आज जब चतुर, अपने स्कूल से आया तो अत्यंत ही प्रसन्न था। माँ तो उसका चेहरा देखते ही समझ गई थी आज का पर्चा ठीक गया है, फिर भी चतुर को देखकर बोली -इम्तिहान ठीक से हो गया।
हां मुस्कुराते हुए चतुर बोला -ज्यादा कुछ नहीं था, बहुत ही आसान था।
सब समझती हूं, शिक्षा तो सभी आसान ही हैं ,जब तक सब समझ में आता है ,आसान ही लगता है, और जब समझ में न आए तो कठिन हो जाती है ,पर्चे में सभी सवाल याद किए हुए आए होंगे, इसलिए पेपर भी अच्छा गया वरना इन तीन दिनों में, तेरी कुछ विशेष पढ़ाई तो हुई नहीं थी।
मां की बात सुनकर चतुर बोला -हां ,यह बात भी सही है , पहला याद किया हुआ ही आया था ।
इसीलिए तो कहते हैं, कि पहले ही याद करके रख लेना चाहिए, परीक्षा के नजदीक तो सिर्फ दोहराना ही होता है। अब तू ही सोच ,यदि पहले से याद किया हुआ न होता, तो क्या होता ? रामप्यारी कहकर मुस्कुराई और चतुर की तरफ देखने लगी। अब इस बात का चतुर क्या जवाब दे ? अब जाकर कपड़े बदल ले, और तेरे लिए खाना लगाती हूं ,खाना खा लेना !
कुछ समय पश्चात ही ,चतुर अपने कपड़े बदलकर आ जाता है, और खाना खाने के लिए बैठ जाता है। मां ने '' लौकी के कोफ्ते ''बनाए थे,चूल्हे पर गरमा गरम, घी चुपड़ी रोटियां सेक रही थी। एक कटोरी में उन्होंने कोफ्ते रखें और थाली में कुछ प्याज के, टुकड़े और ताजा मटठा, साथ में लोनी घी भी रख दिया।
मैं इतना सब नहीं खा पाउंगा, चतुर ने थाली देखकर कहा।
क्यों इसमें ऐसी क्या चीज है, जो तुझे पसंद नहीं है ,सब तेरी पसंद का ही बनाया हुआ है। बुखार हुआ था, यदि यह सब नहीं खाएगा तो ताकत कैसे आएगी ? अभी तुझे गांव में भी घूमना है, दो -चार मुसीबतें मोल लेनी हैं ,मां ने उस पर व्यंग्य किया।
अब इतना कहां जाता हूं ?पहला कौर मुंह में डालते हुए चतुर बोला। खाना खाते समय, मां उसे बात नहीं करने देती ,वह चुपचाप खाना खाने लगा किंतु दिमाग भी तो खाली बैठने का नाम नहीं ले रहा था। तुरंत ही दिमाग ने, कल वाली बात को पकड़ लिया और उसी के विषय में सोचने लगा। कल पिता ने जो कहानी सुनाई थी, उसमें आगे क्या हुआ था ? क्या यह कहानी है ?या सच ! कहानी तो नहीं हो सकती, इतना बड़ा झूठ तो कोई नहीं बोलेगा और वह भी अपने परिवार के लिए ,इस कहानी में सच्चाई तो है। यदि यह कहानी सच्ची है ,तो फिर इसमें आगे क्या हुआ ?वह महिला है या सच में ही भूत है ,कौन है ? किसका है ?उन तांत्रिक बाबा ने, उस आत्मा को वहीं कैद करके ,वह धन वापस क्यों नहीं लिया ? अनेक प्रश्न उसके मन में कुलबुलाने लगे और वही भाव उसके चेहरे पर भी आने लगे।
रामप्यारी भी रोटी बनाते हुए, चतुर को ही देख रही थी और बोली -क्या सोच रहा है ?
कुछ नहीं, तेरी मां हूं, स्पष्ट शब्दों में बोली- सब जानती हूं कि तू कहां और क्या सोच रहा होगा ?
