आज आपको हम अपनी कहानी के, चंचल, हंसमुख, दिलफेंक आशिक ,कभी-कभी मुंहफट भी , ऐसे किरदार से मिलवाते हैं। जो कुछ ज्यादा ही ''रसिक मिज़ाज़ '' है , ना...... ना यह मत समझ लीजिए ,कि उसका नाम'' रसिया'' ही है। यह उसका स्वभाव है। वैसे तो उसका नाम उसके माता -पिता ने बड़े चाव से उसका ''चतुर भार्गव''रखा है। उस समय न जाने ,उसका नाम क्या सोचकर रखा होगा ? किन्तु आज के समय में ,वह अपने नाम के मुताबिक ही ''प्यार जतलाने में बहुत चतुर है,''लड़कियों को अपनी बातों में उलझाना तो उसका बाएं हाथ का खेल है।उनका यही खेल हम ,''रसिया ''के माध्यम से देखने वाले हैं।
जब से ''चतुर भार्गव ''ने होश संभाला है , वह हमेशा सुंदर लड़कियों के और उनके साथ में रहने के, उनसे बातचीत करने के, स्वप्न ही देखता रहता है। वे लड़कियाँ उसे परियां नजर आती हैं। अब हमारे रसिक साहब का पढ़ाई- लिखाई में तो मन था नहीं , आए दिन, माँ से पिटाई भी होती रहती थी। घर में माँ और स्कूल में अध्यापक उन्हें कूटते थे, किंतु रसिक मिजाज तो न जाने किस मिट्टी के बने हुए थे ? उनकी अपनी अलग ही दुनिया थी ,वो अपनी उस प्यार भरी दुनिया में ,प्यार की तलाश ''में खोया रहता था ।
आजकल के बच्चों को ही देख लीजिये ,यदि उस बच्चे को माता -पिता या अध्यापक कुट दें , तो आज का बच्चा ''डिप्रेशन'' में चला जाता है किंतु रसिक मिजाज यानी कि हमारे ''चतुर भार्गव जी'' , अपनी ही दुनिया में मस्त रहते हैं , उनको माँ द्वारा पीटा जाना तो , तो उनका ''वार्मअप '' समझिये । जब तक मां उन्हें दो-चार बार दिन में पीट न ले, थपकी से या फिर चप्पल से ,खींचकर वार न करें। उनके शरीर में हलचल रहती थी, तन बेचैन रहता था। पिटने के पश्चात , वह थोड़ी देर के लिए, आंसू बहाते, और फिर अपनी इस धुन में दोस्तों संग मस्त हो जाते। मां भी उन्हें समझा -समझाकर थक गयी ,किन्तु ''चतुर ''ठहरे मस्तमौला ! कोई असर नहीं पड़ता। मुझे तो लगता है ,पिट -पिटकर उनकी चमड़ी,मजबूत हो गयी है।
आइये ,उनके गांव ''चांदगाँव ''चलते हैं ,सुनने में आया है ,चतुर के पूर्वज ,बरसों पहले चंदेरी से यहाँ आये थे ,और यहीं के होकर रह गए। पहले इस स्थान पर कोई घर नहीं था ,तब चंदा साहब ने ही ,इस गांव की नींव डाली। सुनने में तो यह भी आया है, कि यह जो पूरा गांव है ,ये ''चंदा साहब ''का ही पीढ़ी दर पीढ़ी परिवार चला आ रहा है। यानि कि उनके चार बेटे थे ,उसके पश्चात ,उन चारों की संतानें हुईं ,परिवार बढ़े और घर भी बढ़ने लगे ,इस तरह से सुनने में तो यही आता है कि ''चंदा साहब ''का ही ख़ानदान चला आ रहा है। ये बरसों पुरानी बातें हैं किन्तु आज भी गांव का नाम ''चांदगाँव ''उन्हीं के नाम से है।
चतुर न जाने उनकी कौन सी पीढ़ी है ?आठवीं या दसवीं !अरे हाँ याद आया ,अबकी बार चतुर दसवीं कक्षा में ही तो है। सारा दिन माँ उसके पीछे दौड़ती ,वो चाहती है ,कि चतुर इस गांव से बाहर निकले और पढ़ -लिखकर बड़ा आदमी बन जाये किन्तु उसे तो जैसे जीवन की कोई फिक्र ही नहीं है और अपने दोस्तों संग ''गुल्ली -डंडा ''खेल रहा है।
देख ,चतुर! मैं यह चाल तुझे दे तो रहा हूं, किंतु उसके बाद तुझे भी मुझे चाल देनी होगी, अविश्वास के साथ हरिराम उससे कह रहा था।
हां ,हां दे दूंगा, क्यों चिंता करता है ?
