नैनीताल की हरी भरी वादियों में, प्रभा और इंस्पेक्टर विकास खन्ना घूमने के लिए गए थे। प्रभा को ''नैना देवी ''का प्रसिद्ध मंदिर जो देखना था , इसीलिए उसने,हनीमून पर, नैनीताल जाने की इच्छा जाहिर की थी। पहाड़ी इलाके और भी हैं किंतु प्रभा की इच्छा के लिए, वह नैनीताल पहुंच गए। इसे'' झीलों का शहर ''भी कहा जाता है। झीलों से गिरता स्वच्छ -निर्मल जल ,जो आँखों को सुकून दे रहा था। वहां बहुत सी गुफाएं थीं ,दर्शनीय स्थल बहुत थे। झील में तैरती बत्तखें बहुत ही लुभावनी लग रहीं थीं। जहाँ देखो ,प्रकृति के एक से एक अद्भुत नज़ारे देखने को मिल रहे थे। सुबह से घूमने निकले थे ,थक चुके थे, ढलते सूरज के साथ ,शांति से बैठकर ,प्रकृति का ये नजारा भी देख रहे थे।
अगले दिन ,प्रभा और विकास देर से उठते है ,कल के थके हुए थे ,थोड़ा आलस्य भी आ रहा था। नाश्ता कमरे में ही मंगवा लिए था। अपनी नीद और थकावट को उतारकर बाजार घूमने चल देते हैं। मॉल रोड के बाजार से प्रभा खरीददारी करती है। वो कुछ वस्त्र अपने लिए और विकास के लिए लेती है। अपनी मम्मी और सास के लिए भी ,शाल और पुलोवर लेती है। दोपहर का खाना दोनों बाहर ही खा लेते हैं। वहां हर एक चीज बहुत ही खूबसूरत लग रही थी। दोनों इसी तरह घूमते रहे ,फिर वापस अपने होटल में आ गए।
अगले दिन के लिए उन्होंने पहले ही तय कर लिया था कि'' नैना पीक ''पर जायेंगे ,उगते सूर्य देव के दर्शन करने के लिये शीघ्र ही निकल गए थे।'' नैना देवी ''के मंदिर भी गए। वहां पहले से ही, भक्तों की बहुत भीड़ थी। प्रकृति के एक से एक नजारे चहुँ ओर बिखरे हुए थे और एक से एक सुंदर नजारे देखने को मिले। प्रभा और विकास बोटिंग के लिए भी जाते हैं। जब वो झील में ,बोटिंग कर रहे थे ,तब अचानक विकास ने ऐसा कुछ देखा ,उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। उसे लग रहा था, ऐसा कैसे हो सकता है ?यह मेरी नजरों का धोखा भी हो सकता है। प्रभा उससे बातें कर रही थी किन्तु विकास का ध्यान उसकी बातों में नहीं था। उसकी तरफ देखकर प्रभा ने पूछा -क्या देख रहे हो ?
कुछ नहीं ,उसने अपने मन का भ्रम जानकर प्रभा को कुछ भी नहीं बताया। दूर से ही ,उसकी दृष्टि उसी नाव पर थी। मन को समझाने का प्रयास तो कर रहा था किन्तु पुलिस वाला दिमाग कह रहा था -मैं धोखा नहीं खा सकता ,ये अवश्य ही वही है। उसका मन अब प्रकृति के दृश्यों से हटकर उस नाव पर जाकर टिक गया था। प्रभा भी उसकी इन हरकतों को महसूस कर रही थी और उससे बोली -तुम्हें अचानक क्या हो गया ?इतने परेशान क्यों हो ?तुमने ऐसा क्या देख लिया ?
बताता हूँ ,पहले मुझे तो विश्वास हो जाये ,कहकर एकाएक नाववाले से बोला -वो जो नाव है ,उस नाव का पीछा करो !
साहब ! ये आप क्या कह रहे हैं ?इसमें और भी तो पर्यटक बैठे हैं।
हाँ ,तो क्या हो गया ? तब भी वे नाव की यात्रा का आनंद तो उठा ही सकते हैं।
ए ! तुम कौन हो ? हमें अब आगे ही जाना है किसी का पीछा नहीं करना है ,क्या तुम कोई जासूस या पुलिसवाले हो ?
नहीं ,ऐसा कुछ भी नहीं है ,उस नाव में अचानक कोई हमारे जानने वाला दिख गया इसीलिए सोचा ,उनसे मिल लें !अपनी पहचान छुपाते हुए विकास बोला। किन्तु नाववाले और नाव में बैठे अन्य लोगों को उस पर विश्वास नहीं हुआ। सभी ने उसकी तरफ देखा ,कुछ घूर भी रहे थे।
इंस्पेक्टर विकास खन्ना चाहता , तो उन लोगों को अपना परिचय दे उसे नाव का पीछा करवा सकता था, किंतु अपने आप में उसे विश्वास ही नहीं हो पा रहा था। ऐसा कैसे हो सकता है ? उसे चोट भी आई थी, अभी दिन ही कितने हुए हैं ? क्या ऐसा हो सकता है ? उसके साथ वह व्यक्ति कौन है ? उसकी दृष्टि अभी भी उस नाव का पीछा कर रही है, किंतु वह आगे बढ़ती जा रही है। जहां अन्य नाम खड़ी हैं वहां नहीं जा रही। अब चंपा उसके लिए पहली बनती जा रही थी।
प्रभाव से विकास की यह हरकतें छुपी नहीं थीं , वह समझ रही थी, अब विकास घूमने में इतनी दिलचस्पी नहीं दिखला रहा है, बल्कि यहां रहकर भी वह कुछ और ही सोच रहा है।
