मां की पकड़ से बचकर, उनसे बचते -बचाते हुए ,जैसे भी चतुर, अपने विद्यालय पहुंचा तब वहां गुरु जी ने ,उसे घेर लिया। हालांकि चतुर ने अपनी चालाकी ,चतुराई तो बहुत दिखलाई , किंतु उनके सामने एक भी चतुराई काम न आई। उसके झूठ बोलने पर, उसे मार और पड़ी। धीरे-धीरे गुरु जी की दी हुई मार का ,जैसे-जैसे दर्द कम हुआ, उसको तो वह भूल गया किंतु अब उसे घर जाने की चिंता सताने लगी। वह जानता था ,मां उसके कारण सारे गांव में डोलती फिर रही थी। थक भी गई होगी, उसे हमेशा मेरे भविष्य की चिंता सताती रहती है। क्रोध आना स्वाभाविक है। जिसमें कि उसके विद्यालय के छात्रों ने तो उसे और भी भड़काया होगा। अब वह घर कैसे जाए ? यही जुगत लगा रहा था ,घर जाने पर मां से मार ना पड़े। अब घर जाना तो है ही, 'मरता क्या ना करता' ? बस्ता उठाकर धीरे-धीरे लंगड़ाते हुए ,पैरों से वह घर की ओर प्रस्थान करता है।
रामप्यारी गृहकार्य तो कर रही थी ,किन्तु आज चतुर पर भी 'ग्रह 'आ गयी थी। क्रोध में भरी बैठी थी ,और उसकी प्रतीक्षा में थी। घर पर पति यानि चतुर के पिता भोजन करने आये ,पत्नी का तमतमाया चेहरा देखकर ,समझ गए अवश्य ही कुछ हुआ है। उन्होंने पूछा -आज क्या हुआ है ? जो तुम्हारे चेहरे पर क्रोध की छाया नजर आ रही है।
मेरे क्रोध का कारण ,कौन हो सकता है ?तुम्हारा वही लाडला ! चतुर ! अपने को बड़ा चतुर बनता है। आज उसके कारण मैं सारे गांव में धक्के खा रही थी। भोजन की थाली उनके आगे रखते हुए ,रामप्यारी बोली।
उसने ऐसा क्या कर दिया ? रोटी का पहला कोर मुँह में डालते हुए , रतनलाल जी बोले।
ये पूछो ! क्या नहीं किया ?
चलो ,वही बता दो !उसने क्या नहीं किया ?मुस्कुराते हुए बोले।
आपको मस्ती -मजाक सूझ रहा है ,मुझे इस लड़के के लक्षण ठीक नही दीखते ,इस तरह ही उसकी लापरवाही रही तो परीक्षा में न बैठ पायेगा। आप जानते हैं ,आज गांव के मैदान में ,हरिराम के साथ गुल्ली -डंडा खेल रहा था। उससे कितनी बार कहा ? ये ''गुल्ली -डंडे ''का खेल मत खेला कर ,छह महीने पहले रामचरण के लौंडे के माथे में कितनी चोट आई थी ? आँख फूटने से बची ,अपने हाथ से अपने माथे पर वो स्थान दिखते हुए बोली -यहाँ थी चोट ,यहाँ ! यदि उसकी आँख फूट जाती तो क्या होता ?वो तो ज़िंदगीभर को गया ,दोनों हाथों इशारा करते हुए बोली।
बच्चे हैं ,खेलते हैं ,तो चोट भी लगती है , खेलते -कूदते बच्चे ,इसी तरह तो मजबूत बनते हैं।
फिर चाहे किसी की आँख -नाक फूट जाये ,रामप्यारी ने प्रश्न किया ,चलो ! दूर कहाँ जाना ?यदि हमारा ही बेटा होता तो.......
