Tadap [part 96]

ऐ ..... ओये !  तू क्या उसे पाठ पढ़ाती रहती है ? चंदा देवी ने कभी भी ऐश्वर्या का नाम नहीं लिया न ही ,कभी उसे बहू या बेटा कह कर पुकारा। ए और ओये शब्दों से ही, उसको हमेशा संबोधित किया। यह तेरे कब से ठहर गया ? उसके पेट की तरफ इशारा करते हुए बोलीं - तूने तो हमें नहीं बताया। एक महीने से तो तू अपने पीहर में ही रह रही है। उनका कहने का आशय कुछ अलग ही लगा ,ऐश्वर्या इतनी भी नादाँन नहीं थी कि शब्दों को कहने का ,भाव न समझ सके। 

यह आप क्या कह रही हैं, ऐश्वर्या ने प्रश्न किया ,कहने से पहले सोच तो लिया कीजिए, किससे ,क्या कह रही हैं ?

क्यों ,तुझसे  क्या मैं डरती हूं ? न जाने ,उसे क्या-क्या पट्टी पढाती रहती है, अब आने दे ! छोटी को। तेरे होश  तो मैं ठिकाने लगाऊंगी।


 उसके आने से क्या होगा ? तुझे तभी पता चलेगा। यह इसी का  बालक है या मायके से बना कर ले आई। अभी तक तो कुछ भी नहीं हो रहा था।अबकी बार स्पष्ट ही कह गयीं।  

जब मैं यहां से गई थी, तभी मुझे आभास तो हो रहा था किंतु मैं पूरी तरह से आश्वस्त  नहीं थी, क्योंकि मुझे खून की कमी हो जाती है तब भी मुझे दिक्कत आती है। 

दुनिया भर की बीमारी, तूने ही लगा रखी हैं , पता नहीं, हमारी किस्मत में कहां से रखी गई ? चंदा देवी का एक-एक शब्द, ऐश्वर्या को तीर की तरह लग रहा था, किंतु वह उनसे कह भी क्या सकती है ? क्योंकि मायके वाले भी कहते हैं -बड़ों का मान -सम्मान करो ,ख्याल रखो ! पति भी, कह देते हैं -मम्मी हैं ,बड़ी हैं ,सम्मान करो ! एक -दो शब्द कह भी दिया तो क्या फ़र्क पड़ता है ? फिर चाहे उन्हें किसी के सम्मान की परवाह हो या नहीं। 

अपने सीने को छलनी करवाके, वह अंदर आई, और रोने लगी , तभी अचानक से प्रवीण, अंदर आ गया। क्या हुआ क्यों रो रही हो ?

 मैं एक बात आपसे पूछना चाहती हूं ,आप बुरा तो नहीं मानेंगे । क्या आप इन्हीं के बेटे हैं ? क्या ये आपकी ही सगी मां हैं , क्योंकि जैसा व्यवहार यह करती हैं , ऐसे व्यवहार के लिए तो ,सौतेली मां ही प्रसिद्ध होती हैं। 

ऐसा कुछ भी नहीं है, वह थोड़ा सा काम में और परेशानी में कुछ भी कह देती हैं , मैंने तुमसे कितनी बार कहा -तुम उनकी बात का बुरा मत माना करो !उन्हें क्रोध जल्दी आ जाता है , प्रवीण की सहजता से, कभी-कभी ऐश्वर्या को कोफ़्त  होती, गुस्सा आता, कैसा इंसान है ? कोई गलत कर रहा है, देख कर भी अंजान बने रहने का प्रयास करता है। क्या इसका खून नहीं खोेलता ? खोेलेगा भी कैसे? सहन तो सब मुझे ही करना पड़ रहा है। पता नहीं ,क्या सोचे  बैठा है ?

मम्मी !आज शाम को मैं इसे डॉक्टर को दिखा लाऊंगा। 

अब यह और नए खर्चे , मैं भी क्या-क्या संभालूं ?

ऐश्वर्या मन ही मन सोच रही थी, अभी तो प्रवीण के दिए पैसे समाप्त भी नहीं हुए होंगे और ताने अभी से शुरू हो गए। क्या यह [प्रवीण ] महसूस नहीं करता ?

डॉक्टर ने, ऐश्वर्या को देखा और बोली -इसके खाने पीने पर विशेष ध्यान देना है , इसका 'हीमोग्लोबिन' कम हो जाता है जिसके कारण इसको परेशानियां आ सकती हैं। ज्यादा देर तक खड़ा ना रहने दें और कुछ दवाइयां लिखकर दे दी। 

ऐश्वर्या जब डॉक्टर को दिखाकर आई, उसे देखते ही चंदा देवी बोलीं -डॉक्टर का क्या है ? दिखाने जाओगे तो कुछ न कुछ बीमारी बता ही देते हैं हमारे जमाने में भी तो बहुएं बच्चे जनती थीं , कभी किसी को कोई परेशानी नहीं हुई। यह नई आई है, तब प्रवीण से बोलीं -तू इसकी ज्यादा लल्लो -चप्पो  मत किया कर...... 

