रामप्यारी के मन में ,अनेक बातें घूम रही थीं , एक तरफ वह उसके स्वप्न पर विश्वास करना चाहती थी किंतु दूसरी तरफ वह घबरा जाती थी, कहीं उस ''भूतनी का साया ''मेरे बेटे पर तो नहीं पड़ गया। इसके लिए वह उसकी नज़र भी उतारती है। इतना सब करने के पश्चात भी ,वह गांव के किसी लड़के को ,चतुर के पिता को बुलाने के लिए भेज देती है कि वह शीघ्र ही डॉक्टर को लेकर आ जाएं। उसे फिक्र थी, परसों को लड़के की परीक्षा है उससे पहले यह स्वस्थ हो जाना चाहिए। कुछ समय पश्चात उसके पिता 'डॉक्टर 'को लेकर आ जाते हैं। डॉक्टर साहब ,चतुर की जांच कर रहे थे। उसके माता-पिता उसके इर्द-गिर्द ही खड़े हो गए। जब डॉक्टर ने उसके ताप की जांच की ,तो तापमान बहुत अधिक बढ़ा हुआ था। डॉक्टर साहब ने ,चतुर से पूछा - यह सब कैसे हुआ ?
इससे पहले की चतुर कुछ का पाता, रामप्यारी ही बोलने लगी- डॉक्टर साहब !आपको क्या बताएं ?ये किसी की सुनता ही नहीं है , न ही कहना मानता है ,मैंने इससे कहा था -''कि यह बैठकर पढ़ ले न जाने कहां डोलता रहता है ?
रामप्यारी की बातों को सुनकर ,डॉक्टर साहब ने निर्णय लिया शायद इसे गर्मी और ठंड का असर हो गया है और बोले-फिक्र की कोई बात नहीं है ? शीघ्र ठीक हो जाएगा।
तभी रामप्यारी को जैसे कुछ स्मरण हुआ और वह बोली -डॉक्टर साहब ! यह सपने में भी डर गया था और चिल्लाते हुए उठा था , कहीं उस डर के कारण ही ,तो इसे बुखार नहीं हो गया है।
डॉक्टर साहब !ने एक नजर रामप्यारी की तरफ देखा ,जैसे वो सोच रहे थे -ये कैसी बातें कर रही है ?फिर सोचा -ये गांव की कम पढ़ी -लिखी महिला क्या जाने ? रामप्यारी की बातें सुनने के पश्चात ,चतुर की तरफ देखते हुए बोले - बेटा ,तुमने ऐसा क्या देख लिया था ? ऐसा पूछने का उनका उद्देश्य, रामप्यारी की बात को महत्व देने के साथ -साथ उसका भ्रम दूर करना भी था।
कुछ नहीं ,माँ तो ऐसे ही बोलती रहती है, झेंपते हुए चतुर बोला, क्योंकि उसे इस बात से शर्म आ रही थी कि डॉक्टर साहब ! हसेंगे ,इतना बड़ा हो गया है और अब भी यह स्वप्न में ,बच्चों की तरह डरता है।
डॉक्टर साहब ने उसकी तरफ देखा और बोले -कोई बात नहीं, शीघ्र ही ठीक हो जाओगे यह दवाई सुबह -शाम खा लेना।
चतुर के पिता ,अपने बेटे और पत्नी की हरकतें ,देख और सुन रहे थे किंतु डॉक्टर साहब के सामने कुछ नहीं कहना चाहते थे ,इसीलिए शांत रहे। उन्होंने डॉक्टर साहब को उनकी, फीस दी ,और उन्हें दरवाजे तक छोड़ आए।
वापस आकर बोले -तुम दोनों मां -बेटा यह कैसी बातें कर रहे थे ? यह दसवीं क्लास में पढ़ता है, छोटा बच्चा थोड़ी ही है ,जो यह सपने में किसी भी चीज को देखकर डर जाएगा।
मैं सही कह रही हूं ,जी, आजकल यह किसी की सुनता नहीं है ,ये बता रहा था -कि इसने सपने में ,आम के बगीचे वाली चुड़ैल देखी थी और वो ,इससे कुछ पूर्वजों की धन -संपत्ति और कुछ मुक्ति के विषय में कह रही थी।
श्रीधर जी ने ,रामप्यारी की बातें सुनकर एक नजर, चतुर की तरफ देखा, जैसे उसे परख रहे हों , उन्होंने उसकी आंखों में झांकते हुए पूछा -क्या तू उधर गया था ? पिता के पूछने के लहजे से चतुर घबरा गया, ना करते-करते भी ,उसने' हां 'कर दिया।
देखा ,मैं कहती थी ,न.... यह किसी की सुनता ही नहीं है, और मुझे मना कर रहा था कि मैं कहीं नहीं गया। और जब से वहां से आया था तब से मुझे उसके विषय में ही ,जानकारी प्राप्त करना चाह रहा था और मुझसे उसकी कहानी सुन रहा था।