उसे पति का अपने बेटे की हिमायत लेना पसंद नहीं आया। रामप्यारी अपने जमाने की आठवीं जमात पास महिला है। जिस समय में लड़कियों को चिट्ठी -पत्री लिखने लायक पढ़ा दिया जाता था। गांव के ही विद्यालय से पांचवी या छठी कर लेती थीं। उस समय में रामप्यारी ने आठवीं पास की थी, इस बात का उसे घमंड भी था। इस घमंड के चलते, वह चाहती थी, कि मेरा बेटा भी और ज्यादा पढ़े और शहर में रहे। 'गांव में कुछ जिंदगी नहीं है। शहर में रहकर ही उसकी जिंदगी बन सकती है। उसका यह सोचना था -इसलिए वह चतुर की पढ़ाई पर विशेष ध्यान देती थी। किंतु चतुर पढ़ाई के प्रति लापरवाह था , गांव के दोस्तों के साथ मिलकर लापरवाही करता रहता था। खेल में लगा रहता था, ऐसे में जब उसने अपने पति से चतुर की शिकायत की , तो रामप्यारी को अपने पति का समर्थन करना भी पसंद नहीं आया।
रतन लाल जी जानते थे, यह जितनी भी पढ़ी है, इसमें अहंकार बढ़ गया है , हालांकि आता -जाता कुछ नहीं है गांव के लोगों की जिंदगी को जिंदगी ही नहीं समझती है। बस इसका अपना सोचना है ,यह सोचकर बात को घुमा देते हैं। अभी उन लोगों में यही बातें हो रही थीं। तभी घर की दुबारी [ घर के अंदर , मुख्य द्वार में घुसते समय जो स्थान होता है , उसे दुबारी कहते हैं ]में, आहट सी हुई। रामप्यारी ने घड़ी में समय देखा, और समझ गई विद्यालय की छुट्टी का समय हो गया है , चतुर ही आया होगा। पति से बातचीत करके उसके मन का क्रोध तो काम हो गया था। किंतु हल्की-फुल्की नाराजगी अभी भी बाकी थी। दोनों पति-पत्नी आंगन में ही थे , और उनकी दृष्टि आने वाले व्यक्ति की तरफ थी , अंदाजा लगा रहे थे ,कि कौन आ रहा होगा ? तभी रामप्यारी ने देखा , बस्ते को लटकाए हुए, लड़खड़ाते से कदमों से , चतुर ने आंगन में प्रवेश किया। उसकी हालत देखकर लग रहा था ,जैसे वह बहुत ही परेशान है, शायद पेेर में भी चोट लगी है ,अंदाजा लगाया।
रामप्यारी अपना क्रोध भूल गई, और उसकी तरफ दौड़ी ,और चतुर से बोली -क्या हुआ ?
चतुर ने मां का चेहरा देखा और समझ गया, कि उसका अभिनय अच्छा रहा , उसने अपने चेहरे को और लटका लिया, और व्यथित स्वर में बोला -आज कुछ मत पूछो ! मास्स साहब ! ने तो जान ही निकाल दी। हम लोग पढ़ने के लिए जाते हैं या उनसे मार खाने के लिए , मेरा गला सूख रहा है , कहते हुए ,पास पड़ी चारपाई पर लेट गया और बस्ता एक तरफ फेंक दिया। रामप्यारी को लगा ,आज मास्स साहब ने ,इसकी बहुत ही ज्यादा पिटाई कर दी है। दौड़कर गई और एक गिलास पानी ले आई, बेटे को हाथ पकड़ कर उठाया, और अपने हाथों से उसे पानी पिलाया। चतुर ने भी थोड़ी चैन की सांस ली, और मां की गोद में सिर रखकर बोला -मैं तो अपने विद्यालय ही जा रहा था , हरिराम ने मुझे चुनौती दे डाली। कहने लगा -आज तू मुझसे जीतकर दिखा, उसका इस तरह ललकारना,मुझसे बर्दाश्त न हुआ। मैंने भी उससे कह दिया, मैंने भी अपनी मां का दूध पीया है ,तुझे तो हराकर ही रहूंगा। फिर चाहे मुझे, मार ही क्यों ना पड़ जाए ? तभी तो खेलना आरंभ किया था और तभी मास्स साहब के वह चमचे, तुम्हें लेकर मेरे पीछे-पीछे आ गए।
मैं जानता था ,मेरी मां को कष्ट हो रहा होगा, किंतु मैंने सोचा-माँ तो वापस चली जाएगी किंतु देर से पहुंचने पर मास्स साहब ,मुझे बहुत मारेंगे, इसलिए मैंने विद्यालय जाने के लिए दौड़ लगा दी। मुझे क्या पता था ? गांव के चुगलखोर !जो मेरे दोस्त बनते हैं , उन्होंने पहले ही मास्स साहब से मेरी चुगली लगा दी और मास्स साहब ,ने मेरी क्या हालत की है ?यह मैं ही जानता हूं। मां की गोद से निकलकर, चारपाई पर फैल गया।
अब रामप्यारी अपने आप को कोस रही थी , मैं भी इसके पीछे पड़ी रहती हूं , हमारा एकलौता बेटा है ! न जाने कैसे-कैसे परेशानी झेल रहा है ? मास्स साब को तो मैं नहीं छोडूंगी , मेरे बेटे की क्या हालत कर दी ? कहकर हल्दी वाला गर्म दूध लेने चली गई।