चतुर को मां के इन शब्दों से, उनकी परीक्षा लेने का मन किया और बोला अच्छा बताओ ! मैं क्या सोच रहा था ? आप तो माँ हो, मन की बात पढ़ लेती हो , बताओ क्या सोच रहा था ? पूरे आत्मविश्वास के साथ बोला।
तू कल वाली ही बात सोच रहा है , तेरे पिताजी ने , जो कहानी सुनाई थी ,उसी के विषय में, तेरा चेहरा पढ़ कर बता सकती हूं। इस समय चतुर को अपनी मां सच में ही ,जादूगरनी नजर आई। सच तो कह रही हैं , मन में सोचकर उसने नज़रें नीचे कर लीं।
उसे चुप होते देख रामप्यारी बोली -ला, मेरा इनाम !
इनाम ,कैसा इनाम ! तूने कहा था ,यदि आप मन की बात बता दोगी।
अच्छा-अच्छा समझ गया , अक्सर मां -बेटा इस तरह की पहेलियां बुझाते रहते हैं , और कभी-कभी शर्त भी लगा लेते हैं , रामप्यारी आज उसे बात को बताने से पहले शर्त नहीं लगा पाई ,इस बात का उसे दुख हुआ । अच्छा !जो मैं कहूंगी ,वही करना।
आप क्या कहेंगीं ? पढ़ने के लिए ही कहेंगी, रामप्यारी के वह घिसे -पिटे संवाद चतुर पहले से ही जानता है। अच्छा एक बात बताइए ! मां क्या यह कहानी सच हो सकती है ?
तुम्हारी पीढ़ी दर पीढ़ी यह कहानी चली आ रही है। इसमें झूठ क्या होगा ? क्या हमारे बहुत पहले वाले दादाजी के पास इतना धन था कि उन्हें जमीन में गाढ़ना पड़ गया ?
हां पहले लोगों के पास धन होता था, तो जमीन में ही ,गड्ढा बनाकर छिपा दिया करते थे। उस समय बैंक तो होते नहीं थे। रामप्यारी ने उसे विस्तार से समझाया।
न जाने कितना खजाना होगा ? कल्पना करके चतुर सोच रहा था।
वे उस खजाने से गांव के लोगों की सहायता करना चाहते थे, अब तुम ही सोचो ! सम्पूर्ण गांव की सहायता के लिए ,कितना धन होना चाहिए? या इस गांव की उन्नति के लिए कितना धन होगा ?
उस धन में ,ऐसा क्या होगा ?
मतलब! मैं कुछ समझी नहीं।
मेरा मतलब है ,कि उस धन में, ऐसे कागज के नोट तो होंगे नहीं, नहीं तो वे गल नहीं जाएंगे। उसकी बात सुनकर रामप्यारी हंसने लगी और बोली -उस समय पर ये नोट चलते ही नहीं थे ,उस समय सोने और चांदी के सिक्के चलते थे। क्या तूने अपनी किताब में नहीं पढ़ा ?पुराने समय में ,क्या चलता था ?यदि सिक्के भी हुए, वह भी बहुत सारे होंगे और साथ ही ,हीरे -मोती भी हुए तो हम उसकी कीमत का अंदाजा भी नहीं लगा सकते। मन ही मन चतुर अपने आप पर गौरवान्वित हुआ ,कि मेरे पूर्वजों के पास इतना धन था या आज भी है किंतु तुरंत ही उसकी मां उसके , अहंकार को नीचे ले आयी, बोली -हम उसका उपयोग तो कर ही नहीं सकते हैं।
अच्छा एक बात और पूछूं !
जब से पूछ ही तो रहा है ,एक और पूछ ले, किंतु खाना खाने के पश्चात थाली वहीं रख कर आना ,जहां झूठे बर्तन पड़े हैं ,यही मत छोड़ देना ,रामप्यारी ने उसे चेतावनी दी।
चतुर ने हमें गर्दन हिलाई, और बोला- दादाजी न उस तांत्रिक के कहने पर, उस धन को क्यों नहीं निकलवा लिया ? आज हम कितने अमीर होते हैं ?
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