Rasiya [part 13]

निर्भय सिंह, एक तांत्रिक बाबा के पास जाता है और वह उनसे अपनी समस्या बतलाता है। वह बाबा उससे पर बहुत नाराज होते हैं और कहते हैं - 'जब किसी शिक्षा का उचित ज्ञान नहीं था , तब तुमने उसका  दुरुपयोग क्यों किया ? वह बाबा से क्षमा याचना करता है और अपने धन को प्राप्त करने का आग्रह करता है। तब बाबा उससे कहते हैं ? कि वह व्यक्ति भी, अब तुम्हारी बलि चाहता है। यह बात सुनकर निर्भय सिंह परेशान हो जाता है। अब उसे एहसास होता है कि उसने गलती तो की है, किंतु इसका कोई उपाय तो होगा। 

तब बाबा उससे कहते हैं-एक ही उपाय है , तुम उसे अपने रक्त की कुछ बंदे देकर, उसके अतृप्त मन  को शांत करो ! उसके क्रोध की ज्वाला को शांत करो !

इस बात से निर्भय सिंह घबरा जाता है , और कहता है - बाबा ! यह सब मुझसे नहीं होगा। उसे तो लग रहा था ,उसने जो भी सीखा वह भी भूल गया। उसका साहस जबाब दे रहा था। 



तब बाबा कहते हैं -तब तुम अपने उस धन को भूल जाओ ! और जो भी उस स्थान के करीब आएगा वही मारा जाएगा, वही उसके कोप का भाजन बनेगा क्योंकि वह तुम्हें ढूंढ रहा है। तुमने उसे पहरेदार तो बना दिया किंतु साथ ही उसका अधिकारी भी बना दिया। उससे पहले ही वचन भरवा लेना था, कि जब भी मुझे इस धन की आवश्यकता होगी तब मैं ,कभी भी वह धन आकर ले जा सकता हूं। 

तब निर्भय सिंह, उनसे अनुनय - विनय करके, अपने गांव चलने के लिए कहता है , उसे लगता है, कि यह बाबा इतने पहुंचे हुए हैं ,कि कुछ न कुछ उपाय ढूंढ ही लेंगे। बाबा अपने स्थान से जाना तो नहीं चाहते थे ,किंतु निर्भय सिंह का निवेदन ठुकरा ना सके और उसके गांव पहुंच गए। 

जब उन लोगों ने गांव के अंदर प्रवेश किया, तब वह समझ गए, कोई प्रबल छाया उनके गांव की ओर बढ़ रही है। 

चंदा साहब ने अपने पुत्र को किसी तांत्रिक के साथ देखा, तो समझ गए अवश्य ही कोई बड़ी बात है। भोजन करने के पश्चात ,उन लोगों ने आपस में वार्तालाप किया और जब उन्हें पता चलता है कि निर्भय सिंह क्या अनर्थ कर चुका है उन्हें बहुत दुख होता है और तब वह तांत्रिक बाबा से कहते हैं -आप चाहें ,तो मैं अपने प्राणों की आहुति देने के लिए तैयार हूं। यह मेरा ही परिवार है, मैं अपने पुत्र की गलतियों के लिए, मैं उस आत्मा से क्षमा याचना करूंगा ,हो सका तो मैं अपने प्राणों का बलिदान कर दूंगा। 

तब तांत्रिक बाबा उस स्थान पर गए, जहां पर वह धन गाढ़ा गया था। एक निर्जन स्थान जहां पर कोई इक्का-दुका ही आ सकता है। उसमें गुफा जैसी बनाई गई थी और उस गुफा के अंदर वह धन गाढ़ा गया था। ऐसे स्थान पर जीव -जंतु बहुत अधिक मात्रा में हो जाते हैं। ऐसा ही वहां कुछ लग रहा था। बाबा  जैसे ही उस बनाई हुई गुफा के समीप गए। उन्हें एक बहुत तेज जोरदार झटका लगा, और दूर जाकर गिरे। कुछ देर पश्चात ,फिर दाईं तरफ से आगे बढ़े ,तब वही परिणाम हुआ। उसके पश्चात बांयी तरफ गए किन्तु वहां भी वही परिणाम निकला। तब वह समझ गए, यह आत्मा बहुत ही ताकतवर है। ''बदले की भावना ''से धधक रही है। डर के कारण निर्भय सिंह तो उन लोगों के साथ आया ही नहीं था। चंदा साहब और बाबा ही थे। उसने एक निश्चित जगह तय कर दी थी, कि इसके आसपास कोई नहीं आ पाएगा। बाबा ने, जहां तक उसके प्रकोप का असर नहीं था उसके उस घेरे से बाहर ही, अपना डेरा जमाया और अपना कार्य करने लगे। वह उस आत्मा से  बात कर उसे शांत करना चाहते थे। 