और तुम सुना रही थीं , श्रीधर जी ने पूछा।
क्या करती? जब बच्चे को जिज्ञासा हो रही थी तो इसे डराने के लिए सुनाने लगी, ताकि यह उधर न जाए मुझे क्या पता था ? कि यह पहले ही ,वहां से होकर आ गया है।
श्रीधर जी गंभीर मुद्रा में बैठे थे, फिर रामप्यारी से बोले -तुम कुछ कह रही थीं ,इसने स्वप्न में क्या देखा ? अब तो यह आपके सामने ही है , और यह भी स्पष्ट हो गया कि यह उस बगीचे में गया था। इसी से पूछ लीजिए। मैंने तो सोच लिया है, काम निपटाते ही ,मंदिर वाले पंडित जी के पास जाऊंगी और उनसे 'ताबीज' बनवाकर लाऊंगी। मैं तो भगवान का बहुत-बहुत धन्यवाद कर रही हूं , कम से कम यह उस बगीचे से सही -सलामत वापस आ तो गया वरना ढूंढते रह जाते।
श्रीधर जी चतुर से बहुत कुछ कहना चाहते थे किंतु उसकी हालत देखते हुए, पूछा -जो तुम्हारे सपने में आई उसे तुमने पहले कभी देखा है।
पिता की बात सुनकर चतुर की नज़रें नीची हो गईं , शब्द तो नहीं मिले किंतु गर्दन से उसने हां कर दिया।
कहां और कब ?
कल ही बगीचे में ,
श्रीधर जी को लगा ,रामप्यारी अभी यहाँ है बात सुनकर शोर मचा देगी, उससे पहले ही बोले -तुम जरा जाकर इसके लिए पानी ले आओ !यह अपनी दवाई ले लेगा।
दवाई तो मैं बाद में दे दूंगी किंतु मैं इससे पूछती हूं ,जब इसे मना कर दिया था तब यह बगीचे में क्या करने गया था ? इम्तिहान सर पर हैं, और इधर-उधर घूमता रहता है। माता-पिता के कहने का तो असर ही नहीं होता। सच में ही ,उस चुड़ैल के कारण ही इसे बुखार हुआ है और वही इसे रात्रि में भी लेने आई थी।
यह तुम क्या कह रही हो ?श्रीधर जी चौंकते हुए बोले।
रामप्यारी रहस्य खोलते हुए बोली -अभी आपने इसके पैर नहीं देखे, मिट्टी में सने हुए हैं और यह कह रहा है कि मैंने सोने से पहले अपने पैर धोए थे। तब इसके पैरों में यह मिट्टी कहां से आई ? श्रीधर जी को रामप्यारी की संपूर्ण बातें सही लग रही थी और उन्हें अपने इकलौते बेटे के, वहां जाने का भी दुख था।
उन्हें लगा इसे हमें पहले ही बता देना चाहिए था। ताकि इसकी जिज्ञासा यहीं समाप्त हो जाती और यह इधर-उधर भागता ही नहीं। तब वह शांत स्वर में बोले - उसने तुमसे स्वप्न में आकर क्या कहा ?
इसका मतलब आप इसकी बात पर विश्वास करते हैं, क्या वह सच में ही ,इसके सपने में आई होगी ?
हां ,कुछ भी हो सकता है, मैंने इस गांव में बहुत कुछ देखा है। अब तुम जल्दी से जाकर इसके लिए पानी ले आओ ताकि यह दवाई खा सके और फिर तैयार होकर मंदिर वाले पंडित जी से ,इसके लिए ताबीज ले आना वरना वह इसका पीछा नहीं छोड़ेगी।
क्या कह रहे हैं ?आप ! आश्चर्य से रामप्यारी बोली।
रामप्यारी तो दूसरे गांव से आई है, किंतु श्रीधर जी की तो पैदाइश ही यहीं की है, बचपन से ही ,कहानी किस्से सुनते आ रहे हैं इसीलिए वह सब जानते हैं।
कुछ देर पश्चात ही, रामप्यारी गिलास में पानी लेकर आ गई, और अपनी बात पर मोहर लगाते हुए बोली -देखा मैं कहती थी ,न..... कि जरूर उसी चुड़ैल का साया इस पर पड़ा है वरना अब तक इसकी हालत ठीक हो गई होती।
क्या मतलब ?इतनी जल्दी !
मैंने इसकी नजर उतारी थी, और ''साबुत लाल मिर्च'' चूल्हे में डाल दीं थीं किसी को भी धसका नहीं हुआ ,न ही ,किसी को खांसी आई।