प्रवीण कुछ भी कहना नहीं चाहता था, अब वह जो कुछ भी देख रहा था, या उसके सामने जो भी घटित हो रहा था ,उसे महसूस तो कर रहा था किंतु उसके पास कोई भी जवाब नहीं था। 

 मेहमान आने शुरू हो गए थे, ऐश्वर्या काम करती और कुछ देर के लिए पैर ऊपर करके बैठ जाती, फिर काम में व्यस्त हो जाती। यदि कोई मेहमान उससे पूछता भी, कि क्या बहू को कोई परेशानी है ?

अजी परेशानी क्या ? आजकल की बहुएं नाजुक हैं , हमने तो पूरे टाइम पर काम किया था। एक वह डॉक्टर को दिखा आएंगीं। वैसे तो यह काम -धाम कुछ करती नहीं है , फिर भी मैं इससे कह देती  हूं थोड़ा काम करेगी ,हाथ पर चलायेगी तो बच्चा स्वस्थ होगा, वरना बैठे-बैठे तो बीमारियां ही बढ़ेगी, बच्चे  के होने में भी दिक्कत आएगी अपनी बातों को पहले से पहले ही, बाहर वालों को, बात करके  समझा देती थीं। किसी को भी ऐश्वर्या से बात करने का कोई मौका मिलने नहीं देती थीं। 

समय के साथ-साथ, वह दिन भी आ गया जिस दिन प्रतीक का विवाह हुआ और खुशी-खुशी करुणा उनके घर की बहू बन गई। जो चंदा देवी ,ऐश्वर्या के सामने सारा दिन थकी सी रहती थीं , वह भाग -भागकर कार्य कर रही थीं। उनकी प्रसन्नता उनके कदम बयां कर रहे थे। अब तू आ गई है, तो मुझे कोई फिक्र नहीं, सब संभाल लेना। अब तक तो मैं परेशान थी।

 ऐश्वर्या इन शब्दों को सुनती और समझती भी, किंतु क्या कहती ?

प्रवीण ने एक दिन कहा था - मम्मी !अब करुणा  घर का कार्य संभाल लेगी, थोड़ा ऐश्वर्या को भी आराम मिल जाएगा। 



अभी इसकी कुछ रस्में  होनी बाकी हैं ,यह कुछ भी नहीं कर पाएगी उन्होंने असमर्थता जतलाई। अभी यह  1 महीने तक कुछ भी नहीं करेगी, इसकी रसोई की रस्म होगी तब यह रसोई में जाएगी। 

ऐश्वर्या ने जब यह बात सुनी तो उसे रहा नहीं गया, और उसने चंदा देवी से पूछा -मेरे साथ तो ऐसी कोई भी रस्में आपने नहीं की ,कि बहु एक महीने तक रसोई में नहीं जाएगी। मुझसे  तो शाम को ही खाना बनवा लिया था। 

पहले तो चंदा देवी चुप रहीं  उन्होंने जवाब देना उचित नहीं समझा, किंतु कुछ देर बाद बोलीं -तब मैं अकेली थी, कौन करता, तुझे एक महीने तक बैठाकर कौन खिलाता ?

तब इसे बैठाकर कौन खिलाएगा ? मेरी भी हालत ठीक नहीं है। 

यह कहकर ऐश्वर्या , करुणा के कमरे से बाहर आ गई, तब चंदा देवी करुणा से बोलीं -जब से तेरा विवाह तय हुआ है , यह ऐसे ही व्यवहार कर रही है , न जाने क्यों ? इसे तुझसे जलन हो रही है , तुझे आए, देर नहीं हुई और यह परेशान है। करुणा ने कुछ नहीं कहा ,वह चुपचाप सुनती रही , किंतु चंदा देवी ने अपना पैंतरा  चल दिया था। करुणा के मन में एहसास जगा दिया था, कि यह तुम्हारी जेठानी तुमसे जलती है और ईर्ष्या के कारण ही, तुम्हारे काम करने पर जोर दे रही है। क्या बात थी ? उन्होंने बात को, न जाने कैसे उलझा दिया ? करुणा को लगने लगा -कि मेरी सास मुझे चाहती है और इस बात से मेरी जेठानी को मुझसे  ईर्ष्या होती है। उसने यह आभास नहीं कराया - कि यह तुम्हारी बड़ी जेठानी है, और अभी थोड़ा अस्वस्थ है, दोनों एक दूसरे का सहयोग करके प्रेम से रहना और मिलजुल कर कार्य कर लेना। एक सप्ताह तक वह अपनी ससुराल में रही और फिर मायके चली गई। 

प्रवीण ने पूछा -मम्मी, आपको करुणा को अभी उसके मायके नहीं भेजना चाहिए था। यहां उसकी जरूरत है।  

क्यों, वह तुम्हारे लिए क्यों रुकेगी ? उसकी अपनी भी जिंदगी है उन्होंने प्रवीण को  सीधा-साधा और स्पष्ट जवाब दिया। 

आपकी जैसी इच्छा ,कहकर प्रवीण घर से बाहर निकल गया। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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