कुछ मंत्रोच्चारण के पश्चात ,वह उनसे बात करने के लिए तैयार हुआ।वो अपनी सीमा से बाहर आ , चंदा साहब के तन में प्रवेश कर गया। अत्यंत क्रोधित वो आत्मा भी रो रही थी ,अपनों के लिए....... उसने कह दिया था ,उनका धन सुरक्षित है ,किन्तु उन्हें नहीं मिलेगा। ये उसका उपयोग नहीं कर पायेंगें।

तुम चाहो तो,इनकी जान ले जा सकती हो ,ये सहर्ष तैयार हैं। 

नहीं ,मैंने शैतान की भूख मिटाई है ,अब वो [निर्भय सिंह ]मेरी आत्मा को शांति प्रदान करेगा। किसी भी बात के लिए वो तैयार नही  हुआ। जबरदस्ती का परिणाम ''निर्भय सिंह ''देख चुका था। किसी ने धन के लालच में ऐसा किया भी ,उसे धन मिलना तो दूर ,वो उस तक पहुंच भी न सका।  तब उन तांत्रिक बाबा ने उस धन को एक निश्चित दायरे तक सीमित कर दिया क्योंकि अब वो चलता -फिरता खज़ाना बन गया था। जिसके भी भाग्य में होगा उसी को मिलेगा। तब बाबा ने उसका दायरा सीमित कर दिया ताकि इस परिवार का धन उसी परिवार के ही किसी भी सदस्य को मिले। 

चंदा साहब को इतनी अधिक धन के चले जाने का अफसोस था किंतु किया भी क्या जा सकता है ? जो हो गया ,उसे लौटाया तो नहीं जा सकता। तब उन्होंने उस स्थान पर एक बाग लगवाने का निश्चय  किया। यह बात भी उसे आत्मा को गवारा नहीं थी। तब तांत्रिक ने कठोर होते हुए ,उसका एक स्थान निश्चित कर दिया। उसे आत्मा को धन सहित एक पेड़ के नीचे स्थापित कर दिया। वह पेड़ उसकी पहचान बन गया। 

अन्य स्थान पर आम के पेड़ लगा दिए गए, ऐसा नहीं ,कि उसके पश्चात किसी ने उस धन को निकालने का प्रयास ही नहीं किया। यह कहानी पीढ़ी दर पीढ़ी सभी ने सुनी। कुछ लोगों ने , उसे धन को निकालने का प्रयास भी किया। किंतु उसका परिणाम उन्हें भुगतना पड़ा। नाग -नागिन का जोड़ा दिखलाई देता। और सब डर जाते या कोई आगे बढ़ने का प्रयास भी करता तो मौत उसका स्वागत करती। इसीलिए अब बच्चों को यह कहानी सुनानी बंद कर दी गई थी। 

कई पीढ़ियां चली गई, चंदा साहब भी चले गए। निर्भय सिंह ने उसे श्राप से बचने के लिए, उस व्यक्ति का परिवार ढूंढना चाहा किंतु उसे व्यक्ति का नाम ही उन्हें मालूम नहीं था। सुनने में आता था, रात्रि में बाग से किसी के चीखने की ,न जाने कैसी अजीब -अजीब सी आवाज़ आती हैं। 

श्रीधर जी ने अपने बेटे चतुर को यह कहानी सुनाई ।

तब चतुर बोला -एक बात समझ में नहीं आई, आपकी कहानी में तो वह किसी पुरुष की आत्मा है। तब यह भूतनी कैसे इस बाग में घूमती है। 

अपने बेटे की बात सुनकर उन्होंने अपनी पत्नी की तरफ देखा और बोले-अभी मुझे कुछ कार्य स्मरण हो गया , तुम इसका ख्याल रखना और याद से इसके ताबीज भी बांध देना। तब चतुर से बोले -आगे की कहानी कल ,किंतु एक बात स्मरण रखना, कमजोर व्यक्तियों पर यह शीघ्र हावी होती हैं। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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