चिंता नहीं करूंगा तो और क्या करूंगा ? अपनी चाल ले लेता है , जब मेरी चाल की बारी आती है तो भाग जाता है।
नहीं, भागूंगा, यह चतुर का तुझे वादा है, बड़े आत्म विश्वास के साथ चतुर ने उससे हाथ मिलाया, तू अपना यार है ,चाल तो मैं तुझे देकर ही जाऊंगा, कहते हुए ,डंडा उसके हाथ से ले लेता है।
उधर सरकारी स्कूल के मास्टर साहब ने, चतुर के घर एक लड़के को भेजा , उसके घर शिकायत करने के लिए कि आपका लड़का' चतुर' विद्यालय में पढ़ने के लिए नहीं आया है। इस साल उसकी परीक्षा कठिन होगी , इस तरह लापरवाही से तो वह फेल हो जाएगा।
यह गांव उन्नति कर रहा है, और दसवीं तक का यहां पर स्कूल भी बन गया है , प्रयास तो यही है कि यह गांव उन्नति करता रहे , यहां के'' प्रधान तेजाजी ने'', गांव की सड़कें और मोहल्ले ,नालियाँ सभी ठीक करवाई हैं। चतुर भी इस साल ही अपने गांव में पढ़ रहा है ,अगले साल पढ़ाई के लिए तो उसे या तो नजदीक के ही शहर जाना पड़ेगा या फिर दूसरे किसी शहर में..... यह सब तो उसके'' परीक्षा परिणाम'' से ही पता चल पायेगा।
जब रामप्यारी को यह बात पता चली, कि चतुर अभी तक विद्यालय नहीं पहुंचा है , तो उन्हें बहुत क्रोध आया, वह घर के कामों में व्यस्त थीं , घर के कामों को छोड़कर ,वह गांव में चतुर को खोजने चल दीं । गांव के एक बड़े मैदान में चतुर उन्हें अपने दोस्तों के संग गुल्ली -डंडा खेलते हुए दिख गया। उसके विद्यालय के छात्र भी, उसकी मम्मी के साथ ही थे , उन्होंने उसे दूर से देखते ही शोर मचाना आरंभ कर दिया चतुर ! ओ चतुर !
पहले तो चतुर अपने खेल में इतना व्यस्त था कि उसे कुछ भी सुनाई ही नहीं दिया, किंतु जैसे-जैसे वे लोग उसके नजदीक आते गए उसके कर्णपटल में अपने नाम के स्वर सुनाई दिए ,उसने गर्दन उठाकर देखा तो मां दो -तीन लड़कों के साथ, इसी ओर चली आ रही है , वह समझ गया , कि अब उसकी पिटाई होनी है। जैसे ही वे लोग उसके करीब आते, उससे पहले ही, वह डंडा छोड़कर भाग खड़ा हुआ।
हरिराम चिल्लाता रहा अरे ओ रुक जा ! मेरी चाल तो देकर जा ,यह हमेशा से ही ऐसा करता है , कहते हुए उसने अपना ''माथा पीट लिया।''
मां ने जब उसे भागते हुए देखा, तो दूर से ही चिल्ला कर बोली -ठहर जा ! आज तुझे मैं नहीं छोडूंगी।
मां के पीछे -पीछे आने पर, अब चतुर और घबरा गया उसने यह जानने का प्रयास भी नहीं किया कि आखिर मां क्रोधित क्यों है ? उसने ऐसी क्या गलती कर दी? जो वह इस तरह नाराज है।
अब देखते हैं ,दोस्तों ! क्या चतुर को अपनी गलती का एहसास होगा ?क्या माँ की मार से बच पाएगा जानने के लिए मिलते हैं अगले भाग में
