसके पास पैसा बहुत है ,आज वह लाखों में ही नहीं ,करोड़ों में खेल रहा है ,प्रसन्न भी है। उसके पास पैसा जो आ गया है, कुछ लोगों ने अपनी जमीनें बेच दी हैं, और कुछ की जमीनें सरकार ने ले ली हैं। जिन स्थानों पर दूध देने वाली गैया नजर आती थी ,आज उन स्थानों पर ,कई -कई गाड़ियां खड़ी नजर आ रही हैं। मेहमान को दूध पिलाना गर्व की बात समझते थे। अब कोला की बोतलें खुलती हैं। अपनी पैतृक संपत्ति, जिसके लिए कभी पैतृक संपत्ति को बेचना , अपमान की बात समझते थे। आज उनकी नई पीढ़ी उस संपत्ति को बेचकर करोड़पति हो रही है।
दुःख का विषय यह नहीं कि संपत्ति बिक रही है बल्कि, हरियाली, हरे -भरे पेड़ों की भी सुरक्षा नहीं हो पा रही है। वे भी तो नष्ट हो रहे हैं ,दूर-दूर तक देखने पर भी, कोई-कोई पेड़ या पौधा दिखाई देता है। दिन प्रतिदिन, गर्मी बढ़ती जा रही है। सूरज का प्रकोप, बढ़ता जा रहा है ,उसे कोई रोक नहीं पा रहा है । किंतु क्या इंसान ने एक बार भी सोचा है ? यदि यह प्रकृति न रहेगी तो वह इस पैसे का क्या करेगा ? ऑक्सीजन मास्क खरीदेगा। पेड़ -पौधे ना रहेंगे, साग , भाजी -तरकारी, अन्न कहां से उत्पन्न होगा ? तब वह क्या खाएगा ? बड़े-बड़े होटलों में जाता है ,रेस्टोरेंट में जाता है आज उसके पास पैसा है. तो कोई परेशानी नजर नहीं आती किंतु उसने सोचा है -वह अपनी आने वाली पीढ़ी को क्या देकर जाएगा ?
उसने तो पैतृक संपत्ति बेच दी, उससे धनोपाजर्न कर लिया। आज उसके पास मकान है, गाड़ियां हैं। किंतु उसके बच्चे क्या करेंगे ? चहुं और, कंक्रीट का जंगल दिखाई देता है, सभी को अपना न्यारा घर चाहिए। धूप की तपिश दिखाई देती है। तवे जैसी वे कई लहराती सड़कें दिखलाई देती हैं। ऐसे में यदि किसी की तबीयत बिगड़ जाती है। वह इंसान कहां जाएगा? दूर-दराज़ तक कोई इंसान ,सहायता के लिए भी नहीं दिखलाई देता। वे गाड़ियां वे बंगले सब रखे के रखे रह जाएंगे। आज भी ऐसे इंसान हैं ,जिनके पास ये सहूलियतें नहीं हैं ,वो इस गर्मी को कैसे झेल रहे होंगे ?
ऐसा नहीं ,कि पहले लोग परेशान नहीं थे , पहले भी लोगों को परेशानी होती थी। उन्होंने आर्थिक तंगी देखी है , किंतु उनके रिश्ते ,उनके साथ थे उनके अपने उनके पास थे। किंतु आज इंसान कितना अकेला हो गया है ? ''रिश्ते हैं ,पास नहीं , दिखते हैं ,साथ नहीं।'' बहुत कुछ बदल रहा है, जो गली -मोहल्ले कभी बच्चों की किलकारियों से गूंजते थे , आज वही गली -मोहल्ले सूने हो गए हैं। धनोपाजर्न के लिए, लोग बाहर जा रहे हैं ,बड़े-बड़े शहरों में जा रहे हैं और यहां भी बात नहीं बनती है तो विदेशों में जा रहे हैं। बुजुर्ग माता-पिता जो कभी पोते -पोतियों से घिरे रहते थे। आज अपनी कोठियों की खिड़कियों से झांकते रहते हैं कि कोई इंसान दिख जाए। कोई तो ऐसा इंसान हो ,जो उनसे दो पल, बांट ले।
उन्नति करना कोई बुरी बात नहीं है, उन्नति करनी चाहिए किंतु ऐसा न हो कि हम ,अपनी संतानों को धरोहर के रूप में कुछ भी न दें पाए , आज जो धन हमारे पास हैं , वह कुबेर का खजाना नहीं ,कभी तो समाप्त होगा। हर इंसान नौकरी के लिए भागता है ,इतनी नौकरियां कहां से आएंगीं ? हर व्यक्ति में, शिक्षा का कौशल नहीं होता, हर व्यक्ति कलाकार नहीं होता ,सबकी अपनी -अपनी रुचि होती है। अपनी -अपनी कुशलता होती है। पहले बच्चा पढ़ नहीं पाता था , तो माता-पिता को रहता था अपनी पैतृक संपत्ति तो संभाल ही लेगा। आजकल एक या दो बेटे होते हैं, उनके भविष्य के लिए, रात -दिन एक कर रहा है ,परेशान रहता है। धनोपाजर्न भी कर रहा है, किंतु आने वाले समय में क्या वह उनके लिए ऑक्सीजन, भी खरीद कर रख जायेगा । पीने का पानी, जिसका स्तर धीरे-धीरे घटता जा रहा है , उसकी पूर्ति क्या वह धन कर पाएगा ?
मात्र कुछ लोग ही, पर्यावरण के लिए चिंतित हैं, और प्रयासरत भी हैं। किंतु आज के समय को देखते हुए लगता है। यह कार्य कुछ लोगों से नहीं चलेगा वरन अब सभी को सोचना होगा। इन सड़कों पर जिंदगी दौड़ेगी ,भागेगी किंतु जीवन होना भी तो चाहिए। घर के आसपास, दो-चार पेड़ लगाने से कार्य नहीं चलता। पहले बड़े-बड़े घर होते थे, उसमें न जाने कितने परिवार खप जाते थे ? एक साथ दस बीस लोग रहते थे। जिनके बड़े घर हैं,आज भी, एक साथ कई -कई लोग रहते हैं। जो किराए से पैसा कमाते हैं, जो लोग शहर में कमाने के लिए आए हैं। उनके रहने का स्थान बनाते हैं। अनजान लोगों के साथ रहने के लिए तैयार है, किंतु अपने रिश्ते नहीं सुहाते हैं। अकेले और अलग रहकर, इंसान परिस्थितियों से जूझता है , जिंदगी से लड़ता है किंतु अपनों के साथ नहीं रहना चाहता क्योंकि उसकी सहनशक्ति ही समाप्त हो गई है, स्वार्थ की भावना बलवती हो चुकी है।
आज इंसान प्रसन्न तो नजर आता है, किंतु अब भी उसे आराम नहीं है, सुकून नहीं है। इस भट्टी से जीवन में झुलस रहा है , वह नहीं जानता उसे कहां जाना है ? वह क्या चाहता है ? बस दौड़ रहा है ? यहां से वहां, देश से विदेश !अपने लोगों से और अपने आप से दूर.